August 27, 2016

आहें न भरीं शिकवे-ज़ीनत १९४५

कुछ गीतों का क्रेज बन जाता है. उसके पीछे की वजह कुछ
भी हो सकती है. कभी कभी बिना वजह भी कोई गीत चर्चित
हो जाता है.

इस गीत के प्रसिद्ध होने के पीछे ऑफिशियल वजह क्या है मुझे
नहीं मालूम मगर जो थोड़े से ज्ञानी हो जाते हैं संगीत के क्षेत्र
में वे इस गीत के नाम से ही आह-आह और वाह-वाह करने
लगते हैं.

एक बड़ी वजह जो मुझे समझ आई वो है इसके फेमस होने
में-ये महिला कव्वाली है आर शायद उस समय तक किसी हिंदी
फिल्म में टोटल महिला कव्वाली नहीं आई थी. नूरजहाँ और
जीनत बेगम तो उस समय की नामचीन गय्काएं थीं मगर
कल्याणी का नाम उतना चर्चित नहीं था.

हम भी एडवांस में वाह वाह कर लेते हैं और आपको गीत
सुनवाते हैं. तीन गायिकाएं-नूरजहाँ, जोहरा बाई अम्बालेवाली
और कल्याणी इस गीत को गा रही हैं. नक्शब जराचवी के
लिखे गीत की तर्ज़ बनाई है मेरे साहब ने.



गीत के बोल:

आहें न भरीं शिकवे न किए
कुछ भी न जुबां से काम लिया
आहें न भरीं शिकवे न किए
कुछ भी न जुबां से काम लिया
कुछ भी न जुबां से काम लिया
आहें न भरीं शिकवे न किए
आहें न भरीं शिकवे न किए
कुछ भी न जुबां से काम लिया
कुछ भी न जुबां से काम लिया
कुछ भी न जुबां से काम लिया
इस पर भी मोहब्बत छुप न सकी
जब तेरा किसीने नाम लिया
दिल को पकड़ कर बैठ गए
हाथों से कलेजा थाम लिया

पूछा जो किसी ने हाल तो हम
पूछा जो किसी ने हाल तो हम
कुछ कह न सके कुछ कह भी गए
कुछ कह न सके अजी हाँ हाँ
रोके तो बहुत आँसू लेकिन
कुछ रुक भी गए कुछ बह भी गए
कुछ रुक भी गए कुछ
कुछ रुक भी गए कुछ बह भी गए
अफ़साना कहा और लब न हिले
अश्कों से जहाँ का काम लिया

आहें न भरीं शिकवे न किए
कुछ भी न जुबां से काम लिया

रोने से भला क्या दिल रुकता
क्या दिल रुकता
क्या दिल रुकता
दुनिया को तड़प कर तड़पाता
दुनिया को तड़प कर हाँ हाँ
दुनिया को तड़प कर तड़पाता
सच पूछिये वो तो ख़ैर हुई
सच पूछिये वो तो ख़ैर हुई
महफ़िल में तमाशा बन जाता
महफ़िल में तमाशा बन जाता
महफ़िल में तमाशा बन जाता
कुछ आप अदाएं रोक गए
कुछ ज़ब्त से हम ने काम लिया
कुछ आप अदाएं रोक गए
कुछ ज़ब्त से हम ने काम लिया

वो लाख तुम्हारे ज़ुल्म सहे
हाँ ज़ुल्म सहे
अजी ज़ुल्म सहे
पर आँख से आँसू बह न सका
बीमार-ए-मोहब्बत ऐ नक्शब
कुछ और तो मुँह से कह न सका
इक ठण्डी सी लम्बी आह भरी
चुपके से किसी का नाम लिया
इक ठण्डी सी लम्बी आह भरी
चुपके से किसी का नाम लिया


आहें न भरीं शिकवे न किए
कुछ भी न जुबां से काम लिया
आहें न भरीं शिकवे न किए
कुछ भी न जुबां से काम लिया
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Aahen na bahri shikwe na kiye-Zeenat 1945

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