September 7, 2016

आ गई याद शाम ढलते ही-गुलाम अली गज़ल

आज सुनते हैं गुलाम अली की गाई एक गज़ल. अभी तक आपको
जो उनकी ग़ज़लें सुनवाई थीं  वो ७० और ८० के दशक वाली थीं.
उसके बाद के दौर की एक गज़ल सुनिए आज जिसके बोल लिखे हैं
मुनीर नियाज़ी ने.

अपनी उम्र के ७५ वसंत देख चुके गुलाम अली की पहचान आज तक
के सबसे बढ़िया गज़ल गायकों में होती है. गुलाम अली का नाम उनके
पिता ने बड़े गुलाम अली खान के नाम पर रखा था. गुलाम अली की
विशेषता राग रागिनियों पर आधारित ग़ज़लें हैं. बोल मुनीर नियाजी
के हैं.




गज़ल के बोल:

आ गई याद शाम ढलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही
बुझ गया दिल चराग़ जलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही

खुल गये शहर-ए-ग़म के दरवाज़े
खुल गये शहर-ए-ग़म के दरवाज़े
खुल गये शहर-ए-ग़म के दरवाज़े
इक ज़रा सी हवा के चलते ही
इक ज़रा सी हवा के चलते ही

आ गई याद शाम ढलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही

कौन था तू के फिर न देखा तुझे
कौन था तू के फिर न देखा तुझे
कौन था तू के फिर न देखा तुझे
मिट गया ख़्वाब आँख मलते ही
मिट गया ख़्वाब आँख मलते ही

आ गई याद शाम ढलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही

तू भी जैसे बदल सा जाता है
तू भी जैसे बदल सा जाता है
तू भी जैसे बदल सा जाता है
अक्स-ए-दीवार के बदलते ही
अक्स-ए-दीवार के बदलते ही

आ गई याद शाम ढलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही
बुझ गया दिल चराग़ जलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही
……………………………………………………………….
Aa gayi shaam dhalte hi-Ghulam Ali Ghazal

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