November 8, 2016

हज़ारों रंग बदलेगा ज़माना-शीरी फरहाद १९५६

५० के दशक की ओर एक बार चला जाए और सुना जाए फिल्म
शीरी फरहाद से एक गीत रफ़ी का गाया हुआ. तनवीर नकवी का
लिखा गीत है जिसकी धुन बनाई है एस मोहिंदर ने.

शीरी फरहाद का निर्देशन अस्पी ईरानी ने किया था और इसके
प्रमुख कलाकार हैं प्रदीप कुमार, मधुबाला और अमीता.

शानदार गीत है मगर इसे फिल्म लैला मजनू(१९७५) के गीतों जैसी
प्रसिद्धि नहीं मिली. इसे देखते देखते आपको ज़रूर लैला मजनू के
दृश्य याद आने लगेंगे.

इसमें एक बात अनुतइ ढंग से कही गयी है- मुहब्बत मौत से भी
क्या मरेगी. सही है, ना तो भाव और ना ही आत्मा खत्म होती
है. शीरी फरहाद की प्रेम कहानी इतिहास की अमर गाथाओं में से
एक है.



गीत के बोल:

न हँसो प्यार पे
नाकाम ज़माने वालों
क्या मिटाओगे मोहब्बत को
मिटाने वालों

हज़ारों रंग बदलेगा ज़माना
हज़ारों रंग बदलेगा ज़माना
न बदलेगा मुहब्बत का फ़साना
मुहब्बत का फ़साना
हज़ारों रंग बदलेगा ज़माना

पिघल जाते हैं पत्थर मोम हो कर
पिघल जाते हैं पत्थर मोम हो कर

सिमट जाते हैं कतरे में समन्दर
मुहब्बत छेड़ती है जब तराना
मुहब्बत छेड़ती है जब तराना
न बदलेगा मुहब्बत का फ़साना
मुहब्बत का फ़साना

हज़ारों रंग बदलेगा ज़माना

उड़े तो चाँद तारे तोड़ लाएं
उड़े तो चाँद तारे तोड़ लाएं
गिरें तो आग पानी में लगाये
बनायें बिजलियों पे आशियाना
बनायें बिजलियों पे आशियाना
न बदलेगा मुहब्बत का फ़साना
मुहब्बत का फ़साना

हज़ारों रंग बदलेगा ज़माना

मुहब्बत मौत से भी क्या मरेगी
मुहब्बत मौत से भी क्या मरेगी
ज़माने से मुहब्बत क्या डरेगी
कि इसकी ठोकरों में है ज़माना
कि इसकी ठोकरों में है ज़माना
न बदलेगा मुहब्बत का फ़साना
मुहब्बत का फ़साना

हज़ारों रंग बदलेगा ज़माना
हज़ारों रंग बदलेगा ज़माना
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Hazaron rang badlega zamana-Shirin Farhad 1956

Artist: Pradeep Kumar

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