तुम नहीं भूलती-कन्यादान १९६८
का कवि ह्रदय हिलोरी मारता है. इसे कई फिल्मों में तो
दिखलाया जाता है और अधिकाँश में इस प्रतिभा को दबा
दिया जाता है ये सोच के कि कहीं कविता गाँव पर हावी
ना हो जाये.
१९६८ की पायल की झंकार में किशोर कुमार की आवाज़
में ऐसा बहुत सामान है. १९५७ की फिल्म प्यासा में भी
हमने ऐसी कई चीज़ें सुनीं. फिल्म कभी कभी के हीरो को
ज्यादा भड़ास नहीं निकालने दी गई.
दरअसल ये निर्देशक के काव्य-रसिक होने का भी संकेत है.
एम वी रमन जिन्होंने पायल की झंकार का निर्देशन किया
है उन्हों ही १९५१ की बहार, १९५३ की लड़की, १९५५ की
पहली झलक, १९५६ की भाई भाई और १९७१ की ज्वाला
का निर्देशन किया है. उन्होंने अपनी फिल्मों के लिए गीत
भी बढ़िया लिखवाये गीतकारों से.
जैसे पानी की बूंदों को ड्राप्लेट्स कहते हैं वैसे ही इन चीज़ों
को कप्लेट्स(couplets) कहा जाता है. कप्लेट्स परिभाषा के
अनुसार तो तुकबंदी में बंधी होनी चाहिये मगर जैसे बिस्कुट,
समोसा कचौड़ी सबको अंग्रेजी प्रेमी कुकीज़ कह कर पुकारते
हैं ये वैसा ही कुछ है.
गीत के बोल:
गीत के बोल:
तुम नहीं भूलती कहाँ जाऊं
हाय मैं क्या करूँ कहाँ जाऊं
महकी महकी फ़िज़ा ये कहती है
तू कहीं आस पास रहती है
चैन से सो रहा है सारा जहां
ए मेरी नींद सो गई तू कहाँ
बुरा हो गया या भला हो गया
मोहब्बत में जो हो गया हो गया
तुम नहीं भूलती जहां जाऊं
हाय मैं क्या करूँ कहाँ जाऊं
महकी महकी फ़िज़ा यह कहती है
तू कहीं आस पास रहती है
चैन से सो रहा है सारा जहां
ऐ मेरी नींद सो गई तू कहाँ
बुरा हो गया या भला हो गया
मोहब्बत में जो हो गया हो गया
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Tum nahin bhoolti-Kanyadan 1968
Artist: Shashi Kapoor

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