आँख को जाम समझ बैठा-जगजीत सिंह गज़ल १९६६
फ़िल्मी गीत. जगजीत सिंह की कोई गज़ल या गीत सुने काफी
दिन हो गए.आज आपको सुनवाते हैं एक उनकी गई हुई पुरानी
गज़ल. इसकी रेकोर्डिंग सन १९६६ में की गयी थी. इसके बोल
लिखे हैं शमीम शहाबादी ने और सी के चौहान का संगीत है.
सुनने वाले इसे सुनते वक्त कहते हैं-विंटेज जगजीत सिंह और
सुनते सुनते खो जाते हैं इसमें. साकिया और जाम का काफी
पुराना बयान है ये. हमने ८० के दशक में ऐसी ग़ज़लें काफी
सुनीं हैं जो अधिकतर पंकज उधास की गायी हुई हैं.
गज़ल के बोल:
आँख को जाम समझ बैठा था, अन्जाने में
आँख को जाम समझ बैठा था, अन्जाने में
आँख को जाम समझ बैठा था, अन्जाने में
साक़िया होश कहाँ था तेरे दीवाने में
जाने किस बात की उनको है शिक़ायत मुझसे
जाने किस बात की उनको है शिक़ायत मुझसे
नाम तक जिन का नहीं है मेरे अफ़साने में
साक़िया होश कहाँ था तेरे दीवाने में
दिल के टुकड़ों से तेरी याद की खुशबू न गई
दिल के टुकड़ों से तेरी याद की खुशबू न गई
बू-ए-मय बाकी है टूटे हुए पैमाने में
साक़िया होश कहाँ था तेरे दीवाने में
दिल-ए-बर्बाद में उम्मीद का आलम क्या है
दिल-ए-बर्बाद में उम्मीद का आलम क्या है
टिमटिमाती हुई एक शमा है वीराने में
साक़िया होश कहाँ था तेरे दीवाने में
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Aankh ko jam samajh baitha-Jagjit Singh gazal
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