ज़ाहिद न कह बुरी-मल्लिका पुखराज ग़ज़ल
दिया करते हैं बिना दाद की इच्छा किये. दाग देहलवी की
लिखी रचना सुनिए. इसे मल्लिका पुखराज ने गाया है.
गज़ल के बोल:
ज़ाहिद
ज़ाहिद न कह बुरी के ये मस्ताने आदमी हैं
ज़ाहिद हाँ, न कह बुरी के ये मस्ताने आदमी हैं
तुझको
तुझको लिपट पड़ेंगे दीवाने आदमी हैं
ग़ैरों की दोस्ती पर
ग़ैरों की दोस्ती पर क्यूँ ऐतबार कीजे
ये दुश्मनी करेंगे बेगाने आदमी हैं
ये दुश्मनी करेंगे बेगाने आदमी हैं
तुमने हमारे दिल में
तुमने हमारे दिल में
तुमने हमारे दिल में घर कर लिया तो क्या है
आबाद करते आख़िर वीराने आदमी हैं
ज़ाहिद न कह बुरी के ये मस्ताने आदमी हैं
क्या चोर है जो हमको
क्या चोर है जो हमको दरबाँ तुम्हारा टोके
कह दो के हाँ कह दो के
कह दो के ये तो जाने-पहचाने आदमी हैं
ज़ाहिद न कह बुरी के ये मस्ताने आदमी हैं
मय बूँद भर पिला कर
मय बूँद भर पिला कर
मय बूँद भर पिला कर क्यूँ हंस रहा है साकी
भर भर
भर भर के दे के आखिर पैमाने आदमी हैं
तुझको हाँ
तुझको लिपट पड़ेंगे दीवाने आदमी हैं
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Zahid na keh buri-Mallika Pukhraj Ghazal

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