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Sep 6, 2017

ज़ुल्फ़ के फंदे फँस गई जाँ-मुजरिम १९५८

एक गीत का मसला है-ये ज़ुल्फ़ कैसी है. गीत सत्तर के दशक
का है. समय समयपर गीतकारों ने जुल्फों की शान में विभिन्न
प्रकार के कसीदे काढ़े हैं.

आज सुनते हैं मजरूह सुल्तानपुरी ने क्या कहा है सन १९५८ की
फिल्म मुजरिम के गीत में. इसे रफ़ी ने गाया है और इसका संगीत
तैयार किया है ओ पी नैयर ने. इस हास्य गीत गीत में गीतकार का
नाम भी आता है.




गीत के बोल:

ज़ुल्फ़ के फंदे फँस गई जाँ
मर गया मैं तो ओ मेरी माँ
ज़ुल्फ़ के फंदे फँस गई जाँ
मर गया मैं तो ओ मेरी माँ

वाह मेरे दाता तेरे दर से अजब तक़दीर मिली
ज़ुल्फ़ की हसरत दिल को हुई तो ज़ंजीर मिली
वाह मेरे दाता तेरे दर से अजब तक़दीर मिली
ज़ुल्फ़ की हसरत दिल को हुई तो ज़ंजीर मिली
ऊपर वाले ख़ूब निकाले इस दिल के अरमाँ
अरे ऊपर वाले ख़ूब निकाले इस दिल के अरमाँ

ज़ुल्फ़ के फंदे फँस गई जाँ
मर गया मैं तो ओ मेरी माँ
ज़ुल्फ़ के फंदे फँस गई जाँ
मर गया मैं तो ओ मेरी माँ

प्यार कुछ बूझे नहीं भला-बुरा सूझे नहीं
दिन हो के रैन
बड़े बूढ़े सच ही तो कह गए
होते नहीं प्यार के नैन
प्यार कुछ बूझे नहीं भला-बुरा सूझे नहीं
दिन हो के रैन
बड़े बूढ़े सच ही तो कह गए
होते नहीं प्यार के नैन
प्यार था अंधा जभी तो ये बंदा
जेल का है मेहमाँ
अरे प्यार था अंधा जभी तो ये बंदा
जेल का है मेहमाँ

ज़ुल्फ़ के फंदे फँस गई जाँ
मर गया मैं तो ओ मेरी माँ
ज़ुल्फ़ के फंदे फँस गई जाँ
मर गया मैं तो ओ मेरी माँ

इश्क़ की दुनिया अजब है कहा था मजरूह ने कल
कुछ ना बनेगा बेटा चकले में घूमो चाहे ताजमहल
इश्क़ की दुनिया अजब है कहा था मजरूह ने कल
कुछ ना बनेगा बेटा चकले में घूमो चाहे ताजमहल
लाख तू भाँपे मंतर जापे
इश्क़ नहीं आसाँ
अरे लाख तू भाँपे मंतर जापे
इश्क़ नहीं आसाँ

ज़ुल्फ़ के फंदे फँस गई जाँ
मर गया मैं तो ओ मेरी माँ
ज़ुल्फ़ के फंदे फँस गई जाँ
मर गया मैं तो ओ मेरी माँ
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Zulf ke phande mein phans gayi jaan-Mujrim 1958

Artist: Johny Walker

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