तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे-पगला कहीं १९७०
चाहेंगे. ये एक संयोग ही है कि रफ़ी के गाये गीत शम्मी के
ऊपर खूब फ़बे. जनता जो अमूमन इस जोड़ी के गीत सुनना
पसंद करती है वे हैं-रोमांटिक गीत. तीसरा नाम भी याद दिला
देते हैं वो है हसरत जयपुरी. अब तीसरा नाम आ गया है तो
एक ही नाम बाकी बचता है वो है शंकर जयकिशन की जोड़ी
का.
रफ़ी को आज गुज़रे पूरे ३५ साल हो गए हैं. संगीत रसिकों को
लेकिन वे हमेशा याद रहे और रहेंगे. कितने ही गायक रफ़ी के
बाद आये और सुने गए मगर वो बात किसी और क्लोन की
आवाज़ में नहीं मिली. चाहे सुर कितना ही पक्का कर लिया हो
क्लोन ने वो टोनल क्वालिटी कहाँ से लाता? किसी भी क्लोन
का मैं यहाँ नाम नहीं लेना चाहूँगा. वे सब अपनी जगह गायक
हैं और अपनी प्रतिभा और क्षमता के अनुसार अपने अपने मुकाम
को हासिल कर चुके हैं.
आज के गीत की विशेषता ये है कि ये हसरत जयपुरी की कलम
से निकला एक दुःख भरा गीत है. हसरत जयपुरी ने सभी प्रकार
के गीत लिखे. लेकिन उनकी पहचान एक खास तरह के गीतों
से ज्यादा होती है. गीत आपको ऐसा लगेगा गुनगुनाने में आसान
है. ये गीत गुनगुनाने के हिसाब से भी कठिन है. इस गीत को
‘नोट-परफेक्ट क्लोन’ भी इतने परफेक्ट तरीके से नहीं गा पाया,
ओर्केस्ट्रा कलाकारों की तो बात ही छोडिये. गीत की धुन ऐसी है
कि आप इसके साथ किसी ख्याल में बहना शुरू कर देते हैं और
आपका संपर्क आपके आस-पास के दायरे से कट जाता है.
अक्सर उनकी पुण्यतिथि पर इस गीत को याद किया जाता है.
ऐसा लगता है कुदरत ने ये गीत उनसे विशेष तौर पर गवाया
ताकि उनके चाहने वाले इस गीत को सुनकर उन्हें हमेशा याद
रखें.
गीत के बोल:
तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे
संग संग तुम भी गुनगुनाओगे
वो बहारें, वो चांदनी रातें
हमने की थीं जो प्यार की बातें
उन नज़ारों की याद आयेगी
जब खयालों में मुझको लाओगे
तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
मेरे हाथों में तेरा चेहरा था
जैसे कोई गुलाब होता है
और सहारा लिया था बाहों का
वो समां किस तरह भुलाओगे
तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
मुझको देखे बिना क़रार न था
एक ऐसा भी दौर गुज़रा है
झूठ मानो तो पूछ लो दिल से
मैं कहूंगा तो रूठ जाओगे
तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे
संग संग तुम भी गुनगुनाओगे
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Tum mujhe yun bhula na paoge-Pagla kahin ka 1970

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