मालिक तेरे जहां में-अब दिल्ली दूर नहीं १९५७
से ओझल हो जाते हैं. क्रूर नियति शायद इसी का नाम
है. फिल्म है अब दिल्ली दूर नहीं(१९५७) . गीत गाया है
सुधा मल्होत्रा ने. यह फिल्म कुछ बेहतर गीतों की वजह
से भी पहचानी जाती है. कहानी तो खैर इसकी, कहा जाए
सीधे शब्दों में तो, उल्लेखनीय है. ये गीत तो फिर भी
बजता हुआ सुनाई दे जाता है विविध भारती पर. बाकी
के-रेडियो अदरक, लहसुन, हरी धनिया इसको शायद ही
कभी बजाते हों.
गीत एक बच्चे पर फिल्माया गया है. जिस थोड़ी सी
अपरिपक्वता की ज़रूरत है इस गीत के लिए सब इसमें
उड़ेल दिया गया है. आसान नहीं होता किसी बच्चे के
किरदार के लिए गीत गाना. गीत शैलेन्द्र का लिखा हुआ
है. फिर, मैं कहूँगा आसान नहीं है शैलेन्द्र जैसे सरल
शब्दों वाले प्रभावी गीत लिखना. शैलेन्द्र, मजरूह, हसरत
और साहिर की रचनाएँ सुन लो, इस हिंदी फिल्म संगीत
के खजाने में कुछ और ढूँढने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.
दत्ताराम शंकर जयकिशन के सहायक थे. उन्होंने कुछ
ही फिल्मों में संगीत दिया और उनके अधिकतर गीत
सुनने लायक हैं.
गीत के बोल:
मालिक तेरे जहां में, इतने बड़े जहाँ में
कोई नहीं हमारा, कोई नहीं हमारा
मालिक तेरे जहां में
अब किसके द्वार जाऊं, दुःख में किसे बुलाऊँ
सब कर गए किनारा, कोई नहीं हमारा
मालिक तेरे जहां में
इस हाल में भी देखो ठुकरा रही है दुनिया
हम पर बनी तो हमसे कतरा रही है दुनिया
हम पर बनी तो हमसे कतरा रही है दुनिया
न आस न दिलासा , सब तो है इक तमाशा
झूठा है हर दिलासा, कोई नहीं सहारा
मालिक तेरे जहां में
सर पे था जिनका साया, मुझसे बिछड गए हैं
उम्मीद के वो मोती, आंसू में ढल गए हैं
उम्मीद के वो मोती, आंसू में ढल गए हैं
क्या रात क्या सवेरा, आठों पहर अन्धेरा
टूटा हर एक तारा, कोई नहीं हमारा
मालिक तेरे जहां में, इतने बड़े जहाँ में
कोई नहीं हमारा, कोई नहीं हमारा
मालिक तेरे जहां में
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Malik tere jahan mein-Ab Dilli door nahin 1957

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