बोलो सजनी बोलो-निर्मला १९३८
है –ये किसी भी वजह से आ सकता है. उदाहरण
के लिए प्रस्तुत गीत-इसकी ऑडियो क्वालिटी इतनी
बढ़िया है कि घिसा हुआ बोलना शायद ‘घिसा’ शब्द
का अपमान होगा. ऐसे भी कई गीत आपको यू-ट्यूब
पर मिल जायेंगे. लोड करने वाला अपने समय के
साथ साथ सुनने वाले के समय को भी चबा जाता
है. फिर भी उसको धन्यवाद कि भले ही गीत गाने
की स्टाइल सुन के न आया हो, गाने की सरसराहट
और थरथराहट से रोना आ गया. हो सकता है ये
स्पेशल इफेक्ट वाला गीत हो, गायक गायिका तूफ़ान
में तैरते हुए गा रहे हों इसलिए आवाज़ स्पष्ट न आ
रही हो.
गीत है अशोक कुमार और देविका रानी अभिनीत
फिल्म निर्मला से. इसे गाया भी दोनों ने खुद ही है.
संगीत सरस्वती देवी का है. अशोक कुमार ने गाया
है इसलिए इसको सुन लिया. बाकी आप इस गीत
की तारीफ़ में कसीदे काढना चाहें तो आपका स्वागत
है. जी हाँ, मैं पुराने गीतों के शौकीनों से ही मुखातिब
हूँ. गीत गौड़ सारंग राग पर आधारित है और कहरवा
ताल में निबद्ध है.
गनीमत है मेरे पास इसका ऑडियो मौजूद है और
मैं उसी को सुन के इसके बोल चिपका रहा हूँ इधर
ताकि पाठकों को रोना न आये. केवल एक दो शब्दों
के बारे में मुझे संदेह है-कि क्या बोला गया है. आशा
है ६/६ कान वाले (तेज आँख के लिए तो यही इस्तेमाल
करते हैं डाक्टर लोग, तेज कान के लिए भी शायद यही
स्पेसिफिकेशन हो) मेरी मदद करेंगे शब्दों की पहचान
में.
गीत के बोल:
बोलो सजनी बोलो
चंदा को देख क्यूँ
कुमुद्कली नहीं फूली
अंग समाती है
बोलो सजनी बोलो
सूरज को देख क्यों
सूर्यमुखी हो मन में दुखी
किल जाती है
है क्या कारण क्या कारण
प्रीतम दर्शन
हाँ, प्रीतम दर्शन
प्रीतम दर्शन प्रीतम दर्शन
आई बहार क्यूँ बुलबुल खुश हो
मस्त तराना गाता है
मैं क्या जानूं
बुलबुल से पूछिए
बहार में क्यूँ मस्त तराना गाता है
बुलबुल गुल से मिल जाता है
बुलबुल गुल से मिल जाता है
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Bolo sajni bolo-Nirmala 1938

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