क्यों ज़िन्दगी की राह में मजबूर-साथ साथ १९८२
व्यर्थ. सार्थक सिनेमा से कुछ लोग समझते हैं-कला फ़िल्में. एक हद
तक तो ये अनुमान ठीक है. कुछ कला फ़िल्में भी आपको शेन वार्न की
गुगली की तरह दिमाग के दांयें हिस्से को छूती हुई कहीं ओझल होती
मालूम पड़ेंगी. अधिकाँश चलचित्र ज्ञानियों की नज़र में निरर्थक सिनेमा
है. ऐसी फ़िल्में जिनमें आप दिमाग का प्रयोग न ही करें तो अच्छा है.
व्यर्थ वर्ग में आने वाली फ़िल्में वे हैं जिन्हें हम कूड़ा फ़िल्में कहते हैं और
जो, जबरन कुछ बनाना है-पैसे बर्बाद करने हैं, इसी प्रयोजन से बनाई
जाती हैं.
सन १९८२ की फिल्म साथ साथ एक साफ़ सुथरी और घरेलु किस्म की
फिल्म है. विश्लेषक इसे सार्थक सिनेमा का हिस्सा मानते हैं. फिल्म का
कथानक एक आदर्शवादी युवक के इर्द गिर्द घूमता है. ये युवक समाजवादी
विचारधारा वाला और सिद्धांतों पर समझौता नहीं करने वाला शख्स है.
समय के साथ मजबूरियों के चलते उसके आदर्श और सिद्धांत धूल खाना
शुरू कर देते हैं. परिवार में द्वन्द होता है इस वजह से और फिल्म के अंत
तक सुबह का भूल वापस घर आ जाता है.
प्रस्तुत गीत नायिका के दुःख का वर्णन है. इसे स्वर दिया है चित्रा सिंह ने.
ने और संगीत तैयार किया है कुलदीप सिंह ने.
गीत के बोल:
क्यों ज़िन्दगी की राह में मजबूर हो गए
इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए
ऐसा नहीं कि हमको कोई भी खुशी नहीं
लेकिन ये ज़िन्दगी तो कोई ज़िन्दगी नहीं
क्यों इसके फ़ैसले हमें मंज़ूर हो गए,
इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए
पाया तुम्हें तो हमको लगा तुमको खो दिया
हम दिल पे रोए और ये दिल हम पे रो दिया
पलकों से ख़्वाब क्यों गिरे क्यों चूर हो गए,
इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए
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Kyun zindagi ki raah mein-Saath saath 1982

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