Showing posts with label Chitra Singh. Show all posts
Showing posts with label Chitra Singh. Show all posts

May 26, 2017

कांटों की चुभन पाई-चित्रा सिंह ग़ज़ल

चित्रा सिंह की गाई एक ग़ज़ल सुनते हैं. संगीत है
जगजीत सिंह का. बोल सुरिंदर मलिक के हैं.




बोल:

कांटों की चुभन पाई फूलों का मज़ा भी
दिल दर्द के मौसम में रोया भी हँसा भी

आने का सबब याद न जाने की खबर है
वो दिल में रहा और उसे तोड़ गया भी

हर एक से मंज़िल का पता पूछ रहा है
गुमराह मेरे साथ हुअ रहनुमा भी

गुमनाम कभी अपनो से जो ग़म हुए हासिल
कुछ याद रहे उन में तो कुछ भूल गया भी
.....................................................................
Kaanton ki chubhan payi-Chitra Singh

Read more...

Apr 26, 2017

उस मोड़ से शुरू करें-गज़ल १९८२

जिंदगी में ऐसे मौके भी आते हैं जब गुज़रा हुआ वक्त
वर्त्तमान से ज्यादा हसीं और लुभावना लगता है. कुछ
रूटीन गज़लों से अलग है ये सुदर्शन फाकिर की लिखी
हुई गज़ल जिसे जगजीत सिंह संग चित्रा सिंह गा रहे
हैं.



गज़ल के बोल:

उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी
उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी
हर शय जहाँ हसीन थी  हम तुम थे अजनबी
उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी

लेकर चले थे हम जिन्हें जन्नत के ख़्वाब थे
फूलों के ख़्वाब थे वो मुहब्बत के ख़्वाब थे
लेकिन कहाँ है इनमें वो  पहली सी दिलकशी
उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी

रहते थे हम हसीन ख़यालों की भीड़ में
उलझे हुए हैं आज सवालों की भीड़ में
आने लगी है याद वो फुरसत की हर घड़ी
उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी
हर शय जहाँ हसीन थी  हम तुम थे अजनबी
उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी

शायद ये वक़्त हमसे कोई चाल चल गया
रिश्ता वफ़ा का और ही रंगो में ढल गया
अश्कों की चाँदनी से थी बेहतर वो धूप ही
उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी
हर शय जहाँ हसीन थी  हम तुम थे अजनबी
उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी
…………………………………………………….
Us mod se shuru Karen-Ghazal Jagjit Singh

Read more...

Feb 15, 2017

चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ाएं-गैर फ़िल्मी गीत

आज एक गैर फ़िल्मी गीत सुनते हैं चित्रा सिंह का गाया हुआ.
बोल लिखे हैं सरदार अंजुम ने और इसकी धुन जगजीत सिंह ने
तैयार की है.

ये सरदार अंजुम वही हैं जिनकी रचना-शराब चीज़ ही ऐसी है
पंकज उधास ने गाई है.




गीत के बोल:

चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ाएं
चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ाएं
ना तुम याद आओ
ना तुम याद आओ ना हम याद आएं
चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ाएं

सभी ने लगाया है चेहरे पे चेहरा
सभी ने लगाया है चेहरे पे चेहरा
किसे याद रखें
किसे याद रखें किसे भूल जाएं

चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ाएं
ना तुम याद आओ
ना तुम याद आओ ना हम याद आएं

उन्हें क्या खबर हो
उन्हें क्या खबर आने वाला ना आया
उन्हें क्या खबर आने वाला ना आया
बरसती रहीं
बरसती रहीं रात भर ये घटाएं

चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ाएं
ना तुम याद आओ
ना तुम याद आओ ना हम याद आएं
...................................................................
Chalo baant lete hain-Non film song

Read more...

Dec 19, 2016

ये तेरा घर ये मेरा घर-साथ साथ १९८२

फिल्म साथ साथ के पिछले गीत सुनवाते वक्त हमने काफी बारूद
खर्च की थी. इस बार बिना बारूद के गीत आपको सुनवा रहे हैं.
विवरण टैग में देख लीजिए. बोलो गूगल देवता की जय.

केवल एक सन्देश- अपने घर से प्रेम करिये चाहे वो एक कमरे का
हो या आलीशान बंगला और अपने संसाधनों में खुश रहना सीखिए.
पडोसी की थाली का घी मत देखिये.



गीत के बोल:

ये तेरा घर ये मेरा घर किसी को देखना हो गर
तो पहले आ के माँग ले मेरी नज़र तेरी नज़र
ये तेरा घर ये मेरा घर
ये घर बहुत हसीन है
ये घर बहुत हसीन है
ये घर बहुत हसीन है

न बादलों की छाँव में न चाँदनी के गाँव में
न फूल जैसे रास्ते बने हैं इसके वास्ते
मगर ये घर अजीब है ज़मीन के क़रीब है
ये ईंट पत्थरों का घर हमारी हसरतों का घर
ये तेरा घर ये मेरा घर
ये घर बहुत हसीन है
ये घर बहुत हसीन है
ये घर बहुत हसीन है

जो चाँदनी नहीं तो क्या ये रोशनी है प्यार की
दिलों के फूल खिल गये तो फ़िक़्र क्या बहार की
हमारे घर न आयेगी कभी खुशी उधार की
हमारी राहतों का घर हमारी चाहतों का घर
ये तेरा घर ये मेरा घर
ये घर बहुत हसीन है
ये घर बहुत हसीन है
ये घर बहुत हसीन है

यहाँ महक वफाओं की मोहब्बतों का रंग है
ये घर तुम्हारा ख्वाब है ये घर मेरी उमंग है
न आरजू पे कैद है ना हौसले पे जंग है
हमारे हौसलों का घर हमारी हिम्मतों का घर

ये तेरा घर ये मेरा घर किसी को देखना हो गर
तो पहले आ के माँग ले मेरी नज़र तेरी नज़र
ये तेरा घर ये मेरा घर
ये घर बहुत हसीन है
ये घर बहुत हसीन है
ये घर बहुत हसीन है
………………………………………………………….
Ye tera ghar ye mera ghar-Saath saath 1982

Artists: Farooq Sheikh, Deepti Naval

Read more...

Nov 17, 2016

हमको दुश्मन की निगाहों से-चित्रा सिंह गज़ल

बहुत दिन हो गए गज़ल सुने हुए. आज सुनते हैं एक अलग
फ्लेवर वाली गज़ल.

इसे लिखा है रईस अख्तर ने और धुन बनाई है जगजीत सिंह
ने. इसे एक्सटेसीज़ नामक एल्बम में रिलीज़ किया गया था.

लंबा समय किसी के साथ गुज़ार लेने के बाद उसपर भरोसा
हो जाना चाहिए और अगर धोखा भी मिले जो खूबसूरत हो
तो उसे गले लगा लें. ये प्रेम के मामले में तो ठीक है मगर
बाकी के केस में क्या करना चाहिए आप समझिए.

गज़ल में साउंड ओवेरलेप का सुन्दर प्रयोग है जो आम तौर
पर गज़लों में प्रयोग नहीं होता है.



गज़ल के बोल:

हमको दुश्मन की निगाहों से न देखा कीजे
हमको दुश्मन की निगाहों से न देखा कीजे
प्यार ही प्यार हैं हम
प्यार ही प्यार हैं हम हम पे भरोसा कीजे
हमको दुश्मन की निगाहों से न देखा कीजे

चंद यादों के सिवा हाथ न कुछ आयेगा
चंद यादों के सिवा हाथ न कुछ आयेगा
इस तरह उम्र-ए-गुरेज़ा का न पीछा कीजे
प्यार ही प्यार हैं हम
प्यार ही प्यार हैं हम हम पे भरोसा कीजे
हमको दुश्मन की निगाहों से न देखा कीजे

रौशनी औरों के आँगन में गवारा न सही
रौशनी औरों के आँगन में गवारा न सही

कम से कम अपने ही घर में तो उजाला कीजे
प्यार ही प्यार हैं हम
प्यार ही प्यार हैं हम हम पे भरोसा कीजे
हमको दुश्मन की निगाहों से न देखा कीजे

क्या ख़बर कब वो चले आयेंगे मिलने के लिये
क्या ख़बर कब वो चले आयेंगे मिलने के लिये
रोज़ पलकों पे नई शमाएँ जलाया कीजे
प्यार ही प्यार हैं हम
प्यार ही प्यार हैं हम हम पे भरोसा कीजे
हमको दुश्मन की निगाहों से न देखा कीजे
.............................................................
 Hamko dushman ki nigahon se-Chitra Singh

Read more...

Oct 27, 2016

हम तो हैं परदेस में-गैर फ़िल्मी गीत

परदेस और परदेसी हिट्स का अपना अलग आकर्षण है श्रोताओं के
बीच. फ़िल्मी और गैर फ़िल्मी गीतों ने बराबर की लोकप्रियता अर्जित
की है. यकीनन चिट्ठी आई है के पदार्पण के पहले तक शायद इसे
सबसे ज्यादा सुना जाता था.

डा. राही मासूम रज़ा का लिखा ये गीत जगजीत और चित्रा सिंह ने
गाया है और धुन भी जगजीत सिंह की है. प्रस्तुत  वीडियो रॉयल
के लाइव प्रोग्राम का है.



गीत के बोल:


हम तो हैं परदेस में
हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद
हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद
अपनी रात की छत पे कितना तन्हा होगा चांद हो
हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद
हम तो हैं परदेस में

चांद बिना हर दिन यूँ बीता जैसे युग बीतें हो
चांद बिना हर दिन यूँ बीता जैसे युग बीतें हो
मेरे बिना किस हाल में होगा
मेरे बिना किस हाल में होगा कैसा होगा चांद हो

हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद
हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद

रात ने ऐसा पेंच लगाया टूटी हाथ से डोर हो
रात ने ऐसा रात ने ऐसा
रात ने ऐसा पेंच लगाया टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जाकर
आँगन वाले नीम में जाकर अटका होगा चांद हो
हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद
हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद
...........................................................................
Ham to hain pardes mein-Non film song

Read more...

Sep 10, 2016

खुदा हमको ऐसी खुदाई-चित्रा सिंह गज़ल

थोडा फ्लेवर बदला जाए और एक गज़ल सुनी जाए. इस
बार आपको सुनवा रहे हैं चित्रा सिंह की गयी एक गज़ल.
बशीर बद्र का कलाम है और संगीत जगजीत सिंह का.

खुदा ऐसे एहसास का नाम है
रहे सामने और दिखाई ना दे

ईश्वर को महसूस ही किया जा सकता है जहाँ तक आम
मनुष्य का सवाल है, इस बात को पुख्ता करती ये गज़ल
और भी कई मसलों को छुपाये हुए है.

सबले अपने अपने यूनीक एक्सपीरियंस होते हैं ईश्वर वाले
विषय में अर्थात हर व्यक्ति का अनुभव दूसरे से जुदा होता
है. ईश्वर कहाँ किस रूप में किस विचार में मिल जाएँ ये
कहना कठिन है.



गज़ल के बोल:

खुदा हमको ऐसी खुदाई ना दे
खुदा हमको ऐसी खुदाई ना दे
के अपने सिवा कुछ दिखाई ना दे
खुदा हमको ऐसी खुदाई ना दे

खतावार समझेगी दुनिया तुझे
खतावार समझेगी दुनिया तुझे
अब इतनी ज्यादा सफाई न दे

खुदा हमको ऐसी खुदाई ना दे
खुदा हमको ऐसी खुदाई ना दे

हँसो आज इतना कि इस शोर में
हँसो आज इतना कि इस शोर में
सदा सिसिकियों की सुनाई न दे

खुदा हमको ऐसी खुदाई ना दे
खुदा हमको ऐसी खुदाई ना दे

अभी तो बदन में लहू है बहुत
अभी तो बदन में लहू है बहुत
कलम छीन ले रोशनाई ना दे

खुदा हमको ऐसी खुदाई ना दे
खुदा हमको ऐसी खुदाई ना दे

खुदा ऐसे एहसास का नाम है
खुदा ऐसे एहसास का नाम है
रहे सामने और दिखाई ना दे

खुदा हमको ऐसी खुदाई ना दे
के अपने सिवा कुछ दिखाई ना दे
खुदा हमको ऐसी खुदाई ना दे
.....................................................
Khuda hamko aisi khudai na de-Chitra Singh Ghazal

Read more...

Aug 13, 2016

सफ़र में धूप तो होगी-गज़ल चित्रा सिंह

निदा फाज़ली की लिखी हुई एक गज़ल सुनते हैं चित्रा सिंह
की आवाज़ में. इसका संगीत जगजीत सिंह ने तैयार किया
है.

जिंदगी का फलसफा है निदा फाज़ली की नज़र से. कोम्पीटीशन
का ज़माना है और गलाकाट प्रतिस्पर्धा. इस दौर में ये ज्यादा
प्रासंगिक मालूम पड़ती है. यहाँ समय के अनुसार खिलौनों को
आप गैजेट्स समझ लें.



सफ़र में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सफ़र में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी, निकल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी, निकल सको तो चलो

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को, ख़ुद ही, बदल सको तो चलो
तुम अपने आप को, ख़ुद ही, बदल सको तो चलो

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिरा के, अगर तुम, सम्भल सको तो चलो
मुझे गिरा के, अगर तुम, सम्भल सको तो चलो

सफ़र में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो

यही है ज़िंदगी, कुछ ख़ाक, चंद उम्मीदें
यही है ज़िंदगी
यही है ज़िंदगी, कुछ ख़ाक, चंद उम्मीदें
इन्ही खिलौनों से, तुम भी, बहल सको तो चलो
इन्ही खिलौनों से, तुम भी, बहल सको तो चलो

सफ़र में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी, निकल सको तो चलो
सफ़र में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
..................................................................
Safar mein dhoop to hogi-Ghazal Chitra Singh

Read more...

Jul 11, 2016

मेरे दुःख की कोई दवा न करो-चित्रा सिंह गज़ल

सुदर्शन फ़ाकिर की लिखी हुई एक और गज़ल सुनते हैं आज
जिसे चित्रा सिंह ने गाया है. जगजीत सिंह ने इसका संगीत
तैयार किया है.

इस गज़ल को आप जगजीत सिंह के एल्बम समवन सम्व्हेयर
में सुन सकते हैं.



गज़ल के बोल:

मेरे दुख की कोई दवा न करो
मुझको मुझसे अभी जुदा न करो

नाख़ुदा को ख़ुदा कहा है तो फिर
डूब जाओ ख़ुदा ख़ुदा न करो

यह सिखाया है दोस्ती ने हमें
दोस्त बनकर कभी वफ़ा न करो

इश्क़ है इश्क़ यह मज़ाक नहीं
चंद लम्हों में फ़ैसला न करो

आशिक़ी हो या बंदगी फ़ाकिर
बे-दिली से तो इब्तिदा न करो
.................................................................
Mere dukh ki koi dawa-Chitra Singh ghazal

Read more...

May 28, 2016

आदमी आदमी को क्या देगा-जगजीत सिंह गज़ल १९९०

अपच और बदहजमी से बचने का उपाय है बीच-बीच में लवण भास्कर
चूर्ण लेते रहें या कायम चूर्ण लेते रहें. ये कोई आयुर्वेदिक दवा सुझाने
वाली वेबसाईट नहीं अपितु एक गीत संगीत वाला ब्लॉग है. ये तो
जो फ़िल्मी गीत का ओवरडोज हो जाता है तब चेंज के लिए आपको
बीच में एक आध गज़ल या गैर फ़िल्मी गीत सुनवा दिया करते हैं.

आज सुनेंगे जगजीत सिंह की गई हुई और जीवन दर्शन पर  से संबद्ध
एक गज़ल जिसे सुदर्शन फाकिर ने लिखा है. इसका संगीत स्वयं
जगजीत सिंह ने तैयार किया है. सन १९९० के एल्बम-समवन समव्हेयर
में इसे पहली बार सुना गया था. मुन्सिफ शब्द का अर्थ है इन्साफ करने
वाला.




गज़ल के बोल:

आदमी आदमी को क्या देगा
जो भी देगा वहीं खुदा देगा

मेरा कातिल ही मेरा मुन्सिफ है
क्या मेरे हक़ में फैसला देगा

जिन्दगी को करीब से देखो
इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा

हमसे पूछो दोस्ती का सिला
दुश्मनों का दिल हिला देगा

इश्क का जहर पी लिया फ़ाकिर
अब मसीहा भी क्या दवा देगा
..................................................................................................
Aadmi aadmi ko kya dega-Jagjit Singh Gazal 1990

Read more...

Feb 12, 2015

क्यों ज़िन्दगी की राह में मजबूर-साथ साथ १९८२

फिल्मों का वर्गीकरण आप यूँ भी कर सकते हैं- सार्थक, निरर्थक और
व्यर्थ.  सार्थक सिनेमा से कुछ लोग समझते हैं-कला फ़िल्में. एक हद
तक तो ये अनुमान ठीक है. कुछ कला फ़िल्में भी आपको शेन वार्न की
गुगली की तरह दिमाग के दांयें हिस्से को छूती हुई कहीं ओझल होती
मालूम पड़ेंगी. अधिकाँश चलचित्र ज्ञानियों की नज़र में निरर्थक सिनेमा
है. ऐसी फ़िल्में जिनमें आप दिमाग का प्रयोग न ही करें तो अच्छा है.
व्यर्थ वर्ग में आने वाली फ़िल्में वे हैं जिन्हें हम कूड़ा फ़िल्में कहते हैं और
जो, जबरन कुछ बनाना है-पैसे बर्बाद करने हैं, इसी प्रयोजन से बनाई
जाती हैं. 

सन १९८२ की फिल्म साथ साथ एक साफ़ सुथरी और घरेलु किस्म की
फिल्म है. विश्लेषक इसे सार्थक सिनेमा का हिस्सा मानते हैं. फिल्म का
कथानक एक आदर्शवादी युवक के इर्द गिर्द घूमता है. ये युवक समाजवादी
विचारधारा वाला और सिद्धांतों पर समझौता नहीं करने वाला शख्स है.
समय के साथ मजबूरियों के चलते उसके आदर्श और सिद्धांत धूल खाना
शुरू कर देते हैं. परिवार में द्वन्द होता है इस वजह से और फिल्म के अंत
तक सुबह का भूल वापस घर आ जाता है.

प्रस्तुत गीत नायिका के दुःख का वर्णन है. इसे स्वर दिया है चित्रा सिंह ने.
ने और संगीत तैयार किया है कुलदीप सिंह ने.





गीत के बोल:

क्यों ज़िन्दगी की राह में मजबूर हो गए
इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए

ऐसा नहीं कि हमको कोई भी खुशी नहीं
लेकिन ये ज़िन्दगी तो कोई ज़िन्दगी नहीं
क्यों इसके फ़ैसले हमें मंज़ूर हो गए,

इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए

पाया तुम्हें तो हमको लगा तुमको खो दिया
हम दिल पे रोए और ये दिल हम पे रो दिया
पलकों से ख़्वाब क्यों गिरे क्यों चूर हो गए,

इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए
.................................................................
Kyun zindagi ki raah mein-Saath saath 1982

Read more...

Jul 6, 2009

तुम को देखा तो ये ख़याल आया-साथ साथ १९८२

फ़िल्म संगीत में गजलों का दौर एक बार फ़िर से ८० के दशक के
शुरुआती हिस्से में चालू हुआ। जगजीत सिंह को इस फ़िल्म में
बहुत से गीत गाने का मौका मिला। बोल जावेद अख्तर के हैं और
संगीत कुलदीप सिंह का। फारूख शेख और दीप्ति नवल अभिनीत इस
फ़िल्म के गीत बहुत सुने गए । ज़िन्दगी को धुप और प्रेमिका को
घना साया बतलाने की ये दास्तान आपने पहले शायद ही किसी
गीत में सुनी हो !




गाने के बोल:

तुम को देखा तो ये ख़याल आया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया

तुम को देखा तो ये ख़याल आया

आज फिर दिलने एक तमन्ना की
आज फिर दिलने एक तमन्ना की
आज फिर दिलको हमने समझाया

ज़िंदगी धूप तुम घना साया...

तुम चले जाओगे तो सोचेंगे
तुम चले जाओगे तो सोचेंगे
हमने क्या खोया, हमने क्या पाया

ज़िंदगी धूप तुम घना साया...

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते
हम जिसे गुनगुना नहीं सकते
वक़्त ने ऐसा गीत क्यूँ गाया

ज़िंदगी धूप तुम घना साया...

Read more...
© Geetsangeet 2009-2020. Powered by Blogger

Back to TOP