याद न जाए बीते दिनों की-दिल एक मंदिर १९६३
तरह तरह के नुस्खे हैं. ब्राह्मी एक जड़ी है जो दिमाग को तेज
करती है. शंखपुष्पी एक और दावा है जो दिमाग के लिए ही है.
आम तौर पर बादाम अखरोट का सेवन किया जाता है, जिसमें
अखरोट की संरचना तो बिलकुल मानव मस्तिष्क जैसी ही होती
है. अखरोट को काफी फायदेमंद बताया जाता है.
इतनी सारी फिल्मों को और उनके गीतों को याद रखना आसान
काम नहीं. कई बार घाल मेल हो जाता है और भ्रम की स्तिथि
भी उत्पन्न होती है. किसी फिल्म के हीरो का किसी दूसरी फिल्म
में पहुँच जाना, किसी फिल्म का गाना किसी दूसरी फिल्म में फिट
हो जाना. दिल अपना और प्रीत परायी , दिल एक मंदिर के गीतों
में अक्सर गफलत हो जाती, कौन सा किस फिल्म का है बता पाना
मेरे लिए मुश्किल होता. गौरतलब है दोनों ही फिल्मों में संगीत
शंकर जयकिशन ने दिया है. दोनों फिल्मों में मीना कुमारी नायिका
हैं.
एक बात तय है वो ये कि जो गीत आज आप सुनेंगे वो लाजवाब
है, शैलेन्द्र की लेखनी से निकला है, शंकर जयकिशन की धुन पर
इसे रफ़ी ने बड़ी तन्मयता के साथ गाया है.
गीत के बोल:
याद न जाए बीते दिनों की
जा के न आये जो दिन
दिल क्यूँ बुलाए उन्हें
दिल क्यूँ बुलाए
याद न जाए बीते दिनों की
जा के न आये जो दिन
दिल क्यूँ बुलाए उन्हें
दिल क्यूँ बुलाए
दिन जो पखेरू होते पिंजरे में मैं रख लेता
दिन जो पखेरू होते पिंजरे में मैं रख लेता
पालता उनको जतन से
पालता उनको जतन से
मोती के दाने देता
सीने से रहता लगाये
याद न जाए बीते दिनों की
जा के न आये जो दिन
दिल क्यूँ बुलाए उन्हें
दिल क्यूँ बुलाए
तस्वीर उनकी छुपा के रख लूं जहाँ जी चाहे
तस्वीर उनकी छुपा के रख लूं जहाँ जी चाहे
मन में बसी ये सूरत
मन में बसी ये सूरत
लेकिन मिटे न मिटाए
कहने को वो हैं पराये
याद न जाए बीते दिनों की
जा के न आये जो दिन
दिल क्यूँ बुलाए उन्हें
दिल क्यूँ बुलाए
……………………………………………...
Yaad na jaye-Dil ek mandir 1963

2 comments:
Good
Very Good
Post a Comment