बीते हुए लम्हों की कसक-निकाह १९८२
एक कवि ने यह कहा है-बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो
होगी. उसके आगे वाली पंक्ति एकदम कंट्रास्ट है-ख्वाबों में
ही हो चाहे मुलाकात तो होगी. कॉम्प्लेक्स किस्म के इमोशंस
के घोल में लिपटी हैं पंक्तियाँ. व्याख्या करने बैठो तो पन्ने
भर जाएँ. ऐसे ही गूढ़ अर्थ वाले गीत कभी कभी हमें सोचने
पर मजबूर कर देते हैं कि फिल्म संगीत वाकई एक बड़ा
खज़ाना है जिसमें तरह तरह के रत्न बिखरे पड़े हैं.
जीवन में बीते हुए लम्हों और दिनों की यादें जेहन में रह ही
जाती हैं. कितना भुलाने की कोशिशें की जाएँ, वे पीछा नहीं
छोड़तीं.
फिल्म निकाह अपने समय की बड़ी हिट फिल्म है. इसमें जिन
कलाकारों ने अभिनय किया-राज बब्बर, सलमा आगा, दीपक
पराशर वे अब फिल्मों में सक्रिय नहीं के बराबर हैं. राज बब्बर
का फ़िल्मी कैरियर तो लंबा चला मगर दीपक पराशर और
सलमा आगा समय के साथ नेपथ्य में चले गए. सलमा आगा
तो अभिनय के साथ साथ गायन में भी सक्रिय थीं. कुछ एक
गीत गाने के बाद उन्हें भी अवसर मिलना बंद हो गए.
फिल्म जगत में कुछ इस तरह के कलाकार होते हैं-एक फिल्म
की चमक वाले, ४-५ फिल्मों तक चलने वाले, शुरूआत से ही न
चलने वाले, ४-५ साल तक दिखने वाले, एक दशक तक चलने
वाले, अपनी पूरी उम्र तक सक्रिय रहने वाले. इनमें से कुछ ही
कलाकार ऐसे हैं जो अपनी पूरी जिंदगी भर सक्रिय रहे या हैं.
महानायक अमिताभ बच्चन उन सौभाग्यशालियों में से हैं. उन्हीं
के पदचिन्हों पर शाहरुख भी जाते दिखाई दे रहे हैं. ये तो समय
ही बतलायेगा कि किंग खान ६० की उम्र तक सक्रिय रहते हैं या
नहीं.
सदाबहार कलाकार वे होते हैं जो समय समय पर अपनी उपस्थिति
दर्ज करते आपको मिल जायेंगे. उनकी सेहत पर बाकी के माहौल
का असर नहीं दिखलाई देता है. अभिनेता संजीव कुमार सदाबाहर
कलाकार थे. स्मिता पाटिल एक और सदाबहार अदाकारा थीं. ये
वे कलाकार हैं जिनकी फिल्मों का जनता बेसब्री से इंतज़ार किया
करती थी.
आज आपको निकाह से यही गीत सुनवा रहे हैं जिसे गाया है एक
सदाबाहर गायक ने-महेंद्र कपूर. इसे लिखा है हसन कमाल ने और
इसकी धुन बनाई है संगीतकार रवि ने जिन्हें बहुत ही कम लोग
रविशंकर शर्मा के नाम से जानते हैं.
गीत के बोल:
अभी अलविदा मत कहो दोस्तों
न जाने फिर कहाँ मुलाक़ात हो
क्यों कि
बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी
ख़्वाबों में ही हो चाहे मुलाक़ात तो होगी
ये प्यार ये डूबी हुई रँगीन फ़िज़ाएं
ये चहरे ये नज़ारे ये जवाँ रुत ये हवाएं
हम जाएं कहीं इनकी महक साथ तो होगी
बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी
ख़्वाबों में ही हो चाहे मुलाक़ात तो होगी
फूलों की तरह दिल में बसाए हुए रखना
यादों के चिराग़ों को जलाए हुए रखना
लम्बा है सफ़र इस में कहीं रात तो होगी
बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी
ख़्वाबों में ही हो चाहे मुलाक़ात तो होगी
ये साथ गुज़ारे हुए लम्हात की दौलत
जज़्बात की दौलत ये ख़यालात की दौलत
कुछ पास न हो पास ये सौगात तो होगी
बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी
ख़्वाबों में ही हो चाहे मुलाक़ात तो होगी
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Beete hue lamhon ki kasak-Nikaah 1982

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