मंजिलें अपनी जगह-शराबी १९८४
अमिताभ बच्चन वाली. दोनों के गीत अपने अपने
समय पर खूब बजे. अब दोनों युगों की तुलने करें
तो आप इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि नयी शराबी
के गीत ज्यादा सुने गए. शराब के मामले में तो ऐसा
है कि पुरानी शराब ज्यादा असर करती है. यहाँ तो
फिल्म और फिल्म के नाम का सवाल है. पुरानी तो
श्वेत श्याम थी नयी वाली रंगीन है. फिल्म में एक
गीत है-मंजिलें अपनी जगह. इसकी एक पंक्ति है-
कश्तियाँ साहिल पे अक्सर डूबती हैं प्यार की. ऐसा
कई प्रेम कथानकों में हमने पढ़ा और सुना है-कोई
तीसरे कोण की भेंट चढ जाती हैं तो कई खाप
पंचायतों की. कुछ ही खुशकिस्मत किसी खुशनुमा
फिल्म की तरह अपना प्रेमी-जीवन आसानी से गुज़ार
पाते हैं. गीत प्रकाश मेहरा ने लिखा है और इसकी
धुन बनाई बप्पी लहरी ने जिसे गाया किशोर ने.
गीत के बोल:
मंजिलों पे आ के लुटते हैं दिलों के कारवां
कश्तियां साहिल पे अक्सर डूबती हैं प्यार की
मंजिलें अपनी जगह हैं रस्ते अपनी जगह
मंजिलें अपनी जगह हैं रस्ते अपनी जगह
जब कदम ही साथ न दे तो मुसाफिर क्या करे
यूँ तो है हमदर्द भी और हमसफ़र भी है मेरा
बढ़ के कोई हाथ न दे दिल भला फिर क्या करे
मंजिलें अपनी जगह हैं रस्ते अपनी जगह
डूबने वाले को तिनके का सहारा ही बहुत
दिल बहाल जाए फकत इतना इशारा ही बहुत
इतने पर भी आसमान वाला गिरा दे बिजलियाँ
कोइ बतला दे ज़रा ये डूबता फिर क्या करे
मंजिलें अपनी जगह हैं रस्ते अपनी जगह
प्यार करना जुर्म है तो जुर्म हमसे हो गया
काबिल-ऐ-माफ़ी हुआ करते नहीं ऐसे गुनाह
संगदिल है ये जहाँ और संगदिल मेरा सनम
क्या करे जोश-ऐ-जूनून और हौसला फिर क्या करे
मंजिलें अपनी जगह हैं रस्ते अपनी जगह
जब कदम ही साथ न दे तो मुसाफिर क्या करे
यूँ तो है हमदर्द भी और हमसफ़र भी है मेरा
बढ़ के कोई हाथ न दे दिल भला फिर क्या करे
मंजिलें अपनी जगह हैं रस्ते अपनी जगह
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Manzilen apni jagah-Sharabi 1984

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