देख लो आज हमको जी भर-बाज़ार १९८२
के ही समझ में एक्युरेटली आता है अधिकतर के नहीं. ज़्यादातर
लोग इस बात पर कंफ्यूस्ड रहते हैं कम, मध्यम और ज्यादा पर.
इस गीत के माध्यम से समझें मसला क्या है. जैसे वेदना अपने
कम, मध्यम और तीव्र स्तर पर हो सकती है वैसे ही उत्कंठा भी
अपनी किसी भी अवस्था को प्राप्त कर सकती है. भावातिरेक में
ये विभिन्न स्तरों पर डोलती है.
मूक अभिनय को स्किट्स या माईम कहा जाता है. इस गीत में
भावाभिव्यक्ति अनूठी है और इसको अगर आप कमर्शियल फिल्मों से
तुलना करें तो थोडा अलग पायेंगे. ग्लीसरीन वाले आंसू ज़बरन नहीं
निकले जा रहे हैं गीत में. आंसू पहले नायक बहाना शुरू करता है.
शायद नायिका ज्यादा दृड मनोबल वाली है अथवा उसका मनोबल
भी एक सैलाब में बहना शुरू होने वाला है. यहाँ भाव उबलने और
बाहर आने को उतावले हैं मगर नायिका के चहरे पर सब्र का एक
बाँध जैसा खिंचा हुआ है और पार्श्व के गीत के माध्यम से ही सब
कुछ कहा जा रहा है. दोनों को मालूम है अब मिलना नहीं होगा
आगे.
फारूख शेख और सुप्रिया पाठक बहुत ही आला दर्जे के कलाकार हैं.
सुप्रिया पाठक को फिल्म के लिए सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर
पुरस्कार मिला है. सुप्रिया उन बिरले कलाकारों में से एक हैं जो छोटे
और बड़े परदे पर समान रूप से सक्रिय हैं.
मिर्ज़ा शौक के लिखे गीत को गाया है जगजीत कौर ने और धुन है
खय्याम की. मुझे पूरा यकीन है इस गीत के लिए जगजीत से बेहतर
आवाज़ खय्याम को नहीं मिलती.
गीत के बोल:
देख लो आज हमको जी भर के
देख लो आज हमको जी भर के
कोई आता नहीं है फिर मर के
देख लो आज हमको जी भर के
हो गए तुम अग़रचे सौदाई
दूर पहुँचेगी मेरी रुसवाई
देख लो
देख लो आज हमको जी भर के
आओ अच्छी तरह से कर लो प्यार
के निकल जाएँ कुछ दिल का बुखार
देख लो आज हमको जी भर के
देख लो आज हमको जी भर के
फ़िर हम उठने लगे बिठा लो तुम
फ़िर बिगड जाएँ हम मना लो तुम
देख लो आज हमको जी भर के
याद इतनी तुम्हें दिलाते जाएँ
पान कल के लिए लगाते जाएँ
देख लो
देख लो आज हमको जी भर के
कोई आता नहीं है फिर मर के
देख लो आज हमको जी भर के
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Dekh lo aaj hamko jee bhar ke-Bazaar 1982
Artists: Farooq Sheikh, Supriya Pathak
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