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Jul 18, 2011

उल्फत में ज़माने की हर रस्म २-कॉल गर्ल १९७४

आपने किशोर की आवाज़ में कॉल गर्ल का सदाबाहर गीत सुना कुछ
पोस्ट पहले. अब सुनिए उसी गीत का लता मंगेशकर वाला संस्करण.
नायिका और नायक क्रमशः वही हैं इसमें -जाहिरा और विक्रम. अमर
नायक के चरित्र का नाम है और माया नायिका के चरित्र का. विक्रम
की संवाद अदायगी ऐसी है जैसे कोई परचा पढ़ा जा रहा हो.

नायिका फिल्म में कॉल गर्ल के मिरोल में है. अब नायक की पेशकश से
वो उलझन में पढ़ गयी है. आगे गीत है उसमें क्या होगा देखिये .

गौर फरमाईयेगा कि इसके बोल पुरुष आवाज़ वाले वर्जन से अलग हैं.
मुझे दोनों गीत समान रूप से पसंद हैं. दोनों के ही बोल लाजवाब हैं.
धुन तो एक समान है अतः ज्यादा कसीदाकारी न करते हुए इस पोस्ट
पर इधर ही ब्रेक दे देते हैं.




गीत के बोल:

उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
फिर साथ मेरे आओ, ओ ओ ओ ओ ओ

उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ

दुनिया से बहुत आगे जिस राह पे हम होंगे
ये सोच लो पहले से हर मोड पे ग़म होंगे
है खौफ ग़मों से तो रुक जाओ, ठहर जाओ

उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ

मैं टूटी हुई कश्ती खुद पार लगा लूँगी
तूफ़ान के मौजों की पतवार बना लूँगी
मझधार का डर है तो साहिल पे, ठहर जाओ

उल्फ़त में ज़माने की, हर रस्म को ठुकराओ

दिल और कहीं दे कर तुम चाह बदल डालो
बेहतर तो यही होगा ये राह बदल डालो
दो चार क़दम चल कर मुमकिन है बहक जाओ

उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
फिर साथ मेरे आओ, ओ ओ ओ ओ ओ

उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
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Ulfat mein zamane ki-Call Girl 1974

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Jul 17, 2011

उल्फत में ज़माने की हर रस्म को-कॉल गर्ल १९७४

सन १९७४ की फिल्म है कॉल गर्ल. फिल्म में विक्रम के साथ ज़ाहिरा
प्रमुख कलाकार हैं. फिल्म चली हो या न हो, प्रस्तुत गीत किशोर कुमार
के गाये सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों में से एक है. जितने सुन्दर बोल नक्श
लायलपुरी के हैं उतनी ही बदिया धुन संगीतकार सपन जगमोहन ने बनाई
है. सपन जगमोहन के संगीतबद्ध ३ अच्छे गीत पहले आपको सुनवा चुके
हैं इस ब्लॉग पर. ये गीत समय के बंधन से मुक्त गीत है जिसे जब सुनो
बढ़िया ही लगता है.

आइये आनंद उठाया जाए किशोर कुमार के इस गीत का जिसे परदे पर विक्रम
गा रहे हैं. कुछ संगीत प्रेमियों की गीत के साथ कल्पननाये उगाने की आदत
होती है जैसे -फलां गीत राजेश खन्ना पर फिल्माया जाना था, फलां गीत
धर्मेन्द्र पर फिल्माया जाना था. एक कोशिश मैं भी कर लेता हूँ आज.

मेरी राय में विक्रम अच्छे लग रहे हैं इस गीत को गाते हुए, अगर वाकई किसी
और कलाकार की कल्पना आप करना चाहें की किसके ऊपर ये जंचता तो इस
मामले में मेरी पसंद होगी-देव आनंद. जिस तरीके की गायकी इस गीत में
है वो देव आनंद के ऊपर फिल्माए गए गीतों से मेल खाती है.

गीत की शुरुआत में जो माहिला कलाकार परदे पर विक्रम से बातें करते दिखाई
देती हैं उनका नाम है-उर्मिला भट्ट.




गीत के बोल:


उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ

क़दमों को ना रोकेगी, ज़ंजीर रिवाज़ों की
हम तोड़ के निकलेंगे, दीवार समाजों की
दूरी पे सही मंज़िल, दूरी से ना घबराओ

उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ

मैं अपनी बहारों को, रंगीन बना लूँगा
सौ बार तुम्हें अपनी, पलकों पे बिठा लूँगा
शबनम की तरह मेरे, गुलशन में बिखर जाओ

उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ

आ जाओ के जीने के, हालात बदल डालें
हम तुम ज़माने के, दिन रात बदल डालें
तुम मेरी वफ़ाओं की, एक बार क़सम खाओ

उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
फिर साथ मेरे आओ, ओ ओ ओ ओ
उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
...................................
Ulfat mein zamane ki-Call Girl 1974

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