आशा भोंसले से संगीतकारों ने कई नायाब गीत गवाए हैं. ये बात
और है कि उनके कई मधुर गीत प्रसिद्धि के मामले में पीछे रह
गए. हर गाना ठाकुर जरनैल सिंह फिल्म के गाने-हम तेरे बिन
जी ना सकेंगे सनम जैसा नहीं होता जो कि फिल्म का अता पता
मालूम ना होने के बावजूद आम जनता को बेहद पसंद आया और
आज भी इस गाने के मुरीद मौजूद हैं.
यू ट्यूब के आविष्कार को पूरे १४ वर्ष हो चुके हैं. इसके पहले तक
फिल्मों को देख पाना आसान नहीं था. आज तो कम्पनियाँ खुद
अपनी फ़िल्में यू ट्यूब पर डाल रही हैं और जनता को आसानी से
फ़िल्में देखने को मिल जाती हैं. हमारे यहाँ इन्टरनेट बैलगाडी की
गति से थोडा ऊपर उठ कर साइकिल और मोपेड पर आ चुका है.
बफेलो और बफरिंग अभी कुछ समय और साथ साथ चलेंगे.
एक फिल्म जिसे देख पाना दुर्लभ अनुभव था-संजीव कुमार और
तनूजा अभिनीत गुस्ताखी माफ. इसमें एक दो कर्णप्रिय गीत हैं.
आपको मैं पहले वो सुनवाऊंगा जिसे मैंने पहले पहल सुना था काफी
साल पहले. नक्श लायलपुरी के बोल हैं. लायलपुर के मिटटी पकड़
पहलवान हैं वे. साहित्य के एलेमेंट्स को जिंदा रखने वाले कुछ
चुनिन्दा फ़िल्मी गीतकारों में गिने जाते हैं.
इस गीत में तनूजा अपनी नपी तुली अभिनय क्षमता में जो भी कुछ
संभव है कर रही हैं. उनके चेहरे की बनावट ही ऐसी है/थी कि उनके
लिए ज्यादा उतार चढ़ाव ला पाना या भाव भंगिमाएं बना पाना आसान
ना था. हालांकि इस मामले में उन्होंने काफी सुधार किया और मेरे
हिसाब से सन १९७२ की फिल्म दो चोर में उनका अभिनय बेहतर
दिखाई दिया. कैरियर के उत्तरार्ध में उनका अभिनय बेहतर नज़र
आता है और उसकी वजह चेहरे पर उम्र का असर होना रहा जिससे
उन्हें भाव उभारने में काफी सहूलियत मिली. बूढा कोई नहीं होना
चाहता. आयु की ये अवस्था जीवनचक्र का हिस्सा है जिससे कोई भी
अछूता नहीं रहा. सच यही है. उम्र के इस पड़ाव में जैसा कि सबके
साथ होता आया है और आगे होता रहेगा-उन्हें चरित्र भूमिकाएं ही मिलीं.
अभिनय में निरंतरता बनाये रखना काफी दुष्कर कार्य होता है फिल्मों
में काम करते वक्त. फिल्म के शॉट्स एक सीक्वेंस में नहीं लिए जाते.
कभी फिल्म का आखिरी शॉट पहले फिल्म लिया जाता है. कभी कोई
गीत को फिल्माने में १० दिन लग जाते हैं. मान लीजिए कोई रेगिस्तान
का दृश्य है और गीत के पहले अंतरे में नायक का चेहरा स्वस्थ सा
लग रहा है और गीत के तीसरे अंतरे तक जुकामी सा दिखाई देने लगे,
इसकी वजह गीत के २ दिन के फिल्मांकन के बाद नायक को जुकाम
हो जाना भी होता था. ये भावान्तर आपको कुशल निर्देशकों के कार्य में
कम मिलेगा.
इस गीत की शुरुआत नायिका के चहरे के क्लोज़ अप शॉट के साथ
शुरू होती है. जैसे जैसे कैमरा दूर होता जाता है भाव धुधले से होने
लग पढते हैं. जब नायिका अंतरा गाना शुरू करती है तो झाडियों में
से प्रकट होने के साथ उसके चेहरे पर आते हुए दुखद तटस्थता के
भाव धीमे धीमे नायक के कंधे से चिपटते ही खामोश राहत में
तब्दील होने लगते है. हालांकि किंचित सा संदेह अभी भी नायिका के
चेहरे पर है. नींदें चुरा लेंगे, ख्वाबों में घुल जायेंगे जैसे सिहराने वाले
बोल सुन कर नायक एक बारगी चौंक जाता है और नायिका की ओर
कुतूहल से देखता है. नायक बेचैन सा हो कर चल देता है और नायिका
प्रश्नवाचक दृष्टि घुमाते हुए पीछे चलते हुए संदेह में भय घोल कर दूसरा
अंतरा शुरू करती है. फिर होता है भावनात्मक आक्रमण और पलकों पर अश्क बन कर लहराने और दामन में सो जाने की बात. इससे नायक का
ह्रदय थोडा द्रवित होता है और वो नायिका को गले से लगा लेता है.
एक निश्चित अलगाव वाले विचार से क्षण भर ही सही मुक्त हो कर नायक
नायिका के आलिंगन को स्वीकारता है फिर दूर छिटक जाता है.
वैचारिक द्वन्द में आदमी तथ्य भूल जाता है तब उसे कुछ बातें याद
दिलाना पढ़ती हैं. तीसरे अंतरे में ऐसा ही कुछ हो रहा है जिसमें नायिका
नायक की नम हुई आँखों और कातरता को भांपते हुए उसे जिंदगी की
कसम देती है और उससे पहल करने का निवेदन करती है. सरल शब्दों में
इससे खूबसूरत तरीका नहीं मिल सकता जब कहा जाए-हम दूर तक आ गये तुम भी चलो दो कदम. प्रेम में प्रतिबद्धता का चरम है यह.
परामर्शपूर्वक निवेदन के प्रत्युत्तर में अपेक्षा है सार्थक पहल की.
गीत प्रश्न में ही खत्म हो जाता है. दो कदम चलने की प्रक्रिया की
पूर्णता है. यह एक इकाई है जिसमें दोनों पांव बराबर दूरी तय करते हैं.
संजीव कुमार को नैसर्गिक कलाकार कहा जाता है. उन्हें रीटेक की ज़रूरत ना के बराबर पड़ती थी. गीत का प्रभाव उनके चहरे पर कशमकश खत्म होने के बाद आने वाली तड़प के फॉर्म में आ ही जाता है. इस गीत का फिल्मांकन बेहतरीन है. किसी भी चीज़ का ओवरडोज नहीं है. इसी गीत की धुन को संगीतकार ने सन १९८५ की फिल्म अम्बर में पुनः प्रयोग किया है और किशोर कुमार से वो गीत गवाया है जिसे हम बाद में सुनेंगे.
गुस्ताखी माफ फिल्म के फोटोग्राफी डायरेक्टर हैं राजकुमार भाखरी,
कैमरामेन एस एल शर्मा और उनके सहायक द्वारका और फिल्म के
एडिटर श्याम. इस गीत को नक्श लायलपुरी ने लिखा है और इस
गीत के संगीतकार हैं सपन-जगमोहन.
भूल चूक लेनी देनी
गीत के बोल:
तुम दूर जाओगे कैसे दामन बचाओगे कैसे
हमें तुम भुला ना सकोगे
तुम दूर जाओगे कैसे दामन बचाओगे कैसे
हमें तुम भुला ना सकोगे
तुम दूर जाओगे कैसे
जितना भुलाओगे तुम उतना ही याद आयंगे
नींदें चुरा लेंगे हम ख्वाबों में घुल जायेंगे
ख्वाबों में घुल जायेंगे तड़पेंगे तड़पायेंगे
हो ओ ओ ओ
तुम दूर जाओगे कैसे दामन बचाओगे कैसे
हमें तुम भुला ना सकोगे
तुम दूर जाओगे कैसे
दिल की लगी बन के हम दिल में सुलग जायेंगे
पलकों पे आ कर कभी अश्कों में लहरायेंगे
अश्कों में लहरायेंगे दामन में सो जायेंगे
हो ओ ओ ओ
तुम दूर जाओगे कैसे दामन बचाओगे कैसे
हमें तुम भुला ना सकोगे
तुम दूर जाओगे कैसे
खुद पे ना ढाओ सितम तुम्हें जिंदगी की कसम
हम दूर तक आ गये तुम भी चलो दो कदम
तुम भी चलो दो कदम मेरे सनम कम से कम
हो ओ ओ ओ
तुम दूर जाओगे कैसे दामन बचाओगे कैसे
हमें तुम भुला ना सकोगे
तुम दूर जाओगे कैसे दामन बचाओगे कैसे
हमें तुम भुला ना सकोगे
तुम दूर जाओगे कैसे
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Tum door jaoge kaise-Gustakhi Maaf 1969
७० के दशक में अगर प्रमुख संगीतकारों के गीत
लोकप्रिय थे तो कुछ अनजाने और कम सुने गए
संगीतकारों के गीत भी लोकप्रिय हुए.
कुछ गीत जैसे जिंदगी और तूफ़ान का-मौसम आवारा
है, जान हाज़िर है का-हम न रहेंगे तुम ना रहोगे
दशक के मध्य में कागज़ की नाव फिल्म का ये
गाना भी लोकप्रिय था. हाँ लोकप्रियता कम ज्यादा
थी, मैं मानता हूँ.
नक्श लायलपुरी की रचना है और सपन जगमोहन
का संगीत. इसे स्वर दिया है आशा भोंसले और
मनहर ने. इसके पहले जो मनहर का युगल गीत
लोकप्रिय हुआ वो है-लूटे कोई मन का नगर फिल्म
अभिमान से.
गीत के बोल:
हर गीत के बोल चाहिए तो कम से कम
कमेन्ट बॉक्स में कुछ लिख तो दिया करें.
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चिड़िया भी दाना खा के चूं चूं कर के जाती है
या बीट कर जाती है, कुछ तो करो भाई लोग
.
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Har janam mein hamara Milan-Kagaz ki naav 1976
शास्त्रीय संगीत के गायकों को सुनने का मज़ा अलग ही है.
सुनते जाओ, सुनते जाओ. शोभा गुर्टू का मैं एक छोटा सा
फैन हूँ. हिंदी फिल्म संगीत धन्य है जो उन्होंने कुछ योगदान
फिल्मों के लिए दिया. संगीतकार सपन जगमोहन ने १९७४
की फिल्म सज्जो रानी में उनसे दो गीत गवाए. शोभा गुर्टू
को हम जैसे फ़िल्मी गीतों के रसिक ठुमरी क्वीन के नाम से
जानते हैं. प्रस्तुत गीत भी ठुमरी ही है.
ख्याल गायकी में गायकी और राग के उतार चढ़ाव ज्यादा ही
अहमियत रखते हैं वहीँ ठुमरी में भाव और बोल पर ज्यादा जोर
रहता है. ठुमरी का इतिहास बहुत पुराना है, मगर इसे प्रसिद्धि
दिलाने का काम उन्नीसवीं शती में वाजिद अली शाह ने ज्यादा
किया जिनके दरबार में ठुमरी संग नृत्य का आयोजन होता था.
प्रस्तुत ठुमरी राग खमाज में है.
गीत के बोल:
दिल है हाज़िर लीजिए ले जाइए
और क्या क्या और क्या क्या
और क्या क्या फरमाइए
और क्या क्या फरमाइए
प्यार धोखा है
प्यार धोखा है
तो धोखा ही सही
चाहता है चाहता है
चाहता है दिल के धोखा खाइए
हमको अपना इम्तेहान मंज़ूर है
हमको अपना इम्तेहान मंज़ूर है
और भी तरसाइए तड्पाइए
और भी तरसाइए तड्पाइए
इश्क वालों का
इश्क वालों का मुकद्दर है यही
आप अपनी आप अपनी
आप अपनी आग में जल जाइये
आप अपनी आग में जल जाइये
दिल है हाज़िर लीजिए ले जाइए
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Dil hai hazir-Sajjo Rani 1976
हिंदी फिल्मों के संसार में आपको भूतिया और डरावनी फ़िल्में
बहुत मिलेंगी. कुछ भूत वगैरह की वजह से डरावनी बन जाती
हैं तो कुछ इस वजह से-कि फिल्म देखने बैठ जाओ तो उसके
समाप्त होने के लक्षण नहीं दिखाई देते. रामसे बंधुओं ने भूतिया
पिक्चरों को नए आयाम दिए. पहले की फिल्मों में कई ऐसी हैं
जिनमें हास्य नहीं के बराबर होता था. ऐसी फिल्मों में से एक
है-दो गज ज़मीन के नीचे. ये फिल्म अपने समय में काफी
डरावनी मानी जाती थी.
फिल्म में २ गीत हैं इनमें से एक आपको सुनवाते हैं आज.
गीत गाया है वाणी जयराम ने. वाणी को फिल्म गुड्डी के बाद
‘ऐ’ ग्रेड फिल्मों में ज्यादा गीत गाने को नहीं मिले. वसंत देसाई
ने अपनी अंतिम रिलीज़ फिल्म रानी और लालपरी में कुछ गीत
उनसे गवाए उसके अलावा इक्का दुक्का कुछ और संगीतकारों ने
गवाए.
फिल्मांकन से ऐसा लगता है बम्बई-पूना के रास्ते में आने वाली
पहाड़ियों पर इसकी शूटिंग की गई है. पहाड़ी पर चढ़ी नायिका
३० सेकण्ड में मैदान पर आ जाती है और १०० मीटर की दौड
लगाते हुए गीत गाना शुरू करती है. हो हो करती वो अपना
सामान फेंकती है और उसके मुंह से बोल निकलने लगते है गीत
के. इतनी तेज दौड लगाने के बाद भी फ़िल्मी नायिकाएं बिलकुल
नहीं थकती हैं और सधी आवाज़ में गाती हैं. ये सब ओलिम्पिक
में १००/२०० मीटर में दौड़ने वाली युवतियों के लिए आश्चर्य और
जलन का विषय हो सकता है.
गीत आगे बढ़ता है और नायिका फिर पहाड पर चढ जाती है.
अबके बार एक पार्क दिखाई देता है जिसमें कुछ बच्चे झूले
पर झूल रहे हैं जिन्हें नायिका की उछल-कूद से कोई सरोकार
नहीं है, बड़े सीधे साधे बच्चे हैं. बाकी आप गीत में देखिये
क्या हो रहा है.
गीत नक्श लायलपुरी का लिखा हुआ है जिसकी तर्ज़ बनाई है
सपन जगमोहन ने और इसे सुरेन्द्र कुमार और शोभना नामक
कलाकारों पर फिल्माया गया है.
गीत के बोल:
एक पंछी बन के मैं उडती जाऊं
एक पंछी बन के मैं उडती जाऊं
मस्त पवन के संग लहराऊँ
नीलगगन को छूकर आऊँ
एक पंछी बन के मैं उडती जाऊं
एक पंछी बन के मैं उडती जाऊं
बदरा की छैयां में
कोई देखे ये मेरी उड़ानें
बदरा की छैयां में
कोई देखे ये मेरी उड़ानें
मेरे नैनों में सपने सुहाने
मेरा मन तो तेरी ना माने
ना माने ना माने ना माने
एक पंछी बन के मैं उडती जाऊं
एक पंछी बन के मैं उडती जाऊं
चुपके से चोरी से
कोई आएगा निंदिया चुराने
चुपके से चोरी से
कोई आएगा निंदिया चुराने
मेरे बालों में कलियाँ सजाने
बल खायेगा कोई ना जाने
ना जाने ना जाने ना जाने
एक पंछी बन के मैं उडती जाऊं
एक पंछी बन के मैं उडती जाऊं
मस्त पवन के संग लहराऊँ हाँ
नीलगगन को छूकर आऊँ
एक पंछी बन के मैं उडती जाऊं
एक पंछी
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Ek panchhi ban ke-Do gaj zameen ke neeche
भारतीय संगीत समृद्ध है उसे किसी बैसाखी की ज़रूरत नहीं है
इसका मतलब ये नहीं कि विलायती संगीत कमतर है. हर चीज़
आनंद देती है. ये इस बात पर निर्भर करता है आपकी परवरिश
किस माहौल में हुई है और आपका टेस्ट कैसा डेवलप हुआ है.
संगीत की समझ वाले कान, मगर, इधर-उधर-किधर सब जगह से
अपने सुनने लायक सामान ढूंढ ही लेते हैं. किसी को गज़ल सुन
सुकून मिलता है तो किसी की बैटरी चार्ज होती है सूफी संगीत
से. कोई डिस्को सुन के खिसको(झूमता) होता है.
मेरा बचपन आशा भोंसले के गाये कई गीत रेडुवा पर सुनते सुनते
गुज़रा है. इमानदारी की बात कहूँ तो शुरू से ही मुझे महिला आवाजों
ने ज्यादा आकृष्ट किया. वो तो गुनगुनाने और जगह-जगह अपना शौक
पूरा करने के लिए पुरुष गायकों के गाने सुनने और गाने शुरू किये.
मूल शौक आज भी गायिकाओं के गाने सुनना ही है.
हर संगीतकार ने आशा भोंसले के लिए कुछ विशेष गीत बनाये. इनमें
से कुछ लोक्प्रोयता के चरम पर पहुंचे. आज आपको अपने दौर का
एक बड़ा हिट गीत सुनवाते हैं जो आपको बैठे बैठे ओ पी नैय्यर,
कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और आर डी बर्मन के
संगीत के मिश्रण वाला मजा देगा. ये सब लिखने की वजह है एक
वो ये कि सयाने संगीत प्रेमी इस भाषा को ज़ल्दी समझते हैं.
सपन जगमोहन का संगीत बहुत समृद्ध है और भारतीयता को जिंदा
रखने वाला है. आनंददायी है, रिफ्रेश करने वाला है. उनकी शान में
अंग्रेजी के सिद्धहस्त समीक्षकों ने कसीदे नहीं काढ़े. किसी ने अंडर
रेटेड बोला, किसी ने असफल बोला, इससे आम जनता को फर्क नहीं
पढता.
दोराहा एक अलग हट के बनी हुई फिल्म थी. ये “अलग हट के”
शब्द सबसे पहले हमने स्कूल के मास्साब से सुने थे, जब सजा
मिलनी होती तो कहा जाता-अलग हट के खड़े हो जाओ. उसी से
हमें पैरेलल ड्रा किया फिल्मों का-अलग हट के का मतलब जो आम
दर्शक से अलग हट के खड़ी हो जाए-वो वाली फिल्म. इसका एक
मतलब टिकट खिडकी से भी अलग हट जाना है, मतलब सिनेमा
हॉल से ज़ल्द उतर जाना.
गीत के बोल:
डोले झुमका मोरा
ओ डोले झुमका मोरा
बोले प्यारा कंगना
कोई आएगा आज मोरे अंगना
हो ओ कोई आएगा आज मोरे अंगना
ओ डोले झुमका मोरा
बोले प्यारा कंगना
कोई आएगा आज मोरे अंगना
हो ओ कोई आएगा आज मोरे अंगना
लाखों में एक है दिल का भी नेक है
उसपे अनूठी अदा
अच्छे उसूल हैं बातें भी कूल हैं
बातों से छलके वफ़ा
जैसा मेरा यार है
अजी दिलदार है ऐसा कहाँ
डोले झुमका मोरा
ओ डोले झुमका मोरा
बोले प्यारा कंगना
कोई आएगा आज मोरे अंगना
हो ओ कोई आएगा आज मोरे अंगना
देखे कोई मान धन
देखे कोई तन बदन
मैंने तो देखा है मन
उसकी हो जाउंगी उसमें खो जाउंगी
जैसे गगन में पवन
एक पल न दूर हो मजबूर हो
ऐसा हो मधुर मिलन
ओ डोले झुमका मोरा
ओ डोले झुमका मोरा
बोले प्यारा कंगना
कोई आएगा आज मोरे अंगना
हो ओ कोई आएगा आज मोरे अंगना
ओ डोले झुमका मोरा
बोले प्यारा कंगना
कोई आएगा आज मोरे अंगना
हो ओ कोई आएगा आज मोरे अंगना
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Dole jhumka mera-Doraha 1971
कागज की नाव से दूसरा गीत सुना जाए जो मधुर है ये गीत भी आशा भोंसले ने गाया है. इसे शायद ही आपने सुना होगा. अगर आप आशा भोंसले के बड़े फैन हैं तो अलग बात है. ये ऐसा गीत है जिसे सुन के आपको महसूस होगा कि इसे स्पेशियली आशा के ही लिए बनाया गया है. इसे भी नक्श लायलपुरी ने लिखा है और संगीतकार भी वही हैं-सपन जगमोहन.
आज आप सुन रहे हैं आशा भोंसले की आवाज़ वाला गीत नंबर २५१. हम इसके पहले आपको आशा के गाये एकल, युगल सब मिला के २५० गीत सुनवा चुके है. आंकड़ों की बात करें तो नक्श लायलपुरी के लिखे हुए २० गीत प्रस्तुत को मिला के आप सुन चुके हैं आज तक,
मैं तुम्हारे ख्यालों में खोयी रही
मैं तुम्हारे ख्यालों में खोयी रही
आइना देख कर मुस्कुराता रहा
जाने क्या सोच कर मैंने अंगडाई ली
जाने क्या सोच कर मैंने अंगडाई ली
आइना देख कर मुस्कुराता रहा
मैं तुम्हारे ख्यालों में खोयी रही
आया जो मेरे महके लबों पर
पहले मिलन का फ़साना
शरमा के मैंने आँचल संभाला
लहर गया दिल दीवाना
तनहाइयों में भी हो गए तुम साथ मेरे
मैं तुम्हारे ख्यालों में खोयी रही
मैं तुम्हारे ख्यालों में खोयी रही
आइना देख कर मुस्कुराता रहा
मैं तुम्हारे ख्यालों में खोयी रही
पास आ के तुमने कानों से मेरे
बिखरी लटों को हटाया
हाथों में ले के फिर हाथ मेरा
धीरे से तुमने दबाया
आई सहेली तो टूटे सभी ख्वाब मेरे
मैं तुम्हारे ख्यालों में खोयी रही
मैं तुम्हारे ख्यालों में खोयी रही
आइना देख कर मुस्कुराता रहा
मैं तुम्हारे ख्यालों में खोयी रही
……………………………………………………………..
Main tumhare khayalon mein khoyi-Kagaz ki naav 1976
हिंदी फिल्म संगीत के गीत राग-रागिनियों पर आधारित भी
होते हैं. भले ही सुनने में विलायती सा लगे, मगर वो गीत
किसी शास्त्रीय राग पर आधारित हो सकता है. स्वर विशेष
का समूह या उसे गाने का विशेष अंदाज़ राग कहलाता है.
आज आपको राग अभोगी पर आधारित एक गीत सुनवाते
हैं जो फिल्म कागज़ की नाव से है. इस राग की विशेषता
है-इसमें आरोह और अवरोह में “प” और “न” स्वर वर्जित हैं.
इसमें “म” कोमल प्रयुक्त होता है बाकी के स्वर शुद्ध हैं. गंभीर
राग है और इसका विस्तार तीन सप्तक तक किया जा सकता
है. काफी थाट का ये राग औढव्-औढव् वक्र जाति का राग है.
पकड़ ऐसी है- सा रे ध सा, रे ग म, ग म रे सा. राग के गायन का
समय रात्रि का दूसरा प्रहर है. राग का प्रयोग विरह वेदना
गीतों में या भक्ति संगीत में ज्यादा होता है. प्रस्तुत गीत
थोडा अलग सा है. संगीतकार ने इस सिचुएशन के लिए
ये राग क्यूँ चुनी ये वही बेहतर बतला सकते हैं.
फिल्म कागज की नाव से एक गीत बेहद लोकप्रिय है-हर
जनम में हमारा मिलन-मनहर आशा. इसके अलावा आम श्रोता
को इसका विवरण भी उपलब्ध नहीं है. इस गीत को लिखा
है नक्श लायलपुरी ने और इसकी धुन बनाई है संगीतकार
जोड़ी-सपन जगमोहन ने. गीत गाया है आशा भोंसले ने. गीत
फिल्माया गया है अरुणा ईरानी और प्रदीप कुमार पर.
गीत के बोल:
न जइयो रे सौतन घर सैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
रुक जा मैं रो रो पडूं तोरे पैयां
रुक जा मैं रो रो पडूं तोरे पैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
जादू भी जाने वो टोना भी जाने
नजरिया से दिल को पिरोना भी जाने
हंस के मिले दूर होना भी जाने
हंस के मिले दूर होना भी जाने
तू ही ना माने ना माने
न जइयो रे सौतन घर सैयां
रुक जा मैं रो रो पडूं तोरे पैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
न जइयो रे
तन से लुभाए अदाओं से लूटे
पल में वो माने तो पल में ही रूठे
बैरन के होते हैं सब रूप झूठे
बैरन के होते हैं सब रूप झूठे
तू ही ना जाने ना जाने
न जइयो रे सौतन घर सैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
रुक जा मैं रो रो पडूं तोरे पैयां
रुक जा मैं रो रो पडूं तोरे पैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
………………………………………………………………………….
Na jaiyo re sautan ghar saiyan-Kagaz ki naav 1976
८० के दशक में दो शब्दों ने मुझे काफ़ी आकर्षित किया वे हैं-नकबजनी और नथनिया. नकबजनी से सामान्य अर्थ ये निकलता है नाक से बजने वाली कोई चीज़ या नाक से बजने वाली कोई कला. हिंदी अख़बारों को पढ़ कर इसका असल अर्थ मालूम हुआ. नकबजनी चोरी और ठगी से जोड़ कर देखी जाने वाली कोई चीज़ है.
उसी दरमियान १९७५ में एक फिल्म आई-सज्जो रानी . इसमें एक गीत है-नथनिया ने हाय राम बड़ा दुःख दीना फिल्मों में ऐसे प्रयोग समय समय पर होते रहे हैं जब कोई सेमी-क्लासिकल का टुकड़ा अन्य गीतों के साथ प्रस्तुत किया गया हो. कभी कभी तो कथानक की मांग न होते हुए भी ऐसे गीत फिल्म में डाले जाते हैं-एक अच्छा उदाहरण है फिल्म बैंडिट क्वीन जिसमें नुसरत फ़तेह अली खान की आवाज़ में गाये हुए कई मधुर गीत शामिल किये गए हैं. इन्हें सुन कर हम आसानी से कह सकते हैं-लीक से हट कर बने हुए फ़िल्मी गीत.
आइये सुनते हैं फिल्म-सज्जो रानी से वही गीत शोभा गुर्टू का गाया हुआ जिसका जिक्र ऊपर किया है. गीत लिखा है शायर जां निसार अख्तर ने और धुन बनायीं है सपन जगमोहन ने. गीत में नृत्य करने वाली अभिनेत्री है-जयश्री टी. टोपी पहने युवक हैं-सत्येन कप्पू
गीत के बोल:
नथनिया ने हाय राम बड़ा दुःख दीना नथनिया ने हाय राम बड़ा दुःख दीना नथनिया ने हाय राम बड़ा दुःख दीना
जब मैं हो गई जब मैं हो गई जब मैं हो गई चौदह बरस की जब मैं हो गई चौदह बरस की लोगों ने पीछा मोरा कीना नथनिया ने हाय राम बड़ा दुःख दीना नथनिया ने हाय राम बड़ा दुःख दीना
जब मैं हो गई जब मैं हो गई पंद्रह बरस की जब मैं हो गई पंद्रह जब मैं हो गई पंद्रह बरस की जब मैं हो गई पंद्रह बरस की सर से दुपट्टा मोरा छीना नथनिया ने हाय राम बड़ा दुःख दीना नथनिया ने हाय राम बड़ा दुःख दीना
जब मैं हो गई जब मैं हो गई जब मैं हो गई जब मैं हो गई जब मैं हो गई सोलह बरस की जब मैं हो गई सोलह बरस की गोदी में मोहे भर लीना नथनिया ने हाय राम बड़ा दुःख दीना नथनिया ने हाय राम बड़ा दुःख दीना नथनिया ने हाय राम बड़ा दुःख दीना नथनिया ने हाय राम नथनिया ने नथनिया ने हाय राम नथनिया ने नथनिया ने हाय राम बड़ा दुःख दीना नथनिया ने हाय राम बड़ा दुःख दीना …………………………………………………………….. Nathaniya ne haye Ram-Sajjo Rani 1975
फिल्म सज्जो रानी ज्यादा पब्लिक भले नहीं देख पाई
हो मगर इसके गाने खूब सुने गए हैं कसम से. एक तो
आज भी कभी कभार कोई पागल बजा ही देता है रेडुआ
पर.
ये है आशा भोंसले का गाया हुआ सास-ससुर, देवर, ननद
के उल्लेख वाला गीत. इसे लिखा है जान निसार अख्तर
ने और सपन जगमोहन ने धुन तैयार की है.
रेहाना सुल्तान एक भावप्रवण अभिनेत्री थीं. इस बात को
शायद उस समय के निर्देशकों ने नहीं समझा.
गीत के बोल:
सैयां के गांव में तारों की छांव में
सैयां के गांव में तारों की छांव में
बन के दुल्हनिया जाऊंगी
पहने पायलिया गोटे की अंगिया
उसपे भी शरमाऊंगी
सैयां के गांव में तारों की छांव में
बन के दुल्हनिया जाऊंगी
सासू खड़ी घडी घडी मोरा घूंघटा उठाये
ले के मोहे दिया भरे कहाँ बलिहारी जाये
बोले ससुर बड़ी सड़ी बहू हम चुन के लाये
हो के मगन न जी खुशी खुशी मोती लुटावे
कहवे ननदिया भाभी को भैया
मैं तो चुरा ले जाऊंगी
सैयां के गांव में तारों की छांव में
बन के दुल्हनिया जाऊंगी
मोरे भारी रेशम के जोड़े
पल पल छनके चांदी के तोड़े
बाला देवरा पीछा ना छोड़े
अचरा खेंचे बैयाँ मरोड़े
कहवे जेठानी मैं तो रानी
सोने के झुमके लाऊंगी
सैयां के गांव में तारों की छांव में
बन के दुल्हनिया जाऊंगी
लाई मोरे पिया तोरे लिए बाला जोबन रे
काली लटें मोरी भरा भरा गोरा बदन रे
गरवा लगा लगा मोरा पिया भर दीजो मन रे
प्यासी न मैं रहूँ कसम तोहे मोरे सजन रे
जितना सतावे जितना थकावे
उतनी मैं वारी जाऊंगी
सैयां के गांव में तारों की छांव में
बन के दुल्हनिया जाऊंगी
उसपे भी शरमाऊंगी
सैयां के गांव में तारों की छांव में
बन के दुल्हनिया जाऊंगी
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Saiyan ke gaon mein-Sajjo Rani 1976
आपने किशोर की आवाज़ में कॉल गर्ल का सदाबाहर गीत सुना कुछ पोस्ट पहले. अब सुनिए उसी गीत का लता मंगेशकर वाला संस्करण. नायिका और नायक क्रमशः वही हैं इसमें -जाहिरा और विक्रम. अमर नायक के चरित्र का नाम है और माया नायिका के चरित्र का. विक्रम की संवाद अदायगी ऐसी है जैसे कोई परचा पढ़ा जा रहा हो.
नायिका फिल्म में कॉल गर्ल के मिरोल में है. अब नायक की पेशकश से वो उलझन में पढ़ गयी है. आगे गीत है उसमें क्या होगा देखिये .
गौर फरमाईयेगा कि इसके बोल पुरुष आवाज़ वाले वर्जन से अलग हैं. मुझे दोनों गीत समान रूप से पसंद हैं. दोनों के ही बोल लाजवाब हैं. धुन तो एक समान है अतः ज्यादा कसीदाकारी न करते हुए इस पोस्ट पर इधर ही ब्रेक दे देते हैं.
गीत के बोल:
उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ फिर साथ मेरे आओ, ओ ओ ओ ओ ओ
उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
दुनिया से बहुत आगे जिस राह पे हम होंगे ये सोच लो पहले से हर मोड पे ग़म होंगे है खौफ ग़मों से तो रुक जाओ, ठहर जाओ
उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
मैं टूटी हुई कश्ती खुद पार लगा लूँगी तूफ़ान के मौजों की पतवार बना लूँगी मझधार का डर है तो साहिल पे, ठहर जाओ
उल्फ़त में ज़माने की, हर रस्म को ठुकराओ
दिल और कहीं दे कर तुम चाह बदल डालो बेहतर तो यही होगा ये राह बदल डालो दो चार क़दम चल कर मुमकिन है बहक जाओ
उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ फिर साथ मेरे आओ, ओ ओ ओ ओ ओ
उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ .................................... Ulfat mein zamane ki-Call Girl 1974
सन १९७४ की फिल्म है कॉल गर्ल. फिल्म में विक्रम के साथ ज़ाहिरा प्रमुख कलाकार हैं. फिल्म चली हो या न हो, प्रस्तुत गीत किशोर कुमार के गाये सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों में से एक है. जितने सुन्दर बोल नक्श लायलपुरी के हैं उतनी ही बदिया धुन संगीतकार सपन जगमोहन ने बनाई है. सपन जगमोहन के संगीतबद्ध ३ अच्छे गीत पहले आपको सुनवा चुके हैं इस ब्लॉग पर. ये गीत समय के बंधन से मुक्त गीत है जिसे जब सुनो बढ़िया ही लगता है.
आइये आनंद उठाया जाए किशोर कुमार के इस गीत का जिसे परदे पर विक्रम गा रहे हैं. कुछ संगीत प्रेमियों की गीत के साथ कल्पननाये उगाने की आदत होती है जैसे -फलां गीत राजेश खन्ना पर फिल्माया जाना था, फलां गीत धर्मेन्द्र पर फिल्माया जाना था. एक कोशिश मैं भी कर लेता हूँ आज.
मेरी राय में विक्रम अच्छे लग रहे हैं इस गीत को गाते हुए, अगर वाकई किसी और कलाकार की कल्पना आप करना चाहें की किसके ऊपर ये जंचता तो इस मामले में मेरी पसंद होगी-देव आनंद. जिस तरीके की गायकी इस गीत में है वो देव आनंद के ऊपर फिल्माए गए गीतों से मेल खाती है.
गीत की शुरुआत में जो माहिला कलाकार परदे पर विक्रम से बातें करते दिखाई देती हैं उनका नाम है-उर्मिला भट्ट.
गीत के बोल:
उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
क़दमों को ना रोकेगी, ज़ंजीर रिवाज़ों की हम तोड़ के निकलेंगे, दीवार समाजों की दूरी पे सही मंज़िल, दूरी से ना घबराओ
उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
मैं अपनी बहारों को, रंगीन बना लूँगा सौ बार तुम्हें अपनी, पलकों पे बिठा लूँगा शबनम की तरह मेरे, गुलशन में बिखर जाओ
उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
आ जाओ के जीने के, हालात बदल डालें हम तुम ज़माने के, दिन रात बदल डालें तुम मेरी वफ़ाओं की, एक बार क़सम खाओ
उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ फिर साथ मेरे आओ, ओ ओ ओ ओ उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ ................................... Ulfat mein zamane ki-Call Girl 1974
अनजान या गुमनाम सी फिल्मों में कई मधुर गीत हैं जो हमारी जानकारी में
नहीं आते। आगे एक ऐसा ही गीत पेश है जो फिल्म "मेरा जीवन" से लिया गया है।
किशोर कुमार का गाया यह गीत बेहद लोकप्रिय हुआ था। गीत के बोल है
एम्. जी. हशमत के और संगीत है सपन-जगमोहन का।
गीत के बोल:
मेरा जीवन
मेरा जीवन कुछ काम ना आया
जैसे सूखे पेड़ की छाया
मेरा जीवन कुछ काम ना आया
जैसे सूखे पेड़ की छाया
जैसे सूखे पेड़ की छाया
ओ ओ, अपनों के होते हुए
तन में बनायें तन्हाई
हो ओ ओ, आंसू बना के ख़ुशी
आँखों से मैंने बरसाई
हो ओ ओ, खुशियों को रोते रोते
दुनिया में अब तो मेरा
जी घबराया
मेरा जीवन कुछ काम ना आया
जैसे सूखे पेड़ की छाया
जैसे सूखे पेड़ की छाया
हो ओ, बरस गए रे सावन
दरिया भी जोश में आये
हो ओ ओ, फूल भी खिलने लगे
कलियों के मन मुस्काए
हो ओ ओ, सूनी रही एक डाली
उस पे तो कोई अब तक
फूल ना आया
मेरा जीवन कुछ काम ना आया
जैसे सूखे पेड़ की छाया
जैसे सूखे पेड़ की छाया
हो ओ, जीने को जीना चाहें
मांगूं तो मौत ना आये
हो ओ ओ,साँसों के चलने को तो
जीवन कहा नहीं जाए
हो ओ ओ, दर्द बसा के दिल में
मेरा नसीब मुझको
कहाँ पे लाया
मेरा जीवन कुछ काम ना आया
जैसे सूखे पेड़ की छाया
जैसे सूखे पेड़ की छाया
मेरा जीवन कुछ काम ना आया
जैसे सूखे पेड़ की छाया
जैसे सूखे पेड़ की छाया
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Mera jeevan kuchh kaam na aaya-Mera jeevan 1976
सपन सेनगुप्ता और जगमोहन बक्षी की जोड़ी को हम 'सपन जगमोहन '
के नाम से जानते हैं। सपन जगमोहन ने काफी हिंदी फिल्मों में संगीत दिया है।
१९६३ से शुरू हुआ उनका संगीतमय सफ़र ८० के दशक तक चला। सन १९७६
की फिल्म 'मेरा जीवन ' में उन्होंने संगीत दिया और इस फिल्म के दो गाने
चर्चित हुए। सबसे ज्यादा चर्चित हुआ किशोर का गाया फिल्म का शीर्षक गीत।
उसके बाद जो सबसे ज्यादा सुनने को मिला वो है रफ़ी और पंकज मित्रा का गाया
युगल गीत-तेरा जोगी आया । आइये ये युगल गीत सुना जाए। इसका विडियो
यू ट्यूब पर उपलब्ध नहीं है। फिल्म में दुष्यंत और विद्या सिन्हा प्रमुख कलाकार हैं।
मैं जानू तू जाने या रब जाने
मैं जानू तू जाने या रब जाने
हीर बने तू, राँझा बन के, तेरी गली मैं आऊँ
हीर बने तू, राँझा बन के, तेरी गली मैं आऊँ
नाम अगर हो तेरा लैला, मजनू मैं कहलाऊँ
तेरे प्यार में पत्थर खाऊँ और मर के अमर हो जाऊं
मैं जानू तू जाने या रब जाने
मैं जानू तू जाने या रब जाने
प्यार के राही जनम जनम में रूप बदल के आयें
प्यार के राही जनम जनम में रूप बदल के आयें
फिर भी ऑंखें ना पहचानें ये तो समझ ना पायें
मेरे दिल के अरमान गायें और तुझको याद दिलाएं
कुछ समय से आगे की फ़िल्में बनी ७० के दशक में उनमे
से एक है चेतना। अनिल धवन शत्रुघ्न सिन्हा और रेहाना सुल्तान
इसमें प्रमुख कलाकार हैं। फिल्म का निर्देशन बी आर इशारा ने
किया है। इशारा सार्थक ऑफ-बीट फ़िल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं।
फिल्म का एक गीत सुनिए गायक मुकेश की आवाज़ में जिसको
नक्श लायलपुरी ने लिखा है और धुन बनाई है सपन जगमोहन ने।
गीत ख़ासा लोकप्रिय हुआ और शायद एक आध बार आपने ज़रूर
सुना होगा।
गीत के बोल:
मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा
मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा
मेरी आवाज़ को, दर्द के साज़ को, तू सुने ना सुने
मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा
मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा
मुझे देख कर कह रहे हैं सभी
मोहब्बत का हासिल है दीवानगी
मुझे देख कर कह रहे हैं सभी
मोहब्बत का हासिल है दीवानगी
प्यार की राह में, फूल भी थे मगर,
मैंने कांटे चुने
मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा
मेरी आवाज़ को, दर्द के साज़ को, तू सुने ना सुने
मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा
जहाँ दिल झुका था वहीँ सर झुका
मुझे कोई सजदों से रोकेगा क्या
जहाँ दिल झुका था वहीँ सर झुका
मुझे कोई सजदों से रोकेगा क्या
काश टूटे ना वो, आरजू ने मेरी ख्वाब जो हैं बुने
मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा
मेरी आवाज़ को, दर्द के साज़ को, तू सुने ना सुने
मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा