चली चली रे पतंग मेरी-भाभी १९५७
जिक्र है. इस गीत को सुनते सुनते मुझे ध्यान आया इसमें
कितनी फिल्मों के नाम हैं! कुछ इस गीत से पहले की और
कुछ भविष्य में आने वाली. पतंग, दुनिया, उड़न खटोला,
दुल्हन, सांवरिया वगैरह. एक समय ऐसा आएगा जब सभी
प्रचलित हिंदी शब्दों पर फ़िल्में बन जाएँगी.
इसमें बिजली की तार का जिक्र है जो इसके अलावा किसी
और गीत में मुझे नहीं मिला अभी तक. बिजली का जिक्र
ज़रूर है ५-६ हिंदी फ़िल्मी गीतों में, मगर तार का नहीं.
बिजली का खम्बा भी एक गीत में आ चुका है, बस इंतज़ार
है ट्रांसफोर्मर, ट्रांसमीशन लाइन और सब स्टेशन का.
गीत अच्छी रिदम वाला और कैची धुन पर तैरता है. इस
युगल गीत को रफ़ी और लता ने गाया है, संगीत चित्रगुप्त
का और बोल राजेंद्र कृष्ण के. १९५७ की फिल्म है ये और
आज भी इस गीत की वजह से याद की जाती है. इसके
अलावा और भी गीत हैं इस फिल्म के जो चर्चित हैं.
गीत के बोल:
चली-चली रे पतंग मेरी चली रे
चली बादलों के पार, हो के डोर पे सवार
सारी दुनिया ये देख-देख जली रे
चली-चली रे पतंग मेरी चली रे
यूँ मस्त हवा में लहराए
जैसे उड़न खटोला उड़ा जाए
ले के मन में लगन, जैसे कोई दुल्हन
चली जाए रे सांवरिया की गली रे
चली-चली रे पतंग मेरी चली रे
रंग मेरी पतंग का धानी
है ये नील गगन की रानी
बांकी-बांकी है उठान, है उमर भी जवान
लागे पतली कमर बड़ी भली रे
चली-चली रे पतंग मेरी चली रे
छूना मत देख अकेली
है साथ में डोर सहेली
है ये बिजली की तार, बड़ी तेज़ है कतार
देगी काट के रख, दिलजली रे
चली-चली रे पतंग मेरी चली रे
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Chali chali re patangmeri chali re-Bhabhi 1957
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