मैं तो भूल चली बाबुल का देस-सरस्वतीचन्द्र १९६८
कल्याणजी तो हमारे बीच नहीं हैं आज मगर उनके छोटे भाई
आनंदजी आज भी सुनहरे दौर की यादों के बीच अपना जीवन
गुज़ार रहे हैं. २-३ वर्ष पहले एक विशेष कार्यक्रम आकाशवाणी
के विविध भारती पर आया था-उजाले उनकी यादों के. इसमें
प्रस्तुतकर्ता से लंबी बातचीत हुयी थी आनंदजी भाई की.
उसमें उन्होंने कई बातें साझा की थीं अपने दौर की.
आज सुनते हैं एक गीत जो गुजरती पारंपरिक धुन पर आधारित
है. इसे फिल्म सरस्वती चंद्र से लिया गया है जो सन १९६८
की फिल्म है. फिल्म में नूतन ने यादगार भूमिका निभाई थी.
फिल्म के गीत बेहद चर्चित रहे विशेषकर मुकेश का गाया गीत
जिसमें उपमाओं की नहीं मिसालें हैं. गीतकार इन्दीवर बेहद
प्रतिभाशाली थे और ७० के दशक के उत्तरार्ध तक उनके अच्छे
गीत हमें सुनने को मिले. अच्छे गीत तो उन्होंने ८० के दशक में
भी लिखे मगर वो सब जनता ने भुला कर “ताकी ओ ताकी”
जैसे गीत ज्यादा सुने.
गीत के बोल:
मैं तो भूल चली बाबुल का देस
पिया का घर प्यारा लगे
कोई मैके को दे दो संदेस
पिया का घर प्यारा लगे
ननदी में देखी है बहना की सूरत
सासू जी मेरी है ममता की मूरत
पिता जैसा, ससुर जी का भेस
पिया का घर प्यारा लगे
चँदा भी प्यारा है सूरज भी प्यारा
पर सबसे प्यारा है सजना हमारा
आँखें समझे जिया का संदेस
पिया का घर प्यारा लगे
बैठा रहे सैयां नैनों को जोड़े
इक पल वो मुझको अकेला ना छोड़े
नहीं जिया को कोई क्लेश
पिया का घर प्यारा लगे
मैं तो भूल चली बाबुल का देस
पिया का घर प्यारा लगे
कोई मैके को दे दो संदेस
पिया का घर प्यारा लगे
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Main to bhool chali babul ka desh-Saraswati Chandra 1968

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