पहला नशा पहला खुमार-जो जीता वही सिकंदर १९९२
बिना फिल्म देखे समीक्षा लिखने वाले ज्यादा पोपुलर हैं . बस १०
समीक्षाएं पढ़ो और एक नई समीक्षा लिख डालो. ये प्रथा तो लंबे
समय से चली आ रही है. पुराने समय में जनता अंग्रेजी फिल्मों
की समीक्षा पढ़ पढ़ कर हिंदी फिल्मों की समीक्षा लिखती थी.
आजकल के समीक्षक थोड़े स्मार्ट हो गए हैं, नयी पीढ़ी के जो हैं.
तरीका इनका बड़ा ही निराला है. फिल्म की स्टारकास्ट का बखान
करने में ८-१० लाइन लिख डालो, थोड़ा खांसो, थोडा ऊंघो फिर
एक आध् धाँसू डायलॉग से शुरुआत करो, कुछ फिलोसॉफी झाडो,
पैरेलल ड्रा करो, थोड़ी जबरन टीका टिप्पणी करो, विषय से थोडा
भटको, कुछ लच्छेदार शब्द घुसेडो ताकि पढ़ने वाला भूल जाए कि
मूल मुद्दा क्या है,
सवालिया निशान ऐसे लगाओ कि समझ न आये फिल्म देखना
है या नहीं. दर्शक की स्तिथि बैक टू स्क्वैर वन पर ले आओ. उसे
तो बिलकुल भी पता नहीं चलना चाहिए कि वो बेवकूफ बन गया.
उसके अलावा फिल्म निर्माता निर्देशक से पंगा भी नहीं लेना है.
कुछ समय पहले एक समीक्षक से मुलाकात का सुअवसर मिला.
उनकी समीक्षा में से विशेष खुशबू आया करती. मालूम हुआ कि
अपनी जुगाली कागज पे करने के पहले वे उचित मूल्य की एक
दुकान सँभालते थे और उस पर केरोसिन बेचा करते थे.
आइये आज का गीत सुना जाए जो चर्चित गीत है और इसके
लिए विवरण की आवश्यकता नहीं है फिर भी बतलाये देते हैं
कि इसे साधना सरगम ने गाया है उदित नारायण संग. मजरूह
के बोल हैं और जतिन ललित का संगीत है.
गीत के बोल:
पहला नशा, पहला खुमार
नया प्यार है नया इंतज़ार
कर लूँ मैं क्या अपना हाल
ऐ दिल-ए-बेक़रार
मेरे दिल-ए-बेक़रार तू ही बता
पहला नशा, पहला खुमार
नया प्यार है नया इंतज़ार
कर लूँ मैं क्या अपना हाल
ऐ दिल-ए-बेक़रार
मेरे दिल-ए-बेक़रार तू ही बता
उड़ता ही फिरूँ इन हवाओं में कहीं
या मैं झूल जाऊँ, इन घटाओं में कहीं
एक कर लूँ आसमान और ज़मीन
अब यारो क्या करूँ, क्या नहीं
पहला नशा, पहला खुमार
उसने बात की, कुछ ऐसे ढंग से
सपने दे गया वो हज़ारों रंग के
रह जाऊँ जैसे में हार के
और चूमे वो मुझे प्यार से
पहला नशा, पहला खुमार
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Pehla nasha pehla Khumar-Jo jeeta wohi sikandar 1992

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