लहरों पे लहर-छबीली १९६०
में अटूट रिश्ता होता है जो सुरों के ज़रिये बन जाता है. कुछ
रिश्ते कुम्भ के मेले में बिछड जाते हैं और बाद में मिल जाते
हैं तो कुछ आजीवन अनजाने से रह जाते हैं.
आपको आज एक मधुर गीत सुनवाते हैं जिसकी मूल धुन भी
मधुर है. गीत है हेमंत कुमार का गाया हुआ फिल्म छबीली
का गीत.
सन १९५७ में डीन मार्टिन का गीत आया था-द मैन हूँ प्लेज़
द मेंडोलिनो. स्नेहल भाटकर के संगीत वाला गीत अवतरित
हुआ सन १९६० में. ये सब जानकारी इन्टरनेट के पदार्पण
के बाद ही मिलना शुरू हुयी. पहले ऐसा ज्ञान केवल ज्ञानी
संगीत प्रेमियों तक ही सीमित था जो विलायती संगीत भी
सुना करते थे. जानकारी सीमित हुआ करती थी और आपसी
आदान प्रदान से ये बढ़ी. इस दिशा में कार्तिक की साईट ने
सबसे ज्यादा जानकारी दी है.
गीत के बोल:
लहरों पे लहर उल्फ़त है जवां
रातों की सहर चली आओ यहाँ
सितारे टिमटिमाते हैं तू आ जा आ जा
मचलती जा रही है ये हवाएं आ जा आ जा
लहरों पे लहर उल्फ़त है जवां
रातों की सहर चली आओ यहाँ
सुलगती चाँदनी में थम रही है तुझपे ये नजर
कदम ये किस तरफ़ बढ़ते चले जाते हैं बेखबर
ज़माने को है भूले हम आ चल दें साथ ये सफ़र
लहरों पे लहर उल्फ़त है जवां
रातों की सहर चली आओ यहाँ
ना जाने कौन सी राहें हमारा कौन सा है जहान
सहारे किसके हम ढूँढे हमारी मंजिल है कहाँ
सदा दिल की मगर कहती है मेरी दुनिया है यहाँ
लहरों पे लहर उल्फ़त है जवां
रातों की सहर चली आओ यहाँ
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Lehron pe lehar-Chhabili 1960
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