पर्बतों के पेड़ों पर-शगुन १९६४
उजाला है तो चम्पई अँधेरा है. अधिकाँश जगह पर साहित्य
में आपको ये शब्द धुप के साथ प्रयुक्त मिलेगा मगर साहिर
ने इसे शाम के साथ जोड़ दिया उस धुंधलके के साथ जिसे
आप ना तो अँधेरा कह सकते हैं ना उजियारा . ट्विलाइट
इसके लिए सटीक शब्द है अंग्रेजी में. उजाले के लिए उन्होंने
सुरमई शब्द का प्रयोग किया है. उजाला जब अपने अंतिम
चरण में होगा तो सुरमई लगने लगेगा.
बढ़िया रोमांटिक गीत है जिसे रफ़ी और सुमन कल्यानपुर
ने गाया है. खय्याम का संगीत है. गीत वहीदा रहमान और
कमलजीत पर फिल्माया गया है. वहीदा रहमान ने बाद में
कमलजीत से शादी कर के अपना घर बसा लिया था. ये
मगर इस फिल्म के १० साल बाद सन १९७४ में हुआ.
गीत के बोल:
पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है
पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है
सुरमई उजाला है चम्पई अंधेरा है
सुरमई उजाला है
दोनों वक़्त मिलते हैं दो दिलों की सूरत से
दोनों वक़्त मिलते हैं दो दिलों की सूरत से
आसमां ने खुश हो कर रँग सा बिखेरा है
आसमां ने खुश हो कर रँग सा बिखेरा है
ठहते-ठहरे पानी में गीत सरसराते हैं
ठहते-ठहरे पानी में गीत सरसराते हैं
भीगे-भीगे झोंकों में खुशबुओं का डेरा है
भीगे-भीगे झोंकों में खुशबुओं का डेरा है
पर्बतों के पेड़ों पर
क्यों न जज़्ब हो जाएं इस हसीं नज़ारे में
क्यों न जज़्ब हो जाएं इस हसीं नज़ारे में
रोशनी का झुरमट है मस्तियों का घेरा है
रोशनी का झुरमट है मस्तियों का घेरा है
पर्बतों के पेड़ों पर
अब किसी नज़ारे की दिल को आरजू क्यों हो
अब किसी नज़ारे की दिल को आरजू क्यों हो
जब से पा लिया तुम को सब जहान मेरा है
जब से पा लिया तुम को सब जहान मेरा है
पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है
पर्बतों के पेड़ों पर
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Parbaton ke pedon par-Shagun 1964
Artists-Kamaljeet, Waheeda Rehman
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