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May 22, 2017

ज़िंदगी ज़ुल्म सही ज़ब्र सही-शगुन १९६४

जिंदगी से लोगों को गिले शिकवे होते हैं. सब अपने अपने
अंदाज़ में दुखडा सुनाते हैं. कोई जली कटी के अंदाज़ में भी
कहता है. जली कटी भी कोई ठेठ में कहता है कोई साहित्यिक
अंदाज़ में.

शगुन फिल्म का गीत सुनते हैं सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में.
इसके बोल साहिर के हैं और संगीत खय्याम का.



गीत के बोल:

ज़िंदगी ज़ुल्म सही ज़ब्र सही ग़म ही सही
दिल की फ़रियाद सही रूह का मातम ही सही
ज़िंदगी ज़ुल्म सही ज़ब्र सही ग़म ही सही
दिल की फ़रियाद सही रूह का मातम ही सही
ज़िंदगी ज़ुल्म सही

हमने हर हाल में जीने की कसम खाई है
अब यही हाल मुक़द्दर है तो शिक़वा क्यों हो
हम सलीके से निभा देंगे जो दिन बाकी हैं
चाह रुसवा न हुई दर्द भी रुसवा क्यों हो

ज़िंदगी ज़ुल्म सही ज़ब्र सही ग़म ही सही
दिल की फ़रियाद सही रूह का मातम ही सही
ज़िंदगी ज़ुल्म सही

हमको तक़दीर से बे-वजह शिकायत क्यों हो
इसी तक़दीर ने चाहत की खुशी भी दी थी
आज अगर काँपती पलकों को दिये हैं आँसू
कल थिरकते हुए होंठों को हँसी भी दी थी

ज़िंदगी ज़ुल्म सही ज़ब्र सही ग़म ही सही
दिल की फ़रियाद सही रूह का मातम ही सही
ज़िंदगी ज़ुल्म सही

हम हैं मायूस मगर इतने भी मायूस नहीं
एक न एक दिन तो यह अश्कों की लड़ी टूटेगी
एक न एक दिन तो छटेंगे ये ग़मों के बादल
एक न एक दिन उजाले की किरण फूटेगी

ज़िंदगी ज़ुल्म सही ज़ब्र सही ग़म ही सही
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Zingadi zulm sahi-Shagun 1964

Artist: Waheeda Rehman

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Jul 21, 2016

पर्बतों के पेड़ों पर-शगुन १९६४

साहिर के रोमांटिक गीत भी अलग अंदाज़ वाले हैं. सुरमयी
उजाला है तो चम्पई अँधेरा है. अधिकाँश जगह पर साहित्य
में आपको ये शब्द धुप के साथ प्रयुक्त मिलेगा मगर साहिर
ने इसे शाम के साथ जोड़ दिया उस धुंधलके के साथ जिसे
आप ना तो अँधेरा कह सकते हैं ना उजियारा . ट्विलाइट
इसके लिए सटीक शब्द है अंग्रेजी में. उजाले के लिए उन्होंने
सुरमई शब्द का प्रयोग किया है. उजाला जब अपने अंतिम
चरण में होगा तो सुरमई लगने लगेगा.

बढ़िया रोमांटिक गीत है जिसे रफ़ी और सुमन कल्यानपुर
ने गाया है. खय्याम का संगीत है. गीत वहीदा रहमान और
कमलजीत पर फिल्माया गया है. वहीदा रहमान ने बाद में
कमलजीत से शादी कर के अपना घर बसा लिया था. ये
मगर इस फिल्म के १० साल बाद सन १९७४ में हुआ.



गीत के बोल:

पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है
पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है
सुरमई उजाला है चम्पई अंधेरा है
सुरमई उजाला है

   
दोनों वक़्त मिलते हैं दो दिलों की सूरत से
दोनों वक़्त मिलते हैं दो दिलों की सूरत से
आसमां ने खुश हो कर रँग सा बिखेरा है
आसमां ने खुश हो कर रँग सा बिखेरा है

   
ठहते-ठहरे पानी में गीत सरसराते हैं
ठहते-ठहरे पानी में गीत सरसराते हैं
भीगे-भीगे झोंकों में खुशबुओं का डेरा है
भीगे-भीगे झोंकों में खुशबुओं का डेरा है

पर्बतों के पेड़ों पर
   
क्यों न जज़्ब हो जाएं इस हसीं नज़ारे में
क्यों न जज़्ब हो जाएं इस हसीं नज़ारे में
रोशनी का झुरमट है मस्तियों का घेरा है
रोशनी का झुरमट है मस्तियों का घेरा है

पर्बतों के पेड़ों पर
   
अब किसी नज़ारे की दिल को आरजू क्यों हो
अब किसी नज़ारे की दिल को आरजू क्यों हो
जब से पा लिया तुम को सब जहान मेरा है
जब से पा लिया तुम को सब जहान मेरा है

पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है
पर्बतों के पेड़ों पर
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Parbaton ke pedon par-Shagun 1964

Artists-Kamaljeet, Waheeda Rehman

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Jan 30, 2011

तुम अपना रंज ओ ग़म अपनी परेशानी -शगुन १९६४

आपको फिल्म शगुन का एक गीत सुमन कल्याणपुर का गाया
हुआ हम सुनवा चुके हैं। आइये एक और गीत सुना जाये इसी फिल्म
का जो जगजीत कौर की आवाज़ में है। जगजीत उर्फ़ श्रीमती
ख़य्याम ने कुछ एक गीत गए हैं हिंदी फिल्मों में और शायद
सभी में संगीत ख़य्याम का ही है। साहिर का लिखा हुआ ये गीत
मुझे बेहद पसंद है और कभी कभार इसे सुन लिया करता
हूँ-वजह -इसके बोल। प्यानो की मधुर आवाज़ के साथ गीत का
आगाज़ होता है। गीत शायद निवेदिता नाम की कलाकार पर
फिल्माया गया है।




गीत के बोल:


तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
तुम्हें ग़म की क़सम, इस दिल की वीरानी मुझे दे दो

ये माना मैं किसी क़ाबिल नहीं हूँ इन निगाहों में
ये माना मैं किसी क़ाबिल नहीं हूँ इन निगाहों में
बुरा क्या है अगर, ये दुख ये हैरानी मुझे दे दो

तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो

मैं देखूँ तो सही, दुनिया तुम्हें कैसे सताती है
मैं देखूँ तो सही, दुनिया तुम्हें कैसे सताती है
कोई दिन के लिये, अपनी निगहबानी मुझे दे दो

तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो

वो दिल जो मैने मांगा था मगर गैरों ने पाया था
वो दिल जो मैने मांगा था मगर गैरों ने पाया था
बड़ी ख्वाहिश है अगर, उसकी पशेमानी मुझे दे दो

तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो

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Nov 13, 2009

बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों- शगुन १९६४

केवल माथे की मांशपेशियों को हिला हिला कर चेहरे के
भावों को कैसे बदला जाए सिखा रही हैं वहीदा रहमान।
ऑंखें साथ नहीं दे रही हैं भावों को उभारने में। गाना थोड़ा
आगे बढ़ता है उसके बाद ग्लीसरीन की सहायता मिल
जाती है। इस गाने से ज्यादा वहीदा रहमान की एक्टिंग
की तारीफ़ पढ़ी है मैंने बहुत जगह। वहीदा एक अच्छी कलाकार
जरूर हैं मगर इस गाने से बेहतर एक्टिंग उन्होंने कई दूसरे
गानों में की है । इसको कहते हैं कमजोर डायरेक्शन का एक
नमूना । इस फ़िल्म में दो नामचीन हस्तियों ने अपनी साहित्यिक
सेवाएँ दी हैं। साहिर लुधियानवी जिन्होंने गीत लिखे हैं और
जलाल मलीहाबादी जिन्होंने इस फ़िल्म के डायलोग लिखे हैं।

गाना सुमन कल्याणपुर के मधुरतम गीतों में से एक है, फ़िल्म
शगुन के लिए इसकी तर्ज़ बनाई है संगीतकार खय्याम ने ।



गाने के बोल:

बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों
मोहब्बतों के दिए जला के

बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों
मोहब्बतों के दिए जला के

मेरी वफ़ा ने उजाड़ दी हैं

मेरी वफ़ा ने उजाड़ दी हैं
उम्मीद की बस्तियां बसा के

तुझे भुला देंगे अपने दिल से
ये फ़ैसला तो किया है लेकिन
तुझे भुला देंगे अपने दिल से
ये फ़ैसला तो किया है लेकिन

न दिल को मालूम है न हमको
न दिल को मालूम है न हमको
जियेंगे कैसे तुझे भुला के

बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों
मोहब्बतों के दिए जला के

कभी मिलेंगे जो रास्ते में
तो मुहँ फिर कर पलट पड़ेंगे
कभी मिलेंगे जो रास्ते में
तो मुहँ फिर कर पलट पड़ेंगे

कहीं सुनेंगे जो नाम तेरा
कहीं सुनेंगे जो नाम तेरा

तो चुप रहेंगे नज़र झुका के

बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों
मोहब्बतों के दिए जला के

न सोचने पर भी सोचती हूँ
के जिंदगानी में क्या रहेगा
न सोचने पर भी सोचती हूँ
के जिंदगानी में क्या रहेगा

तेरी तमन्ना को दफ़न कर के
तेरे ख्यालों से दूर जाके
तेरी तमन्ना को दफ़न कर के
तेरे ख्यालों से दूर जाके

बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों
मोहब्बतों के दिए जला के

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