कभी ए हकीकत-ए-मुन्तज़र-दुल्हन एक रात की १९६६
डिक्शनारी साथ ले के बैठना पड़ जाता है. ऐसा ही एक
गीत है फिल्म दुल्हन एक रात की में लता मंगेशकर का
गाया हुआ. डॉक्टर इकबाल के लिखे इस राजा गीत की
धुन बनाई है मदन मोहन ने. इसे कव्वाली भी कहते हैं.
मदन मोहन की तर्ज़ और लाता के गाये गीतों की तारीफ
बहुत सुनी पर पढ़ी है जगह-जगह मगर इस गीत पर किसी
उर्दू विशेषज्ञ की राय अभी तक नहीं देखी.
धुन उम्दा है और इसे सुन कर इसका फैन बनना आसान
नहीं है-वजह इसकी क्लिष्ट भाषा. फिल्म के बाकी गीतों को
जनता ज्यादा सुनती है.
गीत के बोल:
कभी ए हकीकत-ए-मुन्तज़र
नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
कभी ए हकीकत-ए-मुन्तज़र
नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
के हज़ारों सजदे तड़प रहे
हैं मेरी जबीं-ए-नियाज़ में
न बचा-बचा के तू रख इसे
न बचा-बचा के तू रख इसे
तेरा आईना है वो आईना
तेरा आईना है वो आईना
आईना आईना
न बचा-बचा के तू रख इसे
तेरा आईना है वो आईना
तेरा आईना है वो आईना
आईना आईना
तेरा आईना है वो आईना
के शिकस्ता हो तो अजीजतर
है निगाह-ए-आईनासाज़ में
के शिकस्ता हो तो अजीजतर
है निगाह-ए-आईनासाज़ में
कभी ए हकीकत-ए-मुन्तज़र
ना वो इश्क़ में रहीं गर्मियां
न वो हुस्न में रहीं शोखियाँ
ना वो इश्क़ में रहीं गर्मियां
न वो हुस्न में रहीं शोखियाँ
शोखियाँ शोखियाँ
ना वो इश्क़ में रहीं गर्मियां
न वो हुस्न में रहीं शोखियाँ
ना वो गज़नवी में तड़प रही
ना वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ में
ना वो गज़नवी में तड़प रही
ना वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ में
मैं जो सर-बा-सजदा कभी हुआ
तो ज़मीन से आने लगी सदा
तेरा दिल तो है सनम आशना
तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में
कभी ए हकीकत-ए-मुन्तज़र
नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
कभी ए हकीकत-ए-मुन्तज़र
नज़र आ नज़र आ
नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
के हज़ारों सजदे तड़प रहे
हैं मेरी जबीं-ए-नियाज़ में
कभी ए हकीकत-ए-मुन्तज़र
नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
कभी ए हकीकत-ए-मुन्तज़र
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Kabhi ae haqeeqt-e-muntazir-Dulhan ek raat ki 1966
Artists: Nutan

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