Mar 9, 2017

होता रहा यूँ ही अगर-मल्हार १९५१

मल्हार फिल्म से आपने कुछ मधुर गीत सुने. अब अगला गीत
सुनते हैं जो कम सुना गया है मगर इसे जनता रीयल जेम कहती
है. और आप जानते ही हैं जैम के नाम से हमें अचार, मुरब्बा और
चटनी भी याद आने लगते हैं.

इन्दीवर का लिखा हुआ गीत है और रोशन का संगीत है. मुकेश ने
इस मधुर गीत को गाया है.



गीत के बोल:

होता रहा यूँ ही अगर अंजाम वफ़ा का
लेगा न ज़माने में कोई नाम वफ़ा का
होता रहा यूँ ही अगर अंजाम वफ़ा का
लेगा न ज़माने में कोई नाम वफ़ा का
होता रहा यूँ ही अगर अंजाम वफ़ा का
लेगा न ज़माने में कोई नाम वफ़ा का

सिन्दूर की लाली है किसी के सुहाग में
जीते जी जल रहा है कोई ग़म की आग में
कोई ग़म की आग में
इसके सिवा होगा भी क्या अंजाम वफ़ा का
लेगा न ज़माने में कोई नाम वफ़ा का

होता रहा यूँ ही अगर अंजाम वफ़ा का
लेगा न ज़माने में कोई नाम वफ़ा का

जाकर नहीं आना जिसे क्यों देखे वो मुड़ के
मिलते नहीं हमराही दोराहे पे बिछड़ के
दोराहे पे बिछड़ के
मलूम है होता है जो अंजाम वफ़ा का
लेगा न ज़माने में कोई नाम वफ़ा का

होता रहा यूँ ही अगर अंजाम वफ़ा का
लेगा न ज़माने में कोई नाम वफ़ा का

क़समें नहीं निभती धरे रह जाते हैं वादे
ये रेत की दीवर है जो चाहे गिरा दे
जो चाहे गिरा दे
सौ काम जफ़ाओं के हैं इक काम वफ़ा का
लेगा न ज़माने में कोई नाम वफ़ा का

होता रहा यूँ ही अगर अंजाम वफ़ा का
लेगा न ज़माने में कोई नाम वफ़ा का
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Hota raha yun hi-Malhar 1951

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