ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के-काजल १९६५
तेरे साथ कटी है, बाकी भी उसी तरह गुज़र जाए तो अच्छा.
ये बात साथ देने वाली चीज़ के लिए है, अब्वो कुछ भी हो
सकती है. चाहे गाडी का दूसरा पहिया हो या फिर गाडी ही
क्यूँ ना हो. एक पालतू कुत्ता भी हो सकता है. ये बाकी की
संभावनाएं खारिज हो जाती हैं तीसरे अंतरे में. खैर इन सब
के बावजूद इसमें जीवन दर्शन छुपा हुआ है.
दारू के हलक से नीचे उतरना शुरू होते ही दिमाग के दर्शन
बखान वाले कोने में घंटियाँ बजने लग जाया करती हैं. ये
अनुभव पीने वाले से ज्यादा सामने बेवकूफ सरीखे बैठे मनुष्य
को जल्दी समझ आते हैं और वो अपने आपको धन्य समझने
लगता है.
गीत के बोल:
ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा
ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा
इस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा
जिस तरह से थोड़ी सी तेरे साथ कटी है
हाय, जिस तरह से थोड़ी सी तेरे साथ कटी है
बाक़ी भी उसी तरह गुज़र जाए तो अच्छा
बाक़ी भी उसी तरह गुज़र जाए तो अच्छा
दुनिया की निगाहों में बुरा क्या है भला क्या
दुनिया की निगाहों में बुरा क्या है भला क्या
ये बोझ अगर दिल से उतर जाए तो अच्छा
ये बोझ अगर दिल से उतर जाए तो अच्छा
वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बरबाद किया है
होए, वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बरबाद किया है
इल्ज़ाम किसी और के सर जाए तो अच्छा
ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा
बिखर जाए तो अच्छा
बिखर जाए तो अच्छा
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Ye zulf agar khul ke bikhar-Kaajal 1965
Artists: Raj Kumar, Helen

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