हुस्न की बहारें लिये आये थे सनम-बेनज़ीर १९६४
लिए मीना कुमारी से बेहतर नाम शायद निर्देशक को
कोई और सूझा नहीं होगा.
गीतकार ने भी वैसे ही गीत लिखे हैं. फिल्म देखो तो
ये कथानक से स्किनटाईट चिपके लगते हैं.
शकील बदायूनीं की रचन है और बर्मन दादा का संगीत.
उनकी फेवरेट सिंग्रेस इसे गा रही हैं.
गीत के बोल:
हुस्न की बहारें लिये आये थे सनम
कैसी बदनसीबी हुई मिल सके न हम
हुस्न की बहारें लिये आये थे सनम
कैसी बदनसीबी हुई मिल सके न हम
उनका करम भी आज सितम हो के रह गया
उनका करम भी आज सितम हो के रह गया
एक नगमा लब पे आया मगर खो के रह गया
हलकी सी एक खुशी है तो हल्का सा एक गम
हुस्न की बहारें लिये आये थे सनम
कैसी बदनसीबी हुई मिल सके न हम
गुलशन में फिर नसीमे शहर जाने कब चले
गुलशन में फिर नसीमे शहर जाने कब चले
उम्मीद का दिया मेरे घर जाने कब जले
ना जाने दिल की राह में कब आये वो कदम
हुस्न की बहारें लिये आये थे सनम
कैसी बदनसीबी हुई मिल सके न हम
मिल सके न हम मिल सके न हम
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Husn ki baharen liye-Benazir 1964
Artist: Meena Kumari
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