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Jun 30, 2011

कौन रोकेगा अब प्यार का रास्ता-एक कली मुस्काई १९६८

लगे हाथ 'एक कली मुस्काई' फिल्म का तीसरा गीत भी सुन ही
लिया जाये। शायद इस गीत का विडियो उपलब्ध नहीं है यू ट्यूब
पर। खुशनुमा सा गीत है और सितार का भरपूर इस्तेमाल हुआ है
इसमें।






गीत के बोल:

कौन रोकेगा अब प्यार का रास्ता
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी
आज बैठे-बिठाए ये क्या हो गया
दिल की हर बात आँखों में आने लगी
दिल की हर बात आँखों में आने लगी
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी

आ गए, आ गए, मुस्कुराने के दिन
आ गए, आ गए, मुस्कुराने के दिन
लड़खड़ाने के दिन, गुनगुनाने के दिन
लड़खड़ाने के दिन, गुनगुनाने के दिन
मैने पायल तो पाँवों में बाँधी नहीं
और आवाज़
और आवाज़ घुँघरू की आने लगी
और आवाज़ घुँघरू की आने लगी
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी

कोई राहों में कलियाँ बिछाने लगा
कोई राहों में कलियाँ बिछाने लगा
और इशारों से मुझको बुलाने लगा
और इशारों से मुझको बुलाने लगा
मैने दर्पण अभी तक तो देखा नहीं
meri बिंदिया मगर झिलमिलाने लगी
meri बिंदिया मगर झिलमिलाने लगी
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी

आज कैसी चली भीगी-भीगी पवन
आज कैसी चली भीगी-भीगी पवन
लहलहाने लगा मेरा नाज़ुक बदन
लहलहाने लगा मेरा नाज़ुक बदन
मैने पलकें अभी तक झुकाई नहीं
नींद क्यूँ मेरी आँखों में आने लगी
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी

कौन रोकेगा अब प्यार का रास्ता
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी
....................................
Kaun rokega ab....main to pee ki nagariya-Ek kali muskayi 1968

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न तुम बेवफ़ा हो-एक कली मुस्काई १९६८

ज़िन्दगी के सफ़र में कुछ ऐसे मुसाफिर मिलते हैं जो
बहुत दूर साथ चलने का वादा/ड्रामा कर के किसी मोड़ पर
बिछड़ जाते हैं या गधे के सर से सींग की तरह गायब हो
जाते हैं।

अगर अलगाव या बिछुड़न के लिए परिस्थितियां जिम्मेदार
होती हैं तो मामला ५०:५० अन्यथा प्रस्तुत गीत की पंक्तियाँ
दोहराते हुए दिल को ढाढ़स बंधाना पढता है। गीत में नायक
के जाते ही नायिका अपने दिल का गुबार बाहर निकाल रही
है।

मदन मोहन के रचे लता के गाये गीतों में से तकरीबन ५०
गीत मुझे बेहद पसंद हैं। ये उनमें से एक है। इसे मुझे सुनते
हुए कई साल हो गये ।

गीत में मीरा नामक अभिनेत्री दिखाई दे रही हैं। राजेंद्र कृष्ण
के बोलों को आवाज़ दी है लता मंगेशकर ने।



गीत के बोल:


न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं
न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं
मगर क्या करें अपनी राहें जुदा हैं

न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं

जहाँ ठंडी-ठंडी हवा चल रही है
जहाँ ठंडी-ठंडी हवा चल रही है
किसी की मोहब्बत वहाँ जल रही है
ज़मीं-आसमां हमसे दोनों खफ़ा हैं

न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं

अभी कल तलक़ तो मुहब्बत जवाँ थी
अभी कल तलक़ तो मुहब्बत जवाँ थी
मिलन ही मिलन था जुदाई कहाँ थी
मगर आज दोनों ही बेआसरा हैं

न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं

ज़माना कहे मेरी राहों में आ जा
ज़माना कहे मेरी राहों में आ जा
मुहब्बत कहे मेरी बाँहों में आ जा
वो समझें ना मजबूरियाँ अपनी क्या हैं

न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं

मगर क्या करें अपनी राहें जुदा हैं
न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं
.............................
Na tum bewafa ho-Ek Kali Muskayi 1968

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Nov 17, 2009

ज़ुल्फ़ बिखराती चली आई हो -एक कली मुस्काई १९६८

कुछ कुछ ऑटो रिक्क्षा के होर्न जैसे संगीत से शुरू होता
ये गीत मुझे बहुत पसंद है। ऐसा लगता है जैसे हिरोइन
पहाड़ से कूदने जा रही हो। लेकिन ऐसा नहीं है। सस्पेंस ख़त्म
होता है और मालूम पड़ता है कि वो हमारे हीरो से मिलने जा रही
है। बहुत ही रोमांटिक सा गीत है ये। जॉय मुखर्जी के आखिरी दौर
का एक चर्चित गाना। इसमे उनके साथ मीरा नाम की अभिनेत्री है।
कली शायद एक ही फ़िल्म में मुस्काई । दर्शक नहीं मुस्कुराये इसलिए
शायद बाद में उनको और फ़िल्में नहीं मिली। गीत लिखा है राजेंद्र कृष्ण
ने और संगीत है मदन मोहन का। जुल्फें उतनी भी बिखरी नहीं है जितना
गाने में जिक्र किया गया है। आँखों में गुलाबी डोरे तो कम दिखाई देते हैं
उसकी जगह आधा किलो काजल लगाया हुआ जरूर दिखाई दे रहा है।
दूसरा अंतरा शुरू होने पर आप महसूस करंगे की जॉय मुखर्जी की जुल्फें
ज्यादा बिखरती नज़र आ रही हैं।


गाने के बोल:

ज़ुल्फ़ बिखराती चली आई हो
ऐ जी सोचो तो ज़रा
बदली का क्या होगा
हाँ, हाँ
बदली का क्या होगा

हाय, ज़ुल्फ़ बिखराती चली आई हो
ऐ जी सोचो तो ज़रा
बदली का क्या होगा
हाँ, हाँ
बदली का क्या होगा

आंख शराबी तेरी
हाय, उसमे गुलाबी डोरे
डोरे डोरे
आंख शराबी तेरी
उसमे गुलाबी डोरे

शर्म के मारे दहकें
गाल ये गोरे गोरे
गोरे गोरे
शर्म के मारे दहकें
गाल ये गोरे गोरे

आग भड़कती चली आई ही
आग भड़कती चली आई ही

ऐ जी सोचो तो ज़रा
शोलों का क्या होगा

ज़ुल्फ़ बिखराती चली आई हो

ले बैठी हैं हमको
ये अनजान अदाएं
हाँ, ले बैठी हैं हमको
ये अनजान अदाएं

छोडके डर को तेरे
बोल कहाँ हम जाएँ
हाँ, हाँ
छोडके डर को तेरे
बोल कहाँ हम जाएँ

जाल फैलाती चली आई हो
जाल फैलाती चली आई हो
ऐ जी सोचो तो ज़रा
पंछी का क्या होगा

ज़ुल्फ़ बिखराती चली आई हो
ऐ जी सोचो तो ज़रा
बदली का क्या होगा
हाय, हाँ
बदली का क्या होगा

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