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Jul 26, 2017

ये हवा ये हवा ये हवा-गुमराह १९६३

गुमराह फिल्म से एक गीत सुनते हैं. तेज गति वाला और छोटी
पंक्तियों वाला ये गीत आकर्षक धुन में बंधा हुआ है.

साहिर लुधियानवी ने इसे लिखे है और रवि ने धुन बनाई है.
सुनील दत्त, अशोक कुमर और माला सिन्हा अभिनीत इस फिल्म
के २-३ गीत बेहद लोकप्रिय हैं.



गीत के बोल:

हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो
हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो

ये हवा ये हवा ये हवा
ये फिजा ये फिज़ा ये फिज़ा
है उदास जैसे मेरा दिल मेरा दिल
आ भी जा आ भी जा आ भी जा
आ भी जा आ भी जा आ भी जा


आ के अब तो चांदनी भी ज़र्द हो चली
हो चली हो चली
धड़कनों की नरम आंच सर्द हो चली
हो चली हो चली
ढल चुकी है रात आ के मिल
आ के मिल आ के मिल
आ भी जा आ भी जा आ भी जा
आ भी जा आ भी जा आ भी जा

राह में बिछी हुई है मेरी हर नज़र
हर नज़र हर नज़र
मैं तड़प रहा हूँ और तू है बेकरार
बेकरार बेकरार
रुक रही है सांस आ के मिल
आ के मिल आ के मिल
आ भी जा आ भी जा आ भी जा
आ भी जा आ भी जा आ भी जा

हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो
हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो
……………………………………………………………………..
Ye hawa ye hawa ye hawa-Gumrah 1963

Artists: Sunil Dutt, Mala Sinha

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Jul 18, 2011

आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद-गुमराह १९६३

गीत को अगर एक पंक्ति या वाक्य में लिखा जाए तो यूँ होगा -
आप जले पर नमक छिडकने चले आये. इसी बात को कई
पहलुओं के साथ आहिस्ता से कहा गया है इस गीत में साहिर द्वारा.
आखिर में सब बातों को याद करने के लिए अफ़सोस भी व्यक्त
किया गया है.

बात आहिस्ता से भले ही कही गयी हो मगर महेंद्र कपूर की बुलंद
आवाज़ में है. महेंद्र कपूर को दो फिल्मों के गीत से बहुत फायदा
हुआ-गुमराह और हमराज़. दोनों ही फिल्मों में रवि का संगीत है.

एक फ़िल्मी गीत को रेकोर्ड करने के लिए साजिंदों की कितनी जमात
हो सकती है इस गीत से अंदाजा लगाइए. ये बात दीगर है कि इन
साजिंदों को गायकों की तुलना में चवन्नी या अठन्नी ही प्राप्त होती है.
और शायद एक बात और गौर करने लायक है-सितार बजाने वाले शास्त्रीय
संगीत के कलाकार आराम से नीचे खुली जगह में बैठ के सितार वादन
करते हैं, यहाँ टीन की छोटी फोल्डिंग कुर्सी पर असुविधाजनक तरीके से
साजिन्दे सितार बजने की चेष्टा कर रहे हैं.




गीत के बोल:

आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए

आप के लब पे कभी अपना भी नाम आया था
शोख नजरों सी मुहब्बत का सलाम आया था
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था
आपको देख के वो अहदे वफा याद आया

कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए

रूह में जल उठे बुझती हुई यादों के दिए
कैसे दीवाने थे हम आपको पाने के लिए
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने एहसान किए
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने एहसान किए
पर जो मांगे से ना पाया वो सिला याद आया

कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए

आज वो बात नहीं फिर भी कोई बात तो है
मेरे हिस्से में ये हल्की सी मुलाकात तो है
ग़ैर का हो के भी ये हुस्न मेरे साथ तो है
ग़ैर का हो के भी ये हुस्न मेरे साथ तो है
हाय किस वक्त मुझे कब का गिला याद आया

कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए
.......................................
Aap aaye to khayal-e-dil-e-nashaad-Gumrah 1963

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Dec 10, 2010

चलो एक बार फिर से-गुमराह १९६३

मिलने के पहले भी तो हम अजनबी थे। मिलने के बाद फिर से
अजनबी बन जाएँ। साहिर लुधियानवी ने प्रेम को नए नए कोण से
देख लिया। जितने प्रामाणिक उनके गीत लगते हैं प्रेम के मामले में
उतने दूसरों के नहीं-ऐसा मैंने एक साहिर प्रेमी को कहते सुना। मैं भी
सोच में पड़ गया की ऐसा क्या क्या है साहिर के रोमांटिक गीतों में कि
जनता तारीफों के पुल, फ्लाईओवर बांधती नहीं अघाती ।

तो जनाब उनके गीतों में कुछ कटु सच्चाई की मिलावट भी पायी जाती
है। केवल कल्पना ही नहीं उन्होंने अपने अनुभव भी निचोड़ डाले हैं गीतों
में। साहिर की लिखी नज़्म प्रस्तुत है फिल्म गुमराह से। इसमें भी उन्होंने
-वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो
मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा,
यहाँ भूलने की जगह छोड़ना शब्द इस्तेमाल किया गया है, क्यूंकि भूलना तो
संभव ही नहीं है , या रिश्ते जब बोझ बन जाते हैं तो उन्हें तोडना ही बेहतर है-
का सन्देश देते हैं।

प्रेम त्रिकोण पर आधारित ये फिल्म सन १९६३ में सिनेमा घरों में प्रकट हुई
थी।  प्रस्तुत गीत के लिए महेंद्र कपूर को सर्वश्रेष्ठ गायक के फिल्मफ़ेयर
पुरस्कार से  नवाजा गया था । उस साल की बाकी दो प्रविष्टियों में जो गीत
थे वो इस प्रकार से हैं -१) मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्बत की कसम फिल्म
मेरे महबूब से रफ़ी का गाया हुआ और २) जो वादा किया वो-ताजमहल से
लता का गाया हुआ। साहिर को फिल्म ताजमहल के गीत लेखन के लिए
फिल्मफ़ेयर पुरस्कार दिया गया। संगीतकार रवि के लिए भी यह फिल्म
फायदेमंद साबित हुई। बी आर चोपड़ा की आगे आनेवाली अधिकांश फिल्मों
में आपको संगीतकार रवि का ही संगीत मिलेगा।



गीत के बोल:

चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों

ना मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की
ना तुम मेरी तरफ देखो गलत अंदाज़ नज़रों से
ना मेरे दिल की धड़कन लडखडाये मेरी बातों में
ना ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्म-कश का राज़ नज़रों से

चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों

तुम्हें भी कोई उलझान रोकती है पेशकदमी से
मुझे भी लोग कहते हैं, की यह जलवे पराये हैं
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माज़ी की
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माज़ी की
तुम्हारे साथ भी गुजरी हुई रातों के साये हैं

चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों

तार्रुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा

चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
..............................................................................
Chalo ek baar fir se ajnabi ban jaayen ham dono-Gumrah 1963

Artists: Sunil Dutt, Mala Sinha, Ashok Kumar

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