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Sep 15, 2017

दीवारों से मिल कर रोना-एक ही मकसद १९८८

आपको सुनवाते हैं सन १९८८ की फिल्म एक ही मकसद से
एक गीत जिसकी धुन पंकज उधास ने बनाई है. इसे गाया
है अनुराधा पौडवाल ने.

ओम पुरी और दिव्या राणा फिल्म के प्रमुख कलाकार हैं. ये
गीत सबसे पहले हमने पंकज उधास की आवाज़ में ही सुना
था. रचना कैसर उल जाफरी की है.



गीत के बोल:

दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है
हम भी पागल हो जायेंगे ऐसा लगता है
दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है
हम भी पागल हो जायेंगे ऐसा लगता है
दीवारों से

चलते चलते राह में कैसा मोड ये आया है
चलते चलते राह में कैसा मोड ये आया है
अपनी मंजिल का हर रास्ता धुंधला लगता है
हम भी पागल हो जायेंगे ऐसा लगता है
दीवारों से

कैसी यादें हैं जो उलझन बन कर आई हैं
कैसी यादें हैं जो उलझन बन कर आई हैं
हमसे जुदा अब हमको अपना साया लगता है 
हम भी पागल हो जायेंगे ऐसा लगता है
दीवारों से

रोक सके तो रोक ले कोई वक्त की ये रफ़्तार
आने वाले हर एक पल से डर सा लगता है

दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है
हम भी पागल हो जायेंगे ऐसा लगता है
दीवारों से
..............................................................
Deewaron se mil kar rona-Ek hi maqsad 1988

Artists: Om Puri, Divya Rana

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Jun 25, 2016

दीवारों से मिलकर रोना-पंकज उधास गज़ल

१९८० से १९९५ के बीच गज़लों का दौर चला, खूब चला.
सन १९९० से १९९५ के बीच इनके चलन में थोड़ी गिरावट
आई. शुद्ध गज़ल प्रेमियों को कोई फर्क नहीं पड़ा. वे पहले
कि तरह ग़ज़लें सुनते रहे, आनंद उठाते रहे. गज़ल प्रेमियों
का जो नया खेमा आया था आम आदमी के बीच में से,
उसकी पसंद बदलती रही ९० के बाद. फिलिमी गीतों और
गज़लों में स्विच ओवर चलता रहा जो २००० के आते आते
खत्म हो गया.

पंकज उधास ने आम आदमी के गज़ल गायक के रूप में
पहचान बना ली. शायद आप इस बात से सहमत न हों.
जब गज़ल धीमी रौशनी वाले अंग्रेजी मयखानों से निकल
कर किसी परिवहन के साधन में बजती मिले, किसी ट्रैक्टर
ट्रोली में फिट म्युज़िक सिस्टम में बजती मिले तो आप उसे
क्या कहेंगे?  परिवहन के साधनों में बस, मिनी बस, टेम्पो
ऑटो रिक्शा, लोडिंग गाडियां, ट्रक वगैरह शामिल हैं.

आज सुनते हैं पंकज उधास कि एक ऐसी गज़ल जो खास
से लेकर आम तक लोकप्रिय रही और सराही गई.




गज़ल के बोल:

दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है
हम भी पागल हो जायेंगे, ऐसा लगता है
दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है
हम भी पागल हो जायेंगे, ऐसा लगता है

दुनिया भर की यादें हमसे मिलने आती हैं
शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है

कितने दिनों के प्यासे होंगे यारों सोचो तो
शबनम का कतरा भी जिनको दरिया लगता है
हम भी पागल हो जायेंगे, ऐसा लगता है

किसको कैसर पत्थर मारूं कौन पराया है
शीश-महल में एक एक चेहरा अपना लगता है
हम भी पागल हो जायेंगे, ऐसा लगता है
..................................................................
Deewaron se mil kar-Pankaj Udhas Ghazal

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Apr 3, 2016

हम तेरे शहर में आए हैं-गज़ल गुलाम अली

गुलाम अली की गज़ल सुने काफी समय हो गया. आज
सुनवाता हूँ अपनी पसंद की एक गज़ल. तीन अंतरे तक
तो कहानी ठीक चलती है चौथे में झटका जैसा है.

इसके बोल लिखे है कैसर उल जाफरी के और संगीत स्वयं
गुलाम अली का.



बोल:

हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह
सिर्फ़ इक बार मुलाक़ात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह

मेरी मंजिल है कहाँ मेरा ठिकाना है कहाँ
सुबह तक तुझसे बिछड़ कर मुझे जाना है कहाँ
सोचने के लिए इक रात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह

अपनी आंखों में छुपा रक्खे हैं जुगनू मैंने
अपनी पलकों पे सजा रक्खे हैं आंसू मैंने
मेरी आंखों को भी बरसात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह

आज की रात मेरा दर्द-ऐ-मोहब्बत सुन ले
कंपकंपाते हुए होठों की शिकायत सुन ले
आज इज़हार-ए-खयालात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह

भूलना था तो ये इकरार किया ही क्यूँ था
बेवफा तूने मुझे प्यार किया ही क्यूँ था
सिर्फ़ दो चार सवालात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह
…………………………………………………………………..
Ham tere shahar mein aaye hain-Ghulam Ali Ghazal

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