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Apr 18, 2020

गये दिनों का सुराग़ लेकर-मीराज-ए-गज़ल १९८३

आशा भोंसले और गुलाम अली के गज़लों के एल्बम से अगली
रचना सुनते हैं जिसे नासिर काज़मी ने लिखा और गुलाम अली
ने संगीतबद्ध किया. ८० के दशक में ये एल्बम रिलीज़ हुआ था
और रिलीज़ के बाद काफी लोकप्रिय भी.

रचना काफी बड़ी है और उसमें से चंद शेर ही इसमें गाने के लिए
लिए गए हैं. ऐसी कुछ ग़ज़लें हम आपको सुनवा चुके हैं जो मूल
रूप से बड़ी हैं मगर गाने के लिए पूरे शेर प्रयोग में नहीं लाये गये.

इसे आप हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में अगर सुनने का शौक
फ़रमाते हैं तो इधर है-हबीब वली वर्ज़न



   


गज़ल के बोल:

गये दिनों का सुराग़ लेकर किधर से आया किधर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर किधर से आया किधर गया वो
अजीब मानुस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर

बस एक मोती सी छब दिखा कर
बस एक मोती सी छब दिखा कर बस एक मीठी सी धुन सुना कर
सितारा-ए-शाम बन के आया ब-रंग-ए-ख़्वाब-ए-सहर गया वो
अजीब मानुस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर

न अब वो यादों का चढ़ता दरिया
न अब वो यादों का चढ़ता दरिया न फ़ुर्सतों की है उदास बरखा
यूँ ही ज़रा सी कसक है दिल में
यूँ ही ज़रा सी कसक है दिल में जो ज़ख़्म गहरा था भर गया वो
अजीब मानुस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर

वो हिज्र की रात का सितारा
वो हिज्र की रात का सितारा वो हम-नफ़स हम-सुख़न हमारा
सदा रहे उसका नाम प्यारा
सदा रहे उसका नाम प्यारा सुना है कल रात मर गया वो
अजीब मानुस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर

वो रात का बेनवा मुसाफ़िर
वो रात का बेनवा मुसाफ़िर वो तेरा शाइर वो तेरा 'नासिर'
तेरी गली तक तो हमने देखा था फिर न जाने किधर गया वो
अजीब मानुस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर

गये दिनों का सुराग़ लेकर किधर से आया किधर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर
……………………………………………………………………..
Gaye dinon ka surag le kar-Meeraj-e-ghazal 1983

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Jan 3, 2019

खाली है अभी जाम-गुलाम अली ग़ज़ल

सुनते हैं अब्दुल हमीद अदम की रचना गुलाम अली
के स्वर में. ८० के दशक के उत्तरार्ध में एक कलेक्शन
में ये ग़ज़ल पहली बार सुनाई दी थी.

जाम, मयखाना वाली थीम में जो उम्दा चीज़ें हैं वो
हम आपको समय समय पर सुनवाते रहते हैं.




गीत के बोल:

खाली है अभी जाम मैं कुछ सोच रहा हूँ
ऐ गर्दिश-ए-अय्याम मैं कुछ सोच रहा हूँ

साक़ी तुझे एक थोड़ी सी तकलीफ़ तो होगी
साग़र को ज़रा थाम मैं कुछ सोच रहा हूँ

पहले बड़ी रगबत थी तेरे नाम से मुझको
अब सुनके तेरा नाम मैं कुछ सोच रहा हूँ

फिर आज 'अदम' शाम से ग़मग़ीं है तबीयत
फिर आज सर-ए-शाम मैं कुछ सोच रहा हूँ
……………………………………………………..
Khali hai abhi jam-Haseen Lamhe

Lyrics; Abdul Hameed Adam

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Dec 16, 2018

एक पगली मेरा नाम जो ले-गुलाम अली

गुलाम अली की ८० के दशक की एक और रचना सुनते
हैं जिसे मोहसिन नकवी ने लिखा है.

वेस्टन म्यूजिक वालों ने एल्बम निकाला था उस समय.
उस एल्बम में से ये काफी चर्चित रचना रही.




गीत के बोल:

एक पगली मेरा नाम जो ले शरमाये भी घबराये भी
गलियों गलियों मुझसे मिलने आये भी घबराये भी

रात गये घर जाने वाली गुमसुम लड़की राहों में
अपनी उलझी ज़ुल्फ़ों को सुलझाये भी घबराये भी

कौन बिछड़ कर फिर लौटेगा क्यूँ आवारा फिरते हो
रातों को एक चाँद मुझे समझाये भी घबराये भी

आने वाली रुत का कितना ख़ौफ़ है उसकी आँखों में
जाने वाला दूर से हाथ हिलाये भी घबराये भी
………………………………………………….
Ek pagli mera naam jo le-Ghulam Ali Ghazal

Lyrics: Mohsin Naqvi

Album: Haseen Lamhe

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Dec 3, 2018

देखकर दिलक़शी ज़माने की-गुलाम अली ग़ज़ल १९८८

८० के दशक के उत्तरार्ध में गुलाम अली की गाई
गज़लों का एक एल्बम आया था हसीं लम्हे नाम से.
इसके ४ वोल्यूम आये थे एक एक कर के.

इनमें से अब्दुल हमीद अदम की रचना सुनते हैं.



गीत के बोल:

देख कर दिलक़शी ज़माने की
आरज़ू है फ़रेब खाने की

ऐ ग़म-ए-ज़िंदगी न हो नाराज़
मुझको आदत है मुस्कुराने की

ज़ुल्मतों से न डर के रस्ते में
रोशनी है शराबख़ाने की

आ तेरे गेसुओं को प्यार करूँ
रात है मशअलें जलाने की
………………………………………
Dekh kar dilkashi zamane ki-Non film song

Album: Haseen lamhe

Lyrics: Abdul Hameed Adam

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Apr 15, 2018

याद याद याद याद-बेवफा २००५

यादें किसी का पीछा नहीं छोड़तीं. तन्हाई में जब आदमी जिंदगी
काजमा बाकी समेट रहा होता है तब ये ज्यादा आती हैं. सयाने
कह गए हैं कि मीठी यादों को ही दिमाग में लाया जाए जिससे
जिंदगी खुशनुमा ना सही नोर्मल बनी रहे, मगर दिमाग है कि
दुखद घटनाओं और प्रसंगों को ही ज्यादा उभारता है.

अनिल कपूर, अक्षय कुमार, सुष्मिता सेन और करीना कपूर
अभिनीत फिल्म बेवफा से एक गीत सुनते हैं समीर का लिखा
हुआ जिसकी धुन नदीम श्रवण ? ने बनाई है.





गीत के बोल:

तड़प ये इश्क की दिल से कभी नहीं जाती
के जान दे कर भी दीवानगी नहीं जाती
ना जाने वो कौन सी दुनिया है वो मेरे रब्बा
जहाँ से कोई सदा लौट के नहीं आती

इश्क में तो हर चीज़ मिट जाती है
बेकरारी बन के हमें तड़पाती है
याद याद याद बस याद रह जाती है
याद याद याद बस याद रह जाती है
इश्क में तो हर चीज़ मिट जाती है
इश्क में तो हर चीज़ मिट जाती है
बेकरारी बन के हमें तड़पाती है
बेकरारी बन के हमें तड़पाती है हाय
याद याद याद बस याद रह जाती है
याद याद याद बस याद रह जाती है
वो तेरी याद वो तेरी याद वो तेरी याद याद
याद याद याद बस याद रह जाती है
याद याद याद बस याद रह जाती है

कर के तनहा ये जिंदगानी क्यूँ गई छोड़ के कहानी
अब ये आंसू पिया ना जाए बिन तेरे अब जिया ना जाए
दर्द से टूटती मेरी साँसें ज़ख्म दिल का सिया ना जाए
दर्द से टूटती मेरी साँसें ज़ख्म दिल का सिया ना जाए
आ जा आ जा मेरी वफ़ा तुझे बुलाती है
आ जा आ जा मेरी वफ़ा तुझे बुलाती है
याद याद याद बस याद रह जाती है
याद याद याद बस याद रह जाती है
वो तेरी याद वो तेरी याद वो तेरी याद
याद याद याद बस याद रह जाती है
याद याद याद बस याद रह जाती है

याद में देखो बना है ये हसीं ताजमहल
याद में कोई लिखे शाम-ओ-सहर शोख ग़ज़ल
याद में देखो बना है ये हसीं ताजमहल
याद में कोई लिखे शाम-ओ-सहर शोख ग़ज़ल
दिल के दरिया में खिलता है ख़्वाबों का कमाल
याद आते हैं हमेशा वो गुज़रे हुए पल
तू नहीं है तेरी यादें मुझे सताती हैं
तू नहीं है तेरी यादें मुझे सताती हैं
याद याद याद बस याद रह जाती है
याद याद याद बस याद रह जाती है

इश्क में तो हर चीज़ मिट जाती है
बेकरारी बन के हमें तड़पाती है
इश्क में तो हर चीज़ मिट जाती है
बेकरारी बन के हमें तड़पाती है
याद याद याद बस याद रह जाती है
याद याद याद बस याद रह जाती है
वो तेरी याद वो तेरी याद वो तेरी याद
याद याद याद बस याद रह जाती है
याद याद याद बस याद रह जाती है
याद याद याद बस याद रह जाती है
याद याद याद बस याद रह जाती है
…………………………………………….
Yaad yaad yaad-Bewafa 2005

Artists: Anil Kapoor, Kareena Kapoor, Sushmita Sen

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Feb 12, 2018

आधी रात को ये दुनिया वाले-गुलाम अली

गुलाम अली की गाई एक गैर फ़िल्मी रचना सुनते हैं. इसमें प्रेमियों
के क्रियाकलापों के साथ साथ हीर रांझा का जिक्र भी है.

   


Ghulam Ali


गीत के बोल:

आधी रात को ये दुनिया वाले जब ख्वाबों में खो जाते हैं
ऐसे में मुहब्बत के रोगी यादों के चराग़ जलाते हैं

करते हैं मुहब्बत सब ही मगर हर दिल को सिला कब मिलता है
आतीं हैं बहारें गुलशन में हर फूल मगर कब खिलता है

मैं राँझा न था तू हीर न थी हम अपना प्यार निभा न सके
यूँ प्यार के ख़्वाब बहुत देखे ताबीर मगर हम पा न सके

मैंने तो बहुत चाहा लेकिन तू रख ना सकी वादों का भरम
अब रह रह कर याद आता है जो तूने किया इस दिल पे सितम

पर्दा जो हटा दूँ चेहरे से तुझे लोग कहेंगे हरजाई
मजबूर हूँ मैं दिल के हाथों मन्ज़ूर नहीं तेरी रुसवाई

सोचा है के अपने होंठों पर मैं चुप की मोहर लगा लूँगा
मैं तेरी सुलगती यादों से अब इस दिल को बहला लूँगा
…………………………………………………………………
Aadhi raat ko ye duniya waale-Ghulam Ali

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Jan 24, 2018

ग़म-ए-दिल किसी से छुपाना पड़ेगा-गुलाम अली

एक गैर फ़िल्मी गीत सुनते हैं गुलाम अली का गाया हुआ.    
सैफुद्दीन सैफ की रचना है और इसका संगीत तैयार किया है
रफीक हुसैन ने. इसे हमने लम्हा लम्हा नामक एल्बम में सुना
है.

इसे हम ग़ज़ल कह सकते हैं क्यूंकि इसमें लिखने वाले का नाम
आता है. आपका क्या ख्याल है पाठकों ?



गीत के बोल:

ग़म-ए-दिल किसी से छुपाना पड़ेगा
ग़म-ए-दिल किसी से छुपाना पड़ेगा
घड़ी दो घड़ी मुस्कुराना पड़ेगा
ग़म-ए-दिल किसी से छुपाना पड़ेगा
ग़म-ए-दिल किसी से छुपाना पड़ेगा

बहुत बच के निकले मगर क्या ख़बर थी
बहुत बच के निकले मगर क्या ख़बर थी
बहुत बच के निकले मगर क्या ख़बर थी
इधर भी तेरा आस्ताना पड़ेगा

ग़म-ए-दिल किसी से छुपाना पड़ेगा
ग़म-ए-दिल किसी से छुपाना पड़ेगा

चलो मयकदे में बसेरा ही कर लो
चलो मयकदे में बसेरा ही कर लो
चलो मयकदे में बसेरा ही कर लो
न आना पड़ेगा न जाना पड़ेगा

ग़म-ए-दिल किसी से छुपाना पड़ेगा
ग़म-ए-दिल किसी से छुपाना पड़ेगा

नहीं भूलता 'सैफ़' अहदे-तमन्ना
नहीं भूलता 'सैफ़' अहदे-तमन्ना
नहीं भूलता 'सैफ़' अहदे-तमन्ना
मगर रफ़्ता रफ़्ता भुलाना पड़ेगा

ग़म-ए-दिल किसी से छुपाना पड़ेगा
ग़म-ए-दिल किसी से छुपाना पड़ेगा
घड़ी दो घड़ी मुस्कुराना पड़ेगा
ग़म-ए-दिल किसी से छुपाना पड़ेगा
ग़म-ए-दिल किसी से छुपाना पड़ेगा
........................................................................
Gham-e-dil kisi se chhupana-Ghulam Ali Non film song

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Jun 22, 2017

अपनी धुन में रहता हूँ-गुलाम अली गज़ल

गुलाम अली की एक गीतनुमा गज़ल सुनते हैं.
नसीर काज़मी के बोल हैं और धुन स्वयं गायक
ने तैयार की है.





गज़ल के बोल:

अपनी धुन में रहता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ

ओ पिछली रुत के साथी
अब के बरस मैं तन्हा हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ

तेरी गली में सारा दिन
दुख के कंकर चुनता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ

मेरा दिया जलाये कौन
मैं तेरा खाली कमरा हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ

अपनी लहर है अपना रोग
दरिया हूँ और प्यासा हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ

आती रुत मुझे रोयेगी
जाती रुत का झोँका हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ
…………………………………………..
Apni dhun mein rehta hoon-Ghulam Ali Ghazal

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Jun 21, 2017

चमकते चाँद को टूटा हुआ-आवारगी १९९०

काफी दिन हुए गुलाम अली का कोई गीत गज़ल सुने. हम
आपको गैर फ़िल्मी गीत सुनवाते रहते हैं समय समय पर.
आज सुनते हैं एक फ़िल्मी गीत.

असद भोपाली की एक रचना सुनते हैं सन १९९० की फिल्म
आवारगी से जिसे अन्नू मलिक के संगीत की सेवा प्राप्त है.
इसे गाया है गुलाम अली ने.

फिल्म में गुलाम अली के गाये दो गीत हैं. अनिल कपूर
पर फिल्माए गए इस गीत को काफी लोकप्रियता मिली
है.



गीत के बोल:

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला

बड़ा दिलकश  बड़ा रँगीन  है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हज़ारों घर  घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर की गलियों का बंजारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर  दिन रात रोता हूँ
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला

मेरे मालिक  मेरा दिल क्यूँ तड़पता है  सुलगता है
तेरी मर्ज़ी  तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल  किसी को तूने अंगारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला

यही आग़ाज़ था मेरा  यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था  मुझे नाकाम होना था
मेरी तक़दीर ने मुझको  तक़दीर का मारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
………………………………………………….
Chamakte chand ko-Awargi 1990

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Jun 8, 2017

आप हैं क्यों ख़फ़ा-गुलाम अली गज़ल

गुलाम अली की एक गज़ल सुनते हैं. कौन गीतकार है और
कौन संगीतकार इसकी जानकारी आपको नेट पर मिल
जायेगी, धन्यवाद.




गज़ल के बोल:

आप हैं क्यों ख़फ़ा  कुछ पता तो चले
आप हैं क्यों ख़फ़ा  कुछ पता तो चले
है मेरी क्या खता  कुछ पता तो चले
आप हैं क्यों ख़फ़ा  कुछ पता तो चले
कुछ पता तो चले

आज चेहरे पे रंग-ए-उदासी क्यूँ
ऐ मेरे दिलरुबा कुछ पता तो चले
आप हैं क्यों ख़फ़ा  कुछ पता तो चले
कुछ पता तो चले

आपके और मेरे प्यार के दरमियाँ
क्यों है ये फासला कुछ पता तो चले
आप हैं क्यों ख़फ़ा  कुछ पता तो चले
कुछ पता तो चले

मैं अगर बेवफा हूँ तो यूँ ही सही
कौन है बावफा कुछ पता तो चले
आप हैं क्यों ख़फ़ा  कुछ पता तो चले
कुछ पता तो चले
...............................................................
Aap hain kyun khafa-Ghulam Ali Ghazal

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Apr 24, 2017

ज़ख्म-ए-तन्हाई में-गुलाम अली गज़ल

एक गज़ल सुनते हैं मुज़फ्फर वारसी की लिखी और
गुलाम अली की गाई हुई.




बोल:

ज़ख्म-ए-तन्हाई में खुश्बू-ए-हिना किसकी थी
ज़ख्म-ए-तन्हाई में खुश्बू-ए-हिना किसकी थी
साया दीवार पे मेरा था  सदा किसकी थी
ज़ख्म-ए-तन्हाई में खुश्बू-ए-हिना किसकी थी

आंसुओं से ही सही भर गया दामन मेरा
आंसुओं से
आंसुओं से ही सही भर गया दामन मेरा
हाथ तो मैंने उठाये थे  दुआ किसकी थी
हाथ तो मैंने उठाये थे  दुआ किसकी थी
साया दीवार पे मेरा था  सदा किसकी थी

मेरी आहों की ज़बां कोई समझता कैसे
मेरी
मेरी आहों की ज़बां कोई समझता कैसे
ज़िन्दगी इतनी दुखी मेरे सिवा किसकी थी
ज़िन्दगी इतनी दुखी मेरे सिवा किसकी थी
साया दीवार पे मेरा था  सदा किसकी थी

छोड़ दी किसके लिए तूने मुज़फ्फर दुनिया
हाँ
छोड़ दी किसके लिए तूने मुज़फ्फर दुनिया
जुस्तजू सी तुझे हर वक्त बता किसकी थी
जुस्तजू सी तुझे हर वक्त बता किसकी थी
साया दीवार पे मेरा था  सदा किसकी थी

ज़ख्म-ए-तन्हाई में खुश्बू-ए-हिना किसकी थी
साया दीवार पे मेरा था  सदा किसकी थी
ज़ख्म-ए-तन्हाई में
……………………………………………………..
Zakhm-e-tanhai mein khusboo-Ghulam Ali Ghazal

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Apr 22, 2017

गम है या खुशी है तू-गुलाम अली गज़ल

गुलाम अली ने छोटी पंक्तियों वाली ग़ज़लें काफी गाई
हैं. एक आपने ज़रूर सुनी होगी-अपनी धुन में रहता हूँ.
एक और सुन लेते हैं नासिर काज़मी की लिखी हुई.




गीत के बोल:

ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

आफतों के दौर में
चैन की घड़ी है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

मेरी रात का चिराग
मेरी नींद भी है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

मैं खिज़ां की शाम हूँ
रूत बहार की है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

दोस्तों के दरमियाँ
वजह दोस्ती है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

मेरी सारी उम्र में
एक ही कमी है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

मैं तो वो नहीं रहा
हाँ मगर वो ही है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

'नासिर' इस दयार में
कितना अजनबी है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू
……………………………………………………..
Gam hai ya khushi-Ghulam Ali Ghazal

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Mar 7, 2017

किया है प्यार जिसे-गुलाम अली गज़ल

सुनते हैं क़तील शिफ़ाई की लिखी और गुलाम अली की
गाई एक लोकप्रिय गज़ल.





गीत के बोल:

किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह
किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह
किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह

बढ़ा के प्यास मेरी उसने हाथ छोड़ दिया
बढ़ा के प्यास मेरी उसने हाथ छोड़ दिया
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह
किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह

कभी ना सोचा था हम ने क़ातिल उस के लिए
कभी ना सोचा था हम ने क़ातिल उस के लिए
करेगा हमपे सितम वो भी हर किसी की तरह
करेगा हमपे सितम वो भी हर किसी की तरह
किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह

किसे खबर थी बढ़ेगी कुछ और तारीखी
किसे खबर थी बढ़ेगी कुछ और तारीखी
मिला है हमसे वो किसी बदली में चाँदनी की तरह
मिला है हमसे वो किसी बदली में चाँदनी की तरह
किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह

सितम तो ये है के वो भी ना बन सका अपना
सितम तो ये है के वो भी ना बन सका अपना
कुबूल हमने लिये जिस के ग़म खुशी की तरह
कुबूल हमने लिये जिस के ग़म खुशी की तरह
किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
.............................................................
Kiya hai pyar jise hamne-Ghulam Ali ghazal

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Sep 7, 2016

आ गई याद शाम ढलते ही-गुलाम अली गज़ल

आज सुनते हैं गुलाम अली की गाई एक गज़ल. अभी तक आपको
जो उनकी ग़ज़लें सुनवाई थीं  वो ७० और ८० के दशक वाली थीं.
उसके बाद के दौर की एक गज़ल सुनिए आज जिसके बोल लिखे हैं
मुनीर नियाज़ी ने.

अपनी उम्र के ७५ वसंत देख चुके गुलाम अली की पहचान आज तक
के सबसे बढ़िया गज़ल गायकों में होती है. गुलाम अली का नाम उनके
पिता ने बड़े गुलाम अली खान के नाम पर रखा था. गुलाम अली की
विशेषता राग रागिनियों पर आधारित ग़ज़लें हैं. बोल मुनीर नियाजी
के हैं.




गज़ल के बोल:

आ गई याद शाम ढलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही
बुझ गया दिल चराग़ जलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही

खुल गये शहर-ए-ग़म के दरवाज़े
खुल गये शहर-ए-ग़म के दरवाज़े
खुल गये शहर-ए-ग़म के दरवाज़े
इक ज़रा सी हवा के चलते ही
इक ज़रा सी हवा के चलते ही

आ गई याद शाम ढलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही

कौन था तू के फिर न देखा तुझे
कौन था तू के फिर न देखा तुझे
कौन था तू के फिर न देखा तुझे
मिट गया ख़्वाब आँख मलते ही
मिट गया ख़्वाब आँख मलते ही

आ गई याद शाम ढलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही

तू भी जैसे बदल सा जाता है
तू भी जैसे बदल सा जाता है
तू भी जैसे बदल सा जाता है
अक्स-ए-दीवार के बदलते ही
अक्स-ए-दीवार के बदलते ही

आ गई याद शाम ढलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही
बुझ गया दिल चराग़ जलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही
आ गई याद शाम ढलते ही
……………………………………………………………….
Aa gayi shaam dhalte hi-Ghulam Ali Ghazal

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Apr 3, 2016

हम तेरे शहर में आए हैं-गज़ल गुलाम अली

गुलाम अली की गज़ल सुने काफी समय हो गया. आज
सुनवाता हूँ अपनी पसंद की एक गज़ल. तीन अंतरे तक
तो कहानी ठीक चलती है चौथे में झटका जैसा है.

इसके बोल लिखे है कैसर उल जाफरी के और संगीत स्वयं
गुलाम अली का.



बोल:

हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह
सिर्फ़ इक बार मुलाक़ात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह

मेरी मंजिल है कहाँ मेरा ठिकाना है कहाँ
सुबह तक तुझसे बिछड़ कर मुझे जाना है कहाँ
सोचने के लिए इक रात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह

अपनी आंखों में छुपा रक्खे हैं जुगनू मैंने
अपनी पलकों पे सजा रक्खे हैं आंसू मैंने
मेरी आंखों को भी बरसात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह

आज की रात मेरा दर्द-ऐ-मोहब्बत सुन ले
कंपकंपाते हुए होठों की शिकायत सुन ले
आज इज़हार-ए-खयालात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह

भूलना था तो ये इकरार किया ही क्यूँ था
बेवफा तूने मुझे प्यार किया ही क्यूँ था
सिर्फ़ दो चार सवालात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह
…………………………………………………………………..
Ham tere shahar mein aaye hain-Ghulam Ali Ghazal

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Mar 4, 2016

वो कभी मिल जाएँ तो–गज़ल गुलाम अली

गुलाम अली की कई ग़ज़लें गायकी के हिसाब से कठिन
हैं जिन्हें गुनगुनाना आसान काम नहीं होता उनमें से
एक है आज के लिए. सुनिए अख्तर शीरानी की लिखी
हुई गज़ल.

इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर
चाँदनी रातों में रोया कीजिए




गज़ल के बोल:

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए
रात दिन सूरत को देखा कीजिए

चाँदनी रातों में इक-इक फूल को
बेख़ुदी कहती है सजदा कीजिए
वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए

जो तमन्ना बर न आए उम्र भर
उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए
वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए

इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर
चाँदनी रातों में रोया कीजिए
वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए

पूछ बैठे हैं हमारा हाल वो
बेख़ुदी तू ही बता क्या कीजिए
वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए

हम ही उस के इश्क़ के क़ाबिल न थे
क्यूँ किसी ज़ालिम का शिकवा कीजिए
वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए
.................................................................
Wo kabhi mil jayen to-Ghulam Ali Ghazal

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Dec 20, 2015

इतना टूटा हूँ के-गुलाम अली ग़ज़ल

इस गज़ल को सुनकर फिल्म प्यासा के गुरु दत्त वाले चरित्र
की याद आ जाती है. दिलजले ऐसी भावनाएं नहीं निकाला
करते, ये तो उससे भी बढ़ कर कहीं और एक झंझोडे हुए,
लतियाये हुए, धकियाये हुए, लताड़े हुए, दुखियारे की टीस
जैसी कुछ चीज़ सुनाई देती है. वक्त कब किसी का बैंड बजा
दे किसी को नहीं पता.

नाउम्मीदी की इन्तेहा क्या होती है इस गज़ल से बखूबी हम
समझ सकते हैं. एक कम्प्रोमाईजिंग स्तिथि में व्यक्ति पहुँच
जाता है जिंदगी में तब वो जैसे जिंदगी चलाना चाहती है वैसे
ही चलने लगता है सारे लोजिक, किन्तु परन्तु एक तरफ कर
के. गज़ल लिखी है : मोईन नज़र ने और इसका संगीत स्वयं
गुलाम अली ने तैयार किया है.




गज़ल के बोल:

इतना टूटा हूँ के छूने से बिखर जाऊँगा
अब अगर और दुआ दोगे तो मर जाऊँगा

पूछकर मेरा पता वक्त रायदा न करो
मैं तो बंजारा हूँ क्या जाने किधर जाऊँगा
इतना टूटा हूँ के छूने से बिखर जाऊँगा

हर तरफ़ धुंध है, जुगनू है, न चराग कोई
कौन पहचानेगा बस्ती में अगर जाऊँगा
इतना टूटा हूँ के छूने से बिखर जाऊँगा

ज़िन्दगी मैं भी मुसाफिर हूँ तेरी कश्ती का
तू जहाँ मुझसे कहेगी मैं उतर जाऊँग
इतना टूटा हूँ के छूने से बिखर जाऊँगा

फूल रह जायेंगे गुलदानों में यादों की नज़र
मै तो खुशबु हूँ फिज़ाओं में बिखर जाऊँगा

इतना टूटा हूँ के छूने से बिखर जाऊँगा
अब अगर और दुआ दोगे तो मर जाऊँगा
………………………………………………………………….
Itna toota hoon-Ghulam Ali

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Aug 10, 2015

कैसी चली है अब के हवा-गज़ल गुलाम अली

गीतों गज़लों और कवितायेँ कई संकेत लिए होती हैं. इनमें
प्रतीकों का काफी उपयोग होता है. आपके पास ढेर सारे अर्थ
निकालने का सामान होता है.

हवा चलने से ट्रेंड को भी समझा जा सकता है किसी चीज़ के.
‘कैसी चली हवा’ गज़ल से मुझे तेज गति से बढती वाहनों की
संख्या और ट्रैफिक के बढते घनत्व की याद आती है. अनाजों
का घनत्व तो कम होता जा रहा है, प्रदूषण का घनत्व बढ़ता
जा रहा है. उसके अलावा मानसिक प्रदूषण भी बढ़ रहा है तेज
रफ़्तार से. मोबाइल और वाहनों में भावनाएं और मानवीय गुण
कहीं गम होते जा रहे हैं.

आइये सुनते हैं गुलाम अली की गयी एक गज़ल जिसमें कुछ
ऐसी ही बातें कही गई हैं. ये आज के समय पर प्रासंगिक है.



गज़ल के बोल:

कैसी चली है अब के हवा, तेरे शहर में
बन्दे भी हो गये हैं ख़ुदा, तेरे शहर में

क्या जाने क्या हुआ कि परेशान हो गए
इक लहज़ा रुक गयी थी सबा तेरे शहर में
बन्दे भी हो गये हैं ख़ुदा, तेरे शहर में

कुछ दुश्मनी का ढब है न अब दोस्ती के तौर
दोनों का एक रंग हुआ तेरे शहर में
बन्दे भी हो गये हैं ख़ुदा, तेरे शहर में

शायद उन्हें पता था कि 'ख़ातिर' है अजनबी
लोगों ने उसको लूट लिया तेरे शहर में
बन्दे भी हो गये हैं ख़ुदा, तेरे शहर में

कैसी चली है अब के हवा, तेरे शहर में
बन्दे भी हो गये हैं ख़ुदा, तेरे शहर में
...............................................................
Kaisi chali ab ke hawa-Ghulam Ali Gazal

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Jun 23, 2015

हमको किसके गम ने मारा - गुलाम अली

आज सुनिए गुलाम अली की गाई हुई एक गज़ल.
इसे मसरूर अनवर ने लिखा है. ये गुलाम अली की
गाई हुयी लोकप्रिय गज़लों में से एक है.

दोस्ती और प्यार के नाम ये गज़ल थोड़े ही शब्दों
में रिश्तों के पलस्तर उधेड़ देती है. शब्द सरल से
ही इस गज़ल के, इसलिए बोल आसानी से समझ
आ जाते हैं.

लगातार फ़िल्मी गीतों से बदहजमी न हो जाए इसलिए
बीच बीच में हम आपको गज़ल या गैर फ़िल्मी गीत
सुनवा दिया करते हैं जो पाचक चूर्ण सा काम करते
हैं.




गज़ल के बोल:


हमको किसके गम ने मारा, ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा, ये कहानी फिर सही

दिल के लूटने का सबब पूछो न सबके सामने
नाम आएगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही

हमको किसके गम ने मारा, ये कहानी फिर सही

नफरतों के तीर खा कर, दोस्तों के शहर में
हमने किस किस को पुकारा, ये कहानी फिर सही

हमको किसके गम ने मारा, ये कहानी फिर सही

क्या बताएं प्यार की बाजी, वफ़ा की राह में
कौन जीता कौन हारा, ये कहानी फिर सही

हमको किसके गम ने मारा, ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा, ये कहानी फिर सही
..........................................................................
Hamko kiske gham ne maara-Ghulam Ali Ghazal

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May 17, 2015

दयार-ए-दिल की रात में-गुलाम अली गज़ल

८० के दशक में एक फिल्म आई थी-माटी मांगे खून जिसमें
गुलाम अली की गाई हुई एक गज़ल है-ये दिल ये पागल
दिल मेरा. इस फिल्म के थोड़े पहले एक एल्बम निकला
मीराज-ए-गज़ल जिसमें गुलाम अली और आशा भोंसले के
स्वर हैं. फिल्म बनने में समय लगता है, गाना पहले रिकोर्ड
हो गया था उसके बाद इस एल्बम पर काम हुआ.

गज़ल प्रेमियों को ये सौगात पसंद आई और उन्होंने इसे
सहेज के रख लिया गाहे-बगाहे सुनने के लिए. इसमें एक
से बढ़ कर एक ग़ज़लें हैं. आज आपको सुनवाते हैं नासिर
काज़मी की लिखी गज़ल जिसे गुलाम अली और आशा भोंसले
ने गाया है. फिल्म सन १९८४ में रिलीज़ हुई थी और अल्बम
निकला था १९८३ में.





गज़ल के बोल:

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ, वो शक़्ल तो दिखा गया

वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ हुई
वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

जुदाइयों के ज़ख़्म, दर्द-ए-ज़िन्दगी ने भर दिये
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

ये सुबहो की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
अब आईने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ़ गई ये मैं कहाँ चला गया

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गईं वो सोहबतें
ज़मीं निगल गई उन्हें या आसमान खा गया

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

गए दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक
अलम्कशो उठो कि आफ़ताब सर पे आ गया

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
..................................................................
Dayare-dil ki raat mein-Meeraz-e-ghazal 1983

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