Nov 30, 2009

नारी कुछ अइसन आगे-स्वयंवर १९८०

बी नागी रेड्डी नाम के शख्स ने १९४७ में एक बच्चों की एक पत्रिका
चंदामामा का प्रकाशन शुरू किया जिसके वे संस्थापक संपादक भी थे।
१९४७ से अनवरत चला सिलिसला बस १९९८ में कुछ समय के लिए
टूटा। उसके पश्चात फ़िर से इसका प्रकाशन शुरू हुआ और निर्बाध चला
आ रहा है । पत्रिका १३ भाषाओँ में छपती है। विक्रम बेताल की कहानियाँ
आम पाठक तक पहुँचाने का श्रेय चंदामामा को जाता है। पत्रिका को
चक्रपाणी नाम के उनके मित्र की दूर दृष्टि , अथक प्रयास और लगन
के फलस्वरूप आज ये स्थान प्राप्त हुआ है ।

बी नागी रेडी ने कई पारिवारिक फ़िल्में बनायीं जिनमे उन्होंने मानवीय
संबंधों की पेचीदगियों पर रौशनी डाली और उलझनों के हल भी फिल्मों
के माध्यम से सुझाये। दोहरे चरित्र पर आधारित फ़िल्म राम और श्याम
के निर्माता रेड्डी ने यादगार फ़िल्में हिन्दी फिल्मों के दर्शकों को दिखायीं
जैसे यही है ज़िन्दगी(१९७७),जूली (१९७५), स्वर्ग नरक(१९७८),
स्वयंवर(१९८०), श्रीमान श्रीमती(१९८२)।

स्वयंवर फ़िल्म के गीत मधुर हैं और मैं इन गीतों का एक नियमित श्रोता
हूँ। आपको एक गीत सुनवाता हूँ जो किशोर कुमार गा रहे हैं संजीव कुमार
के लिए । नारी आज समाज में जिस गति से अपना रुतबा बढाती जा रही
है उसका प्रभाव पुरूष वर्ग पर क्या पढ़ रहा है वो गीत के माध्यम से
बतलाया गया है। गीत आज इस नई सदी में भी उतना ही प्रासंगिक है
जितना ये ८० के दशक में था। गुलज़ार  साहब ने कलम चलायी है और
राजेश रोशन ने बाजे बजाये हैं ।


गीत के बोल:


नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है

नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है

वो दिन गए किधर के, चूल्हे माँ सर खपाया
वो दिन गए किधर के, चूल्हे माँ सर खपाया
इक पैर अब ज़मीन पर, इक चाँद पर जमाया
बदली है जब से औरत, दुनिया बदल रही है
बदली है जब से औरत, दुनिया बदल रही है

मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है
नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है

मरदन को दई के पेंशन, लडती है अब इलेक्शन
मरदन को दई के पेंशन, लडती है अब इलेक्शन
कहते थे जिसको सिस्टर, अब हुयी गई मिनिस्टर
मरदन की मोमबत्ती, टप टप पिघल रही है
मरदन की मोमबत्ती, टप टप पिघल रही है

मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है
नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है

चाभी का छल्ला खोला, आँचल से नारियों ने
चाभी का छल्ला खोला, आँचल से नारियों ने
बन्दूक भी उठा ली अब फौजी नारियों ने
हर देस औरतन की पलटन निकल रही है
हर देस औरतन की पलटन निकल रही है

मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है

नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है

0 comments:

© Geetsangeet 2009-2020. Powered by Blogger

Back to TOP