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Jan 23, 2016

आपको जो देखेगा-बादल १९६६

फिल्म बादल एक सन १९६६ की फिल्म है जिससे एक गीत
आप सुन चुके हैं पहले. आइये सुना जाए दूसरा गीत. ये एक
रोमांटिक युगल गीत है जिसमें नायिका की शान में कसीदे
काढे गए हैं.

प्रस्तुत गीत संजीव कुमार और हेलन पर फिल्माया गया है.
भूपेंद्र के गाये शुरूआती गीतों में से एक है ये. गीत लिखा
है असद भोपाली ने और इस गीत में भूपेंद्र का साथ दिया
है आशा भोंसले ने.

इस गीत को मैंने अपने एक मित्र को सुनाया तो उनकी जो
प्रतिक्रिया थी वो यूँ थी- टॉप किलास है, फर्स्ट किलास है.
हेलन ने इस गीत में प्राण फूँक दिए हैं.

गीत दो स्पीड में चलता है. ऐसे प्रयोग आपने अवश्य सुने
होंगे. एक पुराणी सावन का गीत है-नैन द्वार से मन में वो
आ कर-मुकेश और लाता का गाया हुआ.



गीत के बोल:

आपको जो देखेगा वो प्यार ही से देखेगा
क्या खूबसूरत हैं आप खूबसूरत हैं
आपको जो देखेगा वो प्यार ही से देखेगा
राह चालत मन्ने छेड़े भंवर जी
राह चालत मन्ने छेड़े भंवर जी
मारे नजरिया बाण रे
हो ओ मारे नजरिया बाण रे
हाय राम निकले है म्हारी जान रे

दूर से घूरे पास से गुज़रे
नटखट सीना तान के
रास्ता रोके बैंया पकडे
म्हाने अकेली जान के
हो ओ रूप के रसिया मन के बसिया 
कैसे बने अनजान रे
हाय राम निकले है म्हारी जान रे
राह चालत मन्ने छेड़े भंवर जी
मारे नजरिया बाण रे
हाय राम निकले है म्हारी जान रे
हाय राम निकले है म्हारी जान रे

आपको जो देखेगा वो प्यार ही से देखेगा

थर थर कांपे नन्हा सा दिल
इन नैना के वार से
राम बचाए हरजाई से
ऐसे जुल्मी प्यार से
ओ ओ जोडूं मैं थारे हाथ कुंवर जी
काहे करो थे हैरान रे
हाय राम निकले है मेरी जान रे
राह चालत मन्ने छेड़े भंवर जी
मारे नजरिया बाण रे
हाय राम निकले है मेरी जान रे
हाय राम निकले है मेरी जान रे

आपको जो देखेगा वो प्यार ही से देखेगा
क्या खूबसूरत हैं आप खूबसूरत हैं
आपको जो देखेगा वो प्यार ही से देखेगा
............................................................
Aapko jo dekhega-Badal 1966

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Dec 6, 2015

हवा के साथ साथ-सीता और गीता १९७२

फिल्म सीता और गीत से एक गीत सुनिए आज. ये फिल्म
हेमा मालिनी के कैरियर की सबसे पहली और बड़ी सुपर हिट
फिल्म थी. गौरतलब है हिंदी फिल्म सिनेमा इतिहास में जुड़वाँ
भाई-बहन वाली कई फ़िल्में बनी हैं मगर सबसे ज्यादा तवज्जो
दी जाती है दिलीप कुमार अभिनीत ‘राम और श्याम’ और हेमा
अभिनीत ‘सीता और गीता’ को. फिल्म में उनके साथ दो नायक
हैं-संजीव कुमार और धर्मेन्द्र.

एक अच्छा रोमांटिक गीत है ये जिसे आनंद बक्षी ने लिखा है.
इसे गा रहे हैं आशा भोंसले और किशोर कुमार. आपने पुराने
आयोडेक्स के विज्ञापन में “ऊह आह आउच’ जैसे शब्द सुने होंगे.
ये कभी चोट लग जाती है तब मुंह से निकालते हैं. हमारे मुंह से
कभी नहीं निकले ! मैं मुंह से आउच की आवाज़ निकालने वाले
शख्स/शख्सी को सालों से ढूंढ रहा हूँ. ऊह और आह तो ज़रूर
सुने हैं और कई बार सुने हैं. शब्द बना है तो कोई न कोई वजह
ज़रूर होगी, ज़ाहिर सी बात है. किसी ने तो निकाला ही होगा
अपने मुंह से. हो सकता है कई लोगों ने निकाला हो. समय के
साथ “आउच’ कहने की कला लुप्त हो गयी हो, ये भी संभव है.

समय के साथ आवाजें भी बदल जाती हैं और जनता की पसंद भी.
अभी नाक से आवाजें निकालने वालों की चांदी है, हो सकता है आगे
चल के शरीर के दूसरे छेदों से आवाज़ निकलने वालों की हो.
वैसे आजकल के रीमिक्स में आने वाली कुछ आवाजें ऐसा भ्रम पैदा
करती हैं मानो शरीर के किसी खास छेद से निकल रही हों.

गीत सुनते हैं. ये बड़ी हिट फिल्म थी इस पर चर्चा अगले गीत के
प्रस्तुति के वक्त.






गीत के बोल:

हवा के साथ साथ,
घटा के संग संग
हवा के साथ साथ,
घटा के संग संग
ओ साथी चल
मुझे ले के साथ चल तू,
यू ही दिन रात चल तू
संभल मेरे साथ चल तू,
ले हाथों में हाथ चल तू
ओ साथी चल

एक तो ये मौसम है बड़ा सुहाना
उसपे अपना दिल भी है दीवाना
परबत से आ के ना टकरा जाना
तू बन के बादल
मुझे ले के साथ चल तू,
यू ही दिन रात चल तू
संभल मेरे साथ चल तू,
ले हाथों में हाथ चल तू
ओ साथी चल

हँसती है ये दुनियाँ तो हँसने दे
नागिन बन के इस रुत को डसने दे
मुझको अपनी आखों में बसने दे
तू बन के काजल
ओ साथी चल

अपनी रेशमी जुल्फें लहराने दे
मुझको अपनी बाहों में आने दे
थक गई आज बहुत मैं अब जाने दे ना
मिलेंगे फिर कल
मुझे ले के साथ चल तू,
यू ही दिन रात चल तू
संभल मेरे साथ चल तू,
ले हाथों में हाथ चल तू
ओ साथी चल
........................................................................
Hawa ke saath saath ,,,o  sathi chal-Seeta aur Geeta 1972

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Mar 3, 2015

लोग तो मरकर जलते होंगे-गौरी १९६८

गीतकार राजेंद्र कृष्ण ने कई अमर गीत दिए हैं हिंदी फिल्म
संगीत को. उनकी हर विषय पर पकड़ थी चाहे वो रोमांटिक
गीत हो, उपदेशात्मक गीत हो, भजन हो या कव्वाली हो. फिल्म
गौरी के लिए उन्होंने एक नायब गीत लिखा जिसे मोहम्मद रफ़ी
ने बहुत संजीदगी से गाया है. पिछली पोस्ट में हमने जिक्र किया
था संगीतकार अपनी विशेष और सर्वश्रेष्ठ धुन खुद भी गाने की
तमन्ना रखता है. आपको आज दोनों गीत सुनवाते हैं रफ़ी की
आवाज़ वाला और संगीतकार रविशंकर शर्मा द्वारा खुद गाया हुआ.
ये एक दर्द भरा गीत है और इसके बोल थोडा झंझोड़ने वाले हैं.

गीत बैकग्राउंड में बज रहा है और जिस कलाकार ने इस पर
अभिनय किया है वो हैं हिंदी सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ नायकों में से
एक-संजीव कुमार. तिल तिल मरना और पल पल मरना इन
शब्दों के अर्थ आप इस गीत में ढूंढ सकते हैं.


१) रफ़ी का गाया गीत




२) संगीतकार रवि की आवाज़ में यही गीत



गीत के बोल:

गंगा भी बह रही है
चिताओं के साथ
शोले भी चल रहे हैं
हवाओं के साथ
शोले भी चल रहे हैं
हवाओं के साथ

लोग तो मरकर जलते होंगे
मैं जीते जी जलता हूँ
लोग तो मरकर जलते होंगे
मैं जीते जी जलता हूँ
आँख में सपने फूलों के
और अंगारों पर चलता हूँ

लोग तो मरकर जलते होंगे
मैं जीते जी जलता हूँ

सूरज तो दिन भर चल चल कर
शाम को थक कर ढल जाता है
सूरज तो दिन भर चल चल कर
शाम को थक कर ढल जाता है
मैं वो सूरज हूँ जो निकल कर
पल भर में ही ढलता हूँ

लोग तो मरकर जलते होंगे
मैं जीते जी जलता हूँ
आँख में सपने फूलों के
और अंगारों पर चलता हूँ
लोग तो मरकर जलते होंगे
मैं जीते जी जलता हूँ
मर कर वापस कौन आया है
मैं मर कर वापस आया
मर कर वापस कौन आया है
मैं मर कर वापस आया
जब ये जीना रास न आया
फिर मरने को चलता हूँ

लोग तो मरकर जलते होंगे
मैं जीते जी जलता हूँ
आँख में सपने फूलों के
और अंगारों पर चलता हूँ

लोग तो मरकर जलते होंगे
मैं जीते जी जलता हूँ
लोग तो मरकर जलते होंगे
मैं जीते जी जलता हूँ.
......................................................................
Log to markar jalte-Gauri 1968

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Feb 6, 2015

अपने जीवन की उलझन को-उलझन १९७५

घटिया घासलेटी लेखन-इन शब्दों को मैंने पहली बार पढ़ा था
जब ये किसी पहाड़ी क्षेत्र के एक लेखा के लिए प्रयुक्त हुए थे
एक दैनिक के कॉलम में. उसके बाद इस शब्द समूह का मैंने
काफी प्रयोग किया. जैसे उदाहरण के लिए एक घटिया घासलेटी
कवि ह्रदय के हिलोरे पर ध्यान दीजिए-

कभी बर्फ समझ के जमा दिया
कभी आइसक्रीम सा पिघला दिया
कभी लौंड्री में धुला दिया
कभी बिना कलफ प्रेस करा दिया

ये पंक्तियाँ मुझे एक जगह सड़ा सा पिज्ज़ा खाते हुए दिमाग में
आये थे. हो सकता है आज ये पंक्तियाँ घासलेट सी बसाती हों
क्या पता आज से १० साल बाद ये सुपर डुपर हिट किसी गीत
की पंक्तियाँ बन जाएँ. कुछ भी संभव है. आप लोजिक पर न
ही जाएँ तो अच्छा है. जब जनता आटा पिसवा सकती है तो
बर्फ को क्यूँ नहीं जमाया जा सकता? आज तक कितनों ने
बोला-गेंहू पिसवाने जा रहे हैं ?

छोडिये ये सब, ये सब उलझनें हैं. आज आपको उलझन फिल्म
से एक गीत सुनवाते हैं. एम् जी हशमत का लिखा हुआ
सरल शब्दों वाला एक दमदार गीत है ये. किशोर कुमार की
आवाज़ है और कल्याणजी आनंदजी का संगीत है.




गीत के बोल:

अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊं
अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊं
अपनो ने जो दर्द दिये है कैसे मैं बतलाऊँ.

प्यार के वादे हो गए झूठे
प्यार के वादे हो गए झूठे
वफ़ा के बंधन टूटे
वफ़ा के बंधन टूटे

बन के जीवन साथी कोई
चैन मेरा क्यूँ लूटे
चैन मेरा क्यूँ लूटे
ऐसे जीवन साथी से
ऐसे जीवन साथी से
मैं कैसे साथ निभाऊं
अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊं
अपने जीवन की उलझन को

कैसे कैसे भेद छुपाये
कैसे कैसे भेद छुपाये
हाथों की रेखाएं
हाथों की रेखाएं
कोई न जाने इस जीवन को
ये किस ओर ले जाएँ
ये किस ओर ले जाएँ
पढ़ न पाऊँ लेख विधि का
पढ़ न पाऊँ लेख विधि का
पल पल मैं घबराऊँ

अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊं
अपनो ने जो दर्द दिये है कैसे मैं बतलाऊँ.
अपने जीवन की उलझन को
........................................................................
Apne jeewan ki uljhan ko-Uljhan 1975

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Jan 7, 2015

हम हैं मताए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह-दस्तक १९७०

आपको फिल्म दस्तक का एक गीत-बइयाँ ना धरो ओ बलमा
सुनवाया था पहले। अब सुन लेते हैं फिल्म का दूसरा गीत जो
इस प्रकार से है-हम हैं मताए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह ।
मजरूह की लेखनी की गहराई अगर आपको महसूस करनी
हो तो इसे ध्यान से अवश्य एक बार सुनें। इस गीत में हर
चीज़ संतुलन में है-गायकी, ओर्केस्ट्रा और बोल तो इस गीत की
विशेषता हैं। एक बेबसी गाने वाली की, एक बेबसी है उसके पति
की पेशानी पर, ग्राहक नुमा व्यक्ति घर में बैठ के गीत सुन रहा
है और कोठी अंदाज़ में दाद दे रहा है। ग्राहक को तो आप पहचान
ही गये होंगे, फिल्म पाकीज़ा में भी यही जनाब ग्राहक के रूप में परदे
पर दिखाई देते हैं। फिल्म 'डान' में ये साहब नारंग के किरदार में मौजूद
हैं। इनका नाम है कमल कपूर ।

हिंदी सिनेमा के आवश्यक तत्वों जैसे कमल कपूर तकरीबन १०० से
ऊपर फिल्मों में दिखाई दिए मगर उन्हें लम्बी चरित्र भूमिकाएं नसीब
नहीं हुयीं। अपने छोटे रोल में भी उन्होंने अपनी छाप अवश्य छोड़ी है।
गीत में दो दुखी आत्माएं और दिखेंगी आपको वो हैं-प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता
मनमोहन कृष्ण और अभिनेत्री नर्गिस के भाई अनवर हुसैन । आपसे
कलाकारों का परिचय तो करवा दिया अब गीत के विषय में कुछ और
बातें की जाएँ। मजरूह के साथ मदन मोहन ने ज्यादा फ़िल्में नहीं कीं।
जितनी भी कीं उनके गीत ज्यादा बजते हैं बनिस्बत दूसरे उन गीतकारों
के जिनके साथ मदन मोहन ने काम किया। इसमें राजेंद्र कृष्ण का नाम
भी जोड़ लीजिये जिनके साथ भी कई लोकप्रिय गीत मदन मोहन तैयार
कर पाए। राजा मेहँदी अली खान के साथ मदन मोहन की केमिस्ट्री अच्छी
जमी और लम्बे समय तक कायम रही। एक बारीक फर्क को आपने भी
महसूस किया होगा-फिल्म लैला मजनू(१९७५) जिसके गीतों के बारे
में कहा जाता है कि वे मदन मोहन की सर्वश्रेष्ठ धुनें नहीं हैं, साहिर
के बोलों की वजह से गीत चले। फिल्म के गीत बेहद लोकप्रिय हुए ।
आम जनता के विचारों और पसंद से तादतम्य बिठा पाना कुछ ही
गीतकारों के बस कि बात रही। साहित्यिक अलंकरण और उपमाओं
के मामले में कई गीतकार ऐसे भी हुए जिन्होंने गीतों का मान बढाया
लेकिन लोकप्रियता की निरंतरता बनाये रखना मजरूह, साहिर, शैलेन्द्र
हसरत जयपुरी, इन्दीवर, राजेंद्र कृष्ण और आनंद बक्षी के बस की ही
बात रही।

निबंध कुछ ज्यादा ही लम्बा होता जा रहा है, बाकी की चर्चा फिर कभी।



गीत के बोल:

हम हैं मताए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह
हम हैं मताए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह
उठती है हर निगाह खरीदार की तरह
उठती है हर निगाह खरीदार की तरह

हम हैं मताए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह

वो तो नहीं हैं और मगर दिल के आस पास
दिल के आस पास
गिरती है कोई शय निगाह-ए-यार की तरह
गिरती है कोई शय निगाह-ए-यार की तरह

हम हैं मताए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह

मजरूह लिखा रहे हैं वो अहले-वफ़ा का नाम
मजरूह लिखा रहे हैं वो अहले-वफ़ा का नाम
अहले-वफ़ा का नाम
हम ही खड़े हुए हैं गुनाहगार की तरह
उठती है हर निगाह खरीदार की तरह

हम हैं मताए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह

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Sep 1, 2014

बीती न बिताई रैना-परिचय १९७२

सन १९७२ की फिल्म परिचय से एक युगल गीत सुनते हैं आज.
भूपेंद्र और लता मंगेशकर का गाया ये गीत राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त
गीत है. ये राष्ट्रीय पुरस्कार हालाँकि केवल लता मंगेशकर को मिला.
गुलज़ार ने इस गीत में भी कुछ करिश्माई बोल फिट किये हैं-
बुझाई रैना और मनाई रैना. मुझे इस गीत को सुन कर सुरेश रैना
और मोहित रैना की याद भी आ जाती है आजकल, जबसे सुरेश
भारतीय टीम का हिस्सा बने हैं और मोहित सीरियल महादेव के .

गीत गंभीर प्रकृति का है और कर्णप्रिय भी. इसे दो संजीदा कलाकारों
पर फिल्माया गया है-संजीव कुमार और जया भादुड़ी. जया को इस
फिल्म में अपनी प्रतिभा दिखाने के पर्याप्त अवसर मिले. उन्होंने किसी
भी फ्रेम में निराश नहीं किया होगा दर्शकों को, ऐसा मेरा मानना है.
हर गीत सुरों पर ही आधारित होता है. विशेष क्रम में लगे सुरों को
हम राग पर आधारित गीत कहते हैं. इन्टरनेट पर उपलब्ध विवरणों
के अनुसार ये गीत राग खमाज और यमन का मिश्रण है.

आप कुछ भी कह लें, मगर शाश्वत सत्य यही है कि गुलज़ार के बोलों
पर बेहतर धुनें केवल राहुल देव बर्मन ने ही बनाई और बाद में शायद
थोड़ी बहुत रहमान ने. लेकिन जिस निरंतरता और अनूठेपन से पंचम
ने बनाई वो शायद रहमान के लिए भी संभव नहीं. ये अलग बात है कि
आर डी को उत्तम कोटि के गायकों की सेवाएं प्राप्त थीं, रहमान इस
निर्भरता से परे हैं. रहमान किसी भी गायक को लेकर गाना बना सकते
हैं.






गीत के बोल:

बीती न बिताई रैना बिरहा की जाई रैना
भीगी हुयी अंखियों ने लाख बुझाई रैना

बीती हुई बतियाँ कोई दोहराए
भूले हुए नामों से कोई तो बुलाए
चादं चाँद
हो ओ ओ ओ ओ 

हो ओ,  चाँद की बिंदी वाली, बिंदीवाली रतियां
जागी हुई अखियों में रात ना आयी रैना

बीती न बिताई रैना बिरहा की जाई रैना
बीती न बिताई रैना

युग आते है और युग जाए
छोटी छोटी यादों के पल नहीं जाए
झूठ से काली लागे लागे काली रतिया
रूठी हुई अखियों ने लाख मनाई रैना


बीती न बिताई रैना बिरहा की जाई रैना
बीती न बिताई रैना
.........................................
Beeti na bitayi raina-Parichay 1972

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May 1, 2014

फिर कहीं कोई फूल खिला-अनुभव १९७२

मन्ना डे की गायकी बेजोड बेमिसाल है. जो कुछ बाकी
गायकों की गायकी के बाद सुनने की इच्छा होती है वो
हैं मन्ना डे के गाने. आवाज़ की परिपक्वता अपनी जगह
है और गायकी की गुणवत्ता अपनी जगह. गुणवत्ता के
मामले में उनके निकट कुछ ही गायक आ पाते थे.

आज सुनते हैं उनकी मख्खन सी मुलायम गायकी का
अंदाज़ फिल्म अनुभव से. कपिल कुमार के बोल और
कनु घोष का संगीत है. फिल्म के परदे के कलाकारों को
आप आसानी से पहचान जायेंगे.




गीत के बोल:

फिर कहीं कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कहीं कोई दीप जला, मंजिल ना कहो उसको
फिर कहीं कोई फूल खिला

मन का समुन्दर प्यासा हुआ क्यूँ किसी से मांगें दुआ
मन का समुन्दर प्यासा हुआ क्यूँ किसी से मांगें दुआ
लहरों का लगा जो मेला तूफ़ान न कहो उसको

फिर कहीं कोई फूल खिला

देखे सब वो सपने खुद ही सजाये जो हमने
दिल उनसे बहाल जाए तो राहत न कहो उसको

फिर कहीं कोई फूल खिला
.........................................................
Phir kahin koi phool-Anubhav 1972

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Aug 4, 2011

आप अगर आप न होते-गृह प्रवेश १९७९

नायिका नंबर दो का घर में प्रवेश हो चुका है। ये है फिल्म गृह प्रवेश
से दूसरा गीत। गीत में संजीव कुमार और सारिका अपने अपने भावों
का अनुसार प्रदर्शन कर रहे हैं। कुछ रोमांस कुछ रोमांच वाला ये गीत
कर्णप्रिय है। गुलज़ार के बोल, सुलक्षणा पंडित की आवाज़ और कनु रॉय
का संगीत है। आनंद लीजिए।

उल्लेखनीय है कि कनु रॉय ने एक और लीक से हट के बनी फिल्म
आविष्कार में भी संगीत दिया है।




गीत के बोल:

आप अगर आप न होते तो भला क्या होते
लोग कहते हैं कि पत्थर के मसीहा होते

संगेमरमर के तराशे हुए चेहरे पे अगर
आ आ आ आ आ आ आ
संगेमरमर के तराशे हुए चेहरे पे अगर
आपके हँसने का अंदाज़ यही होता मगर
वो जो शरमा के झुका लेते हैं आप नज़र
ऐसे शरमाने पे हम कैसे न फ़िदा होते

आप अगर आप न होते तो भला क्या होते
लोग कहते हैं कि पत्थर के मसीहा होते

आपके माथे पे बसती है जवां शाम सहर
आपके माथे पे बसती है जवां शाम सहर
अच्छी लगती है हमें आपकी पेशानी मगर
वो जो माथे पे पसीना उभर आती है मगर
ऐसे माथे पे भला क्यों न लोग फ़िदा होते

आप अगर आप न होते तो भला क्या होते
लोग कहते हैं कि पत्थर के मसीहा होते
.......................................
Aap agar aaap na hote-Griha Pravesh 1979

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Aug 3, 2011

ज़िंदगी फूलों की नहीं-गृह प्रवेश 1979

आइये कुछ अलग हट के बनी फिल्मों से गीत सुने जाएँ । सबसे पहले
सुनते हैं कुछ ज्यादा ही हट के बनी फिल्म गृह प्रवेश से एक गीत।

बुद्धिजीवी दो प्रकार के होते हैं-नैसर्गिक और निर्मित। पहले वाले पैदाइशी
होते हैं और दुसरे वालों को जनता दर्ज़ा प्रदान करती है। हमारे देश के कुछ
बुद्धिजीवियों की खूबी है कि वे न समझ आने वाली चीज़ों पर भी वाह वाह
कर उठते हैं। आम जनता जब समझ में कुछ नहीं आता हो तो वो उन
बुद्धिजीवियों की राय और सहमति पर निर्भर हो जाती है ।

फिल्म के कथानक को थकानक कहा जाए तो भी फर्क नहीं पड़ेगा। इसको
समझने के लिए दिमाग खपाने की ज़रूरत पढ़ती है। संजीव कुमार और
शर्मीला टैगोर ने अपने अपने हिस्से का बढ़िया अभिनय किया है। १९७९
में बनी इस फिल्म को समय से आगे की बताते हैं कुछ लोग।

प्रस्तुत गीत फिल्म के टाइटल के साथ सुनाई पढता है इसलिए इसमें गीत
का आनंद लेने के अलावा कोई कन्फ्यूज़न नहीं है। गीत गुलज़ार का लिखा
हुआ है जिसे गा रहे हैं भूपेंद्र। संगीत तैयार किया है कनु रॉय ने।



गीत के बोल:


ज़िंदगी फूलों की नहीं
फूलों की तरह महकी रहे
ज़िंदगी फूलों की नहीं
फूलों की तरह महकी रहे

ज़िंदगी

जब कोई कहीं गुल खिलता है
आवाज़ नहीं आती लेकिन
आवाज़ नहीं आती लेकिन
खुशबू की खबर आ जाती है
खुशबू महकी रहे

ज़िंदगी

जब राह कहीं कोई मुड़ती है
मंजिल का पता तो होता नहीं
मंजिल का पता तो होता नहीं
इक राह पे राह मिल जाती है
राहें मुड़ती रहें

ज़िंदगी
.....................................
Zindagi phoolon ki nahin-Griha Pravesh 1979

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Jun 25, 2011

सजना के सामने मैं तो रहूंगी-पारस १९७१

यकायक, अचानक, तुरंत फुरंत जब कोई गीत याद आता है
है तो उसे सुनवाने कि इच्छा हो ही जाती है। अभिनेत्री राखी
को आपने अधिकांश चलचित्रों में भारतीय नारी की पोषाक
और वेश भूषा में ही देखा होगा। आज आपको एक ऐसा गीत
सुनवाते हैं जिसमें वे विलायती बाला जैसी नज़र आती हैं।
इन्दीवर के लिखे गीत को गा रही हैं आशा भोंसले और गीत
की तर्ज़ बनाई है कल्याणजी आनंदजी ने।



गीत के बोल :

सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप, चुप
आ हा, सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
अंखियों में छ गया नशा भीगा भीगा
अंखियों में छ गया नशा भीगा भीगा
जान गई सखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
जान गई !

ओ रातों को, रातों को ?
आ हा रातों को
रातों को उड़ उड़ के कहती है निंदिया
ऐ री लागेगी कब मेरे माथे पे बिंदिया
मन की अभी तक मन में छुपी है
फ़ैल गई, फ़ैल गई बतियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा

सजना के
सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप, चुप

हो ओ ऐसी लगी
कैसी लगी ?
हा हा ऐसी लगी
ऐसी लगी आग मेरे सीने में प्रीत की
हाय याद आये घडी घडी अनदेखे मीत की
दिन तो गुज़रूंगी कर कर के बतियाँ
गुजरी ना
गुजरी ना रतियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
क्या होगा ?

सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप, चुप

हा चोरी चोरी
चोरी चोरी ?
आ हा चोरी चोरी
चोरी चोरी सपने में आता है कोई
फिर उसके ख्यालों में रहूँ खोयी खोयी
बान के दीवानी लिख दी जो मैंने
पकड़ी गई
पकड़ी गई पतियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा

सजना के
सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप, चुप
आ हा सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
...............................
Sajna ke samne main to rahoongi-Paaras 1971

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Nov 14, 2010

दुल्हन से तुम्हारा मिलन होगा-अनोखी रात १९६८

अभिलाषाएं बाल-सुलभ, युवा, प्रौढ़ एवं वृद्ध हो सकती
हैं। कुंवारों के मन में लड्डू कैसे फूटा करते हैं उसकी एक
बानगी देखिये फिल्म अनोखी रात के गीत में गीत जिसमे
कुंवारी-अभिलाषा मन के बाहर उछल पड़ी है और उबड़ खाबड़
रास्तों पर साईकिल पर सवार हो के बल खा रही है। । गीत
इन्दीवर का लिखा हुआ है जिनके लिखे और मुकेश के गाये
कई गीत फिल्म संगीत के खजाने में मौजूद हैं।

कुछ युवक युवतियों का ये हाल हो जाता है शादी का ख्याल
उनको खाते पीते, सोते, रोते और धोते समय भी दिमाग में
घूमता रहता है और ये अपने चरम पर पहुँचता है शादी वाले
दिन। वो उत्साह शादी के बाद धीरे धीरे ठंडा हो जाता है।

गीत फिल्माया गया है हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के एक प्रतिभा
संपन्न और समर्थ कलाकार संजीव कुमार पर। उन्होंने ऐसे
हाव भावों को समझाने का भरसक प्रयत्न किया है और उस
अजीब उतावलेपन को बखूबी चित्रित किया है। यही गीत किसी
और चम्पू कलाकार पर फिल्माया गया होता तो शायद
ऐसा लगता जैसे जमाल गोटा खाने के बाद वो फारिग होने की
गुज़ारिश कर रहा हो। जमाल गोटिये हीरो बहुत हैं इस फिल्म
इंडस्ट्री में जो फिल्म में ऐसे लगते हैं जैसे किसी सूटकेस में
जबरन ठूंसे हुए कपडे हों जो सूटकेस खोलते ही बाहर टपक
जाया करते हैं।

अनोखी रात संगीतकार रोशन की आखरी हिंदी फिल्म थी।
उनके असामयिक निधन के पश्चात् उनकी धर्मपत्नी ने
फिल्म का संगीत संगीत पूरा करवाया।




गीत के बोल:


दुल्हन से तुम्हारा मिलन होगा
ओ मन थोड़ी धीर धरो

बाहों में चांदी का बदन होगा
ओ मन थोड़ी धीर धरो

दुल्हन से तुम्हारा मिलन होगा
ओ मन थोड़ी धीर धरो

चाँद परी है चंचल है
वो तेरी है चितचोर

चाँद परी है चंचल है
वो तेरी है चितचोर

मुखड़े को ही तकते तकते
हो जाएगी भोर

ओ गोरी धन का तुम्हे दर्शन होगा
ओ मन थोड़ी धीर धरो

बाहों में चांदी का बदन होगा
ओ मन थोड़ी धीर धरो

ऐसी बेताबी है कैसी
पड़ी है सारी रात
ऐसी बेताबी है कैसी
पड़ी है सारी रात

जी भर भर के कर लेना तुम
कमसिनिया से बात

काँधे से झुका सा मन होगा
ओ मन थोड़ी धीर धरो

बाहों में चांदी का बदन होगा
ओ मन थोड़ी धीर धरो

वो है तेरी पद्मिनिया
और तू बांका रजपूत
वो है तेरी पद्मिनिया
और तू बांका रजपूत

गज भर की छाती रखता है
दिल भी रख मजबूत

नैनों नैनों में रंग होगा
ओ मन थोड़ी धीर धरो

बाहों में चांदी का बदन होगा
ओ मन थोड़ी धीर धरो

दुल्हन से तुम्हारा मिलन होगा
ओ मन थोड़ी धीर धरो
...........................................................
Dulhan se tumhara milan hoga-Anokhi raat 1968

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Feb 22, 2010

दिल से दिल मिलने का-चरित्रहीन १९७४

७० के दशक, संजीव कुमार, शर्मिला टेगोर और नए स्वेटर की डिजाईन ,
पहाड़ियां और वादियाँ। ऐसे दृश्य कई फिल्मों में आपको मिलेंगे । धुन
भी पहाड़ी हो तो सुनने का मज़ा दुगना हो जाता है। फिल्म का निर्माता
थोडा अमीर था अतः संजीव कुमार कोट पहने नज़र आ रहे हैं।

लता मंगेशकर और किशोर कुमार का गाया फिल्म चरित्रहीन का ये गीत
सन १९७४ से ही, जब फिल्म आई थी और ये रडुआ पर बजना शुरू हुआ था,
मुझे पसंद है। इस गीत से मुझे देव आनंद की फिल्म वारंट का एक गीत भी
याद आ जाता है। गीत आनंद बक्षी का है और धुन राहुल देव बर्मन की।



गीत के बोल:

हो हो हो, हो हो हो, हो हो हो

दिल से दिल मिलने का, हाँ, कोई कारण होगा
बीना कारण कोई बात नहीं होती
दिल से दिल मिलने का ,कोई कारण होगा
बिना कारण कोई बात नहीं होती

दिल से दिल मिलने का कोई कारण होगा

वैसे तो हम दोनों एक दूजे से हैं अभी अनजाने
वैसे तो हम दोनों एक दूजे से हैं अभी अनजाने
कोई अगर देखे तो कहे बरसों के हैं मीत पुराने

हो हो, हो हो

कुछ है तुम में हम में
वरना इस मौसम में
फूलों की ऐसी बारात नहीं होती

दिल से दिल मिलने का कोई कारण होगा

हो ना हो हम तुम में प्यार है शक इसमें नहीं है कोई
हो ना हो हम तुम में प्यार है शक इसमें नहीं है कोई
अरे दो ही मुलाकातों में निगोड़े नैनो ने निंदिया खोई

हो हो, हो हो

ऐसे दिन बीतेंगे, कैसे दिन बीतेंगे
अब तो बसर एक रात नहीं होती

दिल से दिल मिलने का कोई कारण होगा

हो हो हो, हो हो हो, हो हो हो, हो हो हो

जाने कहाँ से आये हो तुम हम आये कहाँ से जाने
अजी तुमको खबर ना हमको पटा दिल कैसे मिले दीवाने
जाने कहाँ से आये हो तुम हम आये कहाँ से जाने

हो हो, हो हो
शायद हम दोनों का
हाँ एक ही रास्ता होगा
वरना हमारी मुलाक़ात नहीं होती

दिल से दिल मिलने का कोई कारन होगा
बीना कारन कोई बात नहीं होती

दिल से दिल मिलने का कोई कारन होगा

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Feb 20, 2010

कोई गाता मैं सो जाता-आलाप १९७७

सन ७७ में अमिताभ बच्चन दो गीतों में दाढ़ी लगाये हुए दिखाई दिए।
१) माय नेम इज अन्थोनी-अमर अकबर अन्थोनी, और
२) कोई गाता मैं सो जाता-आलाप। इनमे से पहला गीत
सुपर डुपर हिट हुआ। दूसरा गीत आम जनता को हजम नहीं हुआ।
फिल्म आलाप एक लीक से हटकर बनी हुई फिल्म थी। ये गीत
सुनने लायक गीत है और येसुदास के गाये उत्तम गुणवत्ता वाले
हिंदी गीतों में आता है। संगीतकार जयदेव ने अच्छा संगीत
तैयार किया फिल्म के लिए मगर सन ७७ के रोमांटिक/मार धाड़
के मिश्रण वाली फिल्मों के दौर में फिल्म आलाप कहीं गुम सी हो
गयी। गीत लिखा है हरिवंश राय बच्चन ने। फिल्म संजीदा
किस्म की है जिसका निर्देशन ऋषिकेश मुखर्जी ने किया है।



गाने के बोल:

कोई गाता मैं सो जाता

कोई गाता मैं सो जाता
कोई गाता मैं सो जाता
कोई गाता

संस्कृति के विस्तृत सागर में
संस्कृति के
संस्कृति के विस्तृत सागर में
सपनों की नौका के अंदर
दुख सुख की लहरों में उठ गिर
बहता जाता, मैं सो जाता

कोई गाता मैं सो जाता
कोई गाता

आँखो में भर कर प्यार अमर
आँखो में
आँखो में भर कर प्यार अमर
आशीष हथेली में भर कर
कोइ मेरा सर गोदी में रख
सहलाता, मैं सो जाता

कोई गाता मैं सो जाता
कोई गाता

मेरे जीवन का कारा जल
मेरे जीवन का हालाहल
मेरे
मेरे जीवन का कारा जल
मेरे जीवन का हालाहल
कोइ अपने स्वर में मधुमय कर
बरसाता, मैं सो जाता

कोइ गाता मैं सो जाता
कोई गाता मैं सो जाता
मैं सो जाता
मैं सो जाता

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Jan 8, 2010

आया हूँ मैं तुझको ले जाऊँगा-मनोरंजन १९७४

फिल्म मनोरंजन के बारे में हम पहले जिक्र कर चुके हैं कि वो
एक फ्रेंच फिल्म की फ्रेम दर फ्रेम कॉपी थी। इसमें एक श्रवणीय
गीत है किशोर और आशा का गाया हुआ। चूँकि फिल्म फ्लॉप हो गयी
इसलिए इसके गीत भी थोड़े बहुत बज के गायब से हो गए और केवल
आर डी बर्मन भक्तों द्वारा सुने जाते रहे। समय समय पर इसके गीत
अपनी उपस्थिथि का आभास दिलाते रहे रेडियो पर। ये गीत थोडा ज्यादा
बजा गीत कहा जा सकता है क्यूंकि इसमें आवाज़ की कलाकारी थोड़े
अलग किस्म की है। ये गीत एक विलायती गीत-'आफ्टर सनरायिज़ '
से प्रेरित है। गीत अच्छा बना है ।



गीत के बोल:

अली ई, ई, व वुई
आया हूँ मैं तुझ को ले जाऊँगा
अपने साथ तेरा हाथ थाम के
आया हूँ मैं तुझ को ले जाऊँगा
अपने साथ तेरा हाथ थाम के
नहीं रे नहीं मैं नहीं जाउंगी
तेरे साथ तेरा हाथ थाम के
नहीं रे नहीं मैं नहीं जाउंगी
तेरे साथ तेरा हाथ थाम के
थाम के
ला ला ला
याई याई याई याई याई याई ला ला ला
ला ला ला, ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला
ऊ ला ला ला ला ला ला

आई आई आई आई आई आई
ऐसे ना रूठ बातों बातों में
वादे ना तोड़ ऐसी रातों में
ऐसे ना रूठ बातों बातों में
वादे ना तोड़ ऐसी रातों में
देखा है चाँद मुलाकातों में
धोखा है यार तेरी बातों में
देखा है चाँद मुलाकातों में
धोखा है यार तेरी बातों में

हमें इस तरह ना ठुकरा ज़ालिम
आशिक हैं, हम तेरे नाम के
हमें इस तरह ना ठुकरा ज़ालिम
आशिक हैं, हम तेरे नाम के
वुई वुई , नहीं रे नहीं मैं नहीं जाउंगी
तेरे साथ तेरा हाथ थाम के

आया हूँ मैं तुझ को ले जाउंगा
अपने साथ तेरा हाथ थाम के
थाम के थाम के

याई याई याई याई याई याई
ला ला ला, ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला
ऊ ला ला ला ला ला ला
ये माना तू मेरा दीवाना है
तू हर एक शम्मा का परवाना है
ये माना तू मेरा दीवाना है
तू हर एक शम्मा का परवाना है

आई आई आई आई आई आई
वो अपना और ये बेगाना है
मेरी जां खूब पहचाना है
वो अपना और ये बेगाना है
मेरी जां खूब पहचाना है

जा रे जा रे तेरे जैसे बेईमान
बेवफा मेरे किस काम के
जा रे जा रे तेरे जैसे
बेईमान बेवफा मेरे किस काम के
हे आया हूँ मैं तुझ को ले जाऊँगा
अपने साथ तेरा हाथ थाम के
वुई वुई , नहीं रे नहीं मैं नहीं जाउंगी
तेरे साथ तेरा हाथ थाम के
थाम के थाम के

याई याई याई याई याई याई ला ला ला
ला ला ला, ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला
ला ला ला, ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला

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Jan 5, 2010

गोया के चुनांचे-मनोरंजन १९७४

कहा जाता है फिल्म "मनोरंजन" समय से आगे की फिल्म थी। शम्मी कपूर
की बतौर निर्देशक पहली फिल्म थी ये। अबरार अल्वी ने इसकी पटकथा लिखी
थी , यूँ कहें फ्रेंच फिल्म का देसीकरण किया था । मनोरंजन फिल्म समय से
आगे भले ही हो, मगर, पूरी तरह से प्रेरित थी समय से पहले की फिल्म
Irma la Douce (1963) से । दोनों की कहानी में क्या समानता थी इसकी
एक झलक यहाँ प्रस्तुत है। दोनों फिल्मों में एक बार दिखाया गया है जिसकी
डिजाईन मिलती जुलती है। फ्रेंच फिल्म में भी एक डांस है जो बार में होता
दिखाया गया है । मजेदार बात ये है कि उस फिल्म का बार-टेंडर भी शम्मी
कपूर की तरह तंदुरुस्त है।

हम आज एक गीत देखेंगे-गोया के चुनांचे। आनंद बक्षी के लिखा गीत गा रहे हैं
लता, किशोर और मन्ना डे। जीनत अमन, संजीव कुमार और शम्मी कपूर परदे
पर इन आवाजों पर होंठ हिला रहे हैं। गाने के अंत समय का संगीत अगर आपको
फ्रेंच फिल्म के डांस वाले संगीत से मिलता जुलता सुनाई पड़े तो समझिये कि
इमानदारी से इस फिल्म का देसीकरण किया गया है। संगीत राहुल देव बर्मन का
है, फिल्म मनोरंजन में। है ना भरपूर मनोरंजन, आइये गीत सुना जाए। एक तकिया
कलाम को लेकर गीत कैसे बनाया जाए, सीखिए ।




गीत के बोल:

गोया के चुनांचे
गोया के चुनांचे

हो, नाचे गायें झूम के
आ, गोया के चुनांचे
नाचे गायें झूम के
आ, गोया के चुनांचे
हो, हो

गोया के चुनांचे
गोया के चुनांचे

कितना प्यारा गीत है
ये गोया के चुनांचे
कितना प्यारा गीत है
ये गोया के चुनांचे
हो, ओ

गोया के चुनांचे
गोया के चुनांचे

किया मैंने प्यार यूँ तो कई बार
दिल का सौदा तुझसे पहली बार
किया मैंने प्यार यूँ तो कई बार
दिल का सौदा तुझसे पहली बार
अँधेरा खो गया, सवेरा हो गया
मैं तेरी हो गयी, तू मेरा हो गया
बन गयी मेरी ज़िन्दगी
बस गोया के चुनांचे हो ओ

गोया के चुनांचे
गोया के चुनांचे

लब पे तेरा नाम दिल में तेरी याद
आँखों में तेरी तस्वीर बसी
लब पे तेरा नाम दिल में तेरी याद
आँखों में तेरी तस्वीर बसी
ये दिल क्यूँ हो गया
दीवाना क्या कहूं
दीवाने दिल का मैं फ़साना क्या कहूं
मुझको अपना होश नहीं
बस गोया के चुनांचे, हो ओ

गोया के चुनांचे
गोया के चुनांचे

आशिक उसका नाम हाथ जो ले थाम
दुनिया छोड़े यार यारी ना तोड़े
आशिक उसका नाम हाथ जो ले थाम
दुनिया छोड़े यार यारी ना तोड़े
ख़ुशी के दिन हो या, ग़मों की शाम हो
उसी की याद हो उसी का नाम हो
सौ बातों की एक बात
ये गोया के चुनांचे

नाचे गायें झूम के
आ, गोया के चुनांचे, हो ओ

गोया के चुनांचे
गोया के चुनांचे

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Jan 4, 2010

लोगों न मारो इसे-अनामिका १९७२

जाया भादुड़ी और संजीव कुमार पर फिल्माया गया और आशा भोंसले
द्वारा गाया गया एक नटखट गीत। फिल्म अनामिका के लिए इस गीत की
रचना की थी मजरूह सुल्तानपुरी ने और धुन बनायीं राहुल देव बर्मन ने।
फिल्म के दूसरे दो गीत बहुत बजे थे। इस गीत से परिचय उन्ही लोगों का
हुआ जिन्होंने फिल्म देखी है। बर्फ के गोले बना के फेंकने का सुख आपको
तभी मिल सकता है जब आप बर्फीली पहाड़ियों पर घूमने जाएँ। पिटाई
करवाने के बाद हमदर्दी दिखाती नायिका, ऐसे वाकये हिंदी फिल्मों में कई
मिलेंगे आपको, पढ़ते रहिये ये ब्लॉग। सीधी साधी कहानी में मनोरंजक
पेंच और घुमाव ऐसे ही दिए जाते हैं और बन जाती है स्क्रिप्ट। गीत का
मुखड़ा किधर और अंतरा किधर, ढूंढते रहिये .......




गाने के बोल:

लोगों न मारो इसे
यही तो मेरा दिलदार है

लोगों न मारो इसे
यही तो मेरा दिलदार है
दिल से जो दिल टकराये
नहीं दुशमनी ये प्यार है
हम ज़रा जो उलझ गये
क्यूँ लडाई समझ गये?
प्यारी प्यारी ये थी हमारी
मोहब्बत की दिल्लगी ज़रा

काहे को रूठा दीवाना मेरा
तू ही तो सपना सुहाना मेरा
ये लो सैयां मैं ही हारी
उलटा पड़ा निशाना मेरा

काहे को रूठा दीवाना मेरा
तू ही तो सपना सुहाना मेरा
ये लो सैयां, मैं ही हारी
उलटा पड़ा निशाना मेरा

काहे को रूठा दिवाना मेरा

यूँ तो शुरू से हूँ मैं
तुम ही पर ये दिल हारे हुए
लेकिन ख़फ़ा होके तुम
तो आज और भी प्यारे हुए
प्यार था तो सताया तुम्हें
रंग अदा का दिखाया तुम्हें
कैसा नादान भोला भाला
अभी तक है मस्ताना मेरा
काहे को रूठा दिवाना मेरा

तेरे मिलन से यूँ ही
महकता रहे मेरा जहाँ
सदा लगी रहूँ गले
कभी न ढले अब ये समा
तेरी चाहत जवानी मेरी
तेरा ग़म ज़िंदगानी मेरी
तुझ को चाहूँ तुझी को पूजूँ
यही बस हो अफ़साना मेरा

काहे को रूठा दीवाना मेरा
तू ही तो सपना सुहाना मेरा
ये लो सैयां मैं ही हारी
उलटा पड़ा निशाना मेरा

काहे को रूठा दीवाना मेरा, आ
तू ही तो सपना सुहाना मेरा, आ
ये लो सैयां मैं ही हारी
उलटा पड़ा निशाना मेरा

काहे को रूठा दीवाना मेरा
तू ही तो सपना सुहाना मेरा

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Nov 30, 2009

नारी कुछ अइसन आगे-स्वयंवर १९८०

बी नागी रेड्डी नाम के शख्स ने १९४७ में एक बच्चों की एक पत्रिका
चंदामामा का प्रकाशन शुरू किया जिसके वे संस्थापक संपादक भी थे।
१९४७ से अनवरत चला सिलिसला बस १९९८ में कुछ समय के लिए
टूटा। उसके पश्चात फ़िर से इसका प्रकाशन शुरू हुआ और निर्बाध चला
आ रहा है । पत्रिका १३ भाषाओँ में छपती है। विक्रम बेताल की कहानियाँ
आम पाठक तक पहुँचाने का श्रेय चंदामामा को जाता है। पत्रिका को
चक्रपाणी नाम के उनके मित्र की दूर दृष्टि , अथक प्रयास और लगन
के फलस्वरूप आज ये स्थान प्राप्त हुआ है ।

बी नागी रेडी ने कई पारिवारिक फ़िल्में बनायीं जिनमे उन्होंने मानवीय
संबंधों की पेचीदगियों पर रौशनी डाली और उलझनों के हल भी फिल्मों
के माध्यम से सुझाये। दोहरे चरित्र पर आधारित फ़िल्म राम और श्याम
के निर्माता रेड्डी ने यादगार फ़िल्में हिन्दी फिल्मों के दर्शकों को दिखायीं
जैसे यही है ज़िन्दगी(१९७७),जूली (१९७५), स्वर्ग नरक(१९७८),
स्वयंवर(१९८०), श्रीमान श्रीमती(१९८२)।

स्वयंवर फ़िल्म के गीत मधुर हैं और मैं इन गीतों का एक नियमित श्रोता
हूँ। आपको एक गीत सुनवाता हूँ जो किशोर कुमार गा रहे हैं संजीव कुमार
के लिए । नारी आज समाज में जिस गति से अपना रुतबा बढाती जा रही
है उसका प्रभाव पुरूष वर्ग पर क्या पढ़ रहा है वो गीत के माध्यम से
बतलाया गया है। गीत आज इस नई सदी में भी उतना ही प्रासंगिक है
जितना ये ८० के दशक में था। गुलज़ार  साहब ने कलम चलायी है और
राजेश रोशन ने बाजे बजाये हैं ।


गीत के बोल:


नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है

नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है

वो दिन गए किधर के, चूल्हे माँ सर खपाया
वो दिन गए किधर के, चूल्हे माँ सर खपाया
इक पैर अब ज़मीन पर, इक चाँद पर जमाया
बदली है जब से औरत, दुनिया बदल रही है
बदली है जब से औरत, दुनिया बदल रही है

मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है
नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है

मरदन को दई के पेंशन, लडती है अब इलेक्शन
मरदन को दई के पेंशन, लडती है अब इलेक्शन
कहते थे जिसको सिस्टर, अब हुयी गई मिनिस्टर
मरदन की मोमबत्ती, टप टप पिघल रही है
मरदन की मोमबत्ती, टप टप पिघल रही है

मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है
नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है

चाभी का छल्ला खोला, आँचल से नारियों ने
चाभी का छल्ला खोला, आँचल से नारियों ने
बन्दूक भी उठा ली अब फौजी नारियों ने
हर देस औरतन की पलटन निकल रही है
हर देस औरतन की पलटन निकल रही है

मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है

नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है
मरदन के पाँव तले धरती फिसल रही है

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Nov 27, 2009

खुश रहे तू सदा -खिलौना १९७०

ज़िन्दगी झटकों से भरी होती है। कोई धीमा झटका ज़ोर से लगता है
तो कभी कभी ज़ोर का झटका धीरे से लग जाता है। असर दोनों स्तिथियों
में होता है। कुछ दिन पहले मुझे भी एक झटका लगा। लगा क्या, कहिये
लगाया गया। कभी कभी ऐसा महसूस होता है जैसे किसीने कुल्फी खिलाने
के बहाने आपको कुँए में धक्का दे दिया हो। ऐसे अवसर पर कैसा गीत दिमाग
में आता है उसका नमूना पेश है- फ़िल्म खिलौना से। ये एक घिसा हुआ गीत है।
मदिरा प्रेमियों ने इसको आम जनता से ज्यादा सुना है।



गीत के बोल:

तेरी शादी पे दूँ तुझको तोहफा मैं क्या
पेश करता हूँ दिल एक टूटा हुआ

खुश रहे तू सदा ये दुआ है मेरी
खुश रहे तू सदा ये दुआ है मेरी

बेवफा ही सही,
बेवफा ही सही,दिलरुबा है मेरी

खुश रहे

जा मैं तन्हा रहूँ तुझको महफ़िल मिले
ho, जा मैं तन्हा रहूँ तुझको महफ़िल मिले
डूबने दे मुझे, तुझको साहिल मिले
आज मर्ज़ी यही
आज मर्ज़ी यही, नाखुदा है मेरी

खुश रहे तू सदा ये दुआ है मेरी
खुश रहे

उम्र भर ये मेरे दिल को तड़पायेगा
हो, उम्र भर ये मेरे दिल को तड़पायेगा

दर्द ऐ दिल अब मेरे साथ ही जाएगा
मौत ही आखरी,
मौत ही आखरी बस दावा है मेरी
मौत ही आखरी बस दावा है मेरी

खुश रहे तू सदा ये दुआ है मेरी
खुश रहे
खुश रहे

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Nov 25, 2009

कोई लड़की मुझे कल रात-सीता और गीता १९७२

एक फ़िल्म आई थी ७० के दशक के शुरूआती दौर में
सीता और गीता। राम और श्याम के बाद डबल रोल
वाली फिल्मों में यही सबसे ज्यादा चली थी। कितनी चली थी
याद नहीं मगर इस फ़िल्म का एक गीत जो उन दिनों में कभी
कभार बज जाता था याद रहा-"ज़िन्दगी है फेल कोई पास कोई फेल"
ये मन्ना डे का गाया गीत है। अब बात की जाए उस गीत की जो
यहाँ प्रस्तुत है-ये है किशोर कुमार और लता मंगेशकर का
गाया युगल गीत जो संजीव कुमार और हेमा मालिनी पर फिल्माया गया है।
इस गाने के दृश्य लुभावने हैं और बम्बई(आज की मुंबई) की चौपाटी
का नज़ारा आप इस गाने में में कर सकते हैं। ये फ़िल्म दूरदर्शन
द्वारा २ बार दिखाई जा चुकी है और दूसरे चैनल की तो गिनती ही
नहीं कितनी बार और कब कब दिखाई गई। हेमा मालिनी ने ऊँट की
सवारी इसके बाद शायद फ़िल्म रज़िया सुल्तान में ही की है। ये बात
समझ नहीं आई की ऊँट राजस्थान से बम्बई घूमने आया था या
उसको फ़िल्म के निर्देशक ने विशेष तौर पर इस गाने के लिए खोजा था।
और वो ऊँट चौपाटी की भेल खा के घोड़े से भी तेज़ भाग रहा है।
उसके अलावा घोड़े पे बैठ के बांसुरी बजाना कोई हँसी खेल नहीं है। ;)



गाने के बोल:

कोई लड़की मुझे कल रात सपने में मिली
बड़ी प्यारी सी सूरत थी भला सा नाम था

ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला

कोई लड़का मुझे कल रात सपने में मिला
बड़ी प्यारी सी सूरत थी भला सा नाम था

ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला

देख लेती मैं जो उस बैरन सौतन को
जान ले लेती मैं कसम से

देख लेता मैं जो उस तेरे साजन को
जान दे देता मैं शर्म से

हो, फ़िर क्यूँ रूठे
तुम जो रूठी , ला ला ला

अरे तुम ही मुझे कल रात सपने में मिली
अरे तुम ही मुझे कल रात सपने में मिले

मुझे तुमसे, तुम्हे मुझसे जरूरी काम था
ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला
तुम्हे मुझसे,मुझे तुमसे, जरूरी काम था

चांदनी थी रातें , खूब हुई मुलाकातें
प्यार भरी बातें हुई दोनों में

रात भर हम जागें, नैन पिया संग लागे
रंग भरे हुए वादे दोनों में

तुम झूठी हो, तुम झूठे हो, ला ला ला

कोई लड़का, कोई लड़की,
मुझे कल रात सपने में मिला/मिली

ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला

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Nov 9, 2009

अंखियों में छोटे छोटे सपने २ -नौकर १९७९

फ़िल्म संगीत के खजाने में लोरियां भी हैं।
ये फ़िल्म नौकर की लोरी है जिसे किशोर कुमार गा
रहे हैं। परदे पर कलाकार हैं संजीव कुमार। मैं
संजीव कुमार कीअभिनय से बहुत प्रभावित रहा।
देखिये लोरी और आनंद उठायें एक आकर्षक धुन का।
बोल लिखे हैं मजरूह ने और संगीत है आर डी बर्मन का।



गीत के बोल:

अंखियों में छोटे छोटे सपने सजाये के
बहोयों में निंदिया के पंख लगाये के
चन्दा में झूले मेरी बिटिया रानी

चांदनी रे झूम
हो, चांदनी रे झूम

ये ही तो कली है प्यारी मेरी सारी बगिया में
हो, ये ही तो कली है प्यारी मेरी सारी बगिया में
मैंने यही मोती पाया जीवन नदिया में

ममता लुटाऊँ ऐसी मच जाए धूम
चांदनी रे झूम
हो, चांदनी रे झूम


अंखियों में छोटे छोटे सपने सजाये के
बहोयों में निंदिया के पंख लगाये के
चन्दा में झूले मेरी बिटिया रानी

चांदनी रे झूम
हो, चांदनी रे झूम

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