न जइयो सौतन के घर-कागज की नाव १९७६
होते हैं. भले ही सुनने में विलायती सा लगे, मगर वो गीत
किसी शास्त्रीय राग पर आधारित हो सकता है. स्वर विशेष
का समूह या उसे गाने का विशेष अंदाज़ राग कहलाता है.
आज आपको राग अभोगी पर आधारित एक गीत सुनवाते
हैं जो फिल्म कागज़ की नाव से है. इस राग की विशेषता
है-इसमें आरोह और अवरोह में “प” और “न” स्वर वर्जित हैं.
इसमें “म” कोमल प्रयुक्त होता है बाकी के स्वर शुद्ध हैं. गंभीर
राग है और इसका विस्तार तीन सप्तक तक किया जा सकता
है. काफी थाट का ये राग औढव्-औढव् वक्र जाति का राग है.
पकड़ ऐसी है- सा रे ध सा, रे ग म, ग म रे सा. राग के गायन का
समय रात्रि का दूसरा प्रहर है. राग का प्रयोग विरह वेदना
गीतों में या भक्ति संगीत में ज्यादा होता है. प्रस्तुत गीत
थोडा अलग सा है. संगीतकार ने इस सिचुएशन के लिए
ये राग क्यूँ चुनी ये वही बेहतर बतला सकते हैं.
फिल्म कागज की नाव से एक गीत बेहद लोकप्रिय है-हर
जनम में हमारा मिलन-मनहर आशा. इसके अलावा आम श्रोता
को इसका विवरण भी उपलब्ध नहीं है. इस गीत को लिखा
है नक्श लायलपुरी ने और इसकी धुन बनाई है संगीतकार
जोड़ी-सपन जगमोहन ने. गीत गाया है आशा भोंसले ने. गीत
फिल्माया गया है अरुणा ईरानी और प्रदीप कुमार पर.
गीत के बोल:
न जइयो रे सौतन घर सैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
रुक जा मैं रो रो पडूं तोरे पैयां
रुक जा मैं रो रो पडूं तोरे पैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
जादू भी जाने वो टोना भी जाने
नजरिया से दिल को पिरोना भी जाने
हंस के मिले दूर होना भी जाने
हंस के मिले दूर होना भी जाने
तू ही ना माने ना माने
न जइयो रे सौतन घर सैयां
रुक जा मैं रो रो पडूं तोरे पैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
न जइयो रे
तन से लुभाए अदाओं से लूटे
पल में वो माने तो पल में ही रूठे
बैरन के होते हैं सब रूप झूठे
बैरन के होते हैं सब रूप झूठे
तू ही ना जाने ना जाने
न जइयो रे सौतन घर सैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
रुक जा मैं रो रो पडूं तोरे पैयां
रुक जा मैं रो रो पडूं तोरे पैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
न जइयो रे सौतन घर सैयां
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Na jaiyo re sautan ghar saiyan-Kagaz ki naav 1976
Artists: Aruna Irani, Pradeep Kumar

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