जाने वालों ज़रा मुड़ के देखो-दोस्ती १९६४
हैं. फिल्म में रफ़ी के गाये ४ गीत और लता मंगेशकर का गाया
एक गीत है. फिल्म के लिए रफ़ी के गाये गीत ज्यादा लोकप्रिय
हैं. मजरूह ने फिल्म के गीत लिखे हैं और संगीत तैयार किया
लक्ष्मी प्यारे ने.
फिल्म में संजय खान केवल एक जाना हुआ चेहरा हैं और बाकी
के नए कलाकारों ने काम किया जिन्हें इस फिल्म के बाद
प्रसिद्धि मिली. कम बजट वाली और नए सितारों वाली ये फिल्म
अपने संगीत की वजह से काफी लोकप्रिय हुई. उस समय के
लिहाज से इसे बहुत बड़ी सफलता कह सकते हैं. कम बजट में
अनजान सितारों को लेकर कोई फिल्म बना के उसे सफल
बनाना आसान काम नहीं था उस वक्त के हिसाब से. अक्सर को
ऐसी फ़िल्में बी ग्रेड या सी ग्रेड में तब्दील हो जाया करती थीं.
मगर राजश्री प्रोडक्शंस को एक नया इतिहास रचना था तो
इस फिल्म का लोकप्रिय होना भी ज़रूरी था.
गीत हर समय के लिए प्रासंगिक है. ये उन मुंह मोड़ने वालों
के लिए भी है जो किसी के बुरे वक्त में गधे के सर के सींगों
जैसे गायब हो जाया करते हैं.
गीत के बोल:
जाने वालों ज़रा मुड़ के देखो मुझे
एक इन्सान हूँ मैं तुम्हारी तरह
जिसने सबको रचा अपने ही रूप से
उसकी पहचान हूँ मैं तुम्हारी तरह
जाने वालों ज़रा
इस अनोखे जगत की मैं तक़दीर हूँ
मैं विधाता के हाथों की तसवीर हूँ
एक तसवीर हूँ
इस जहां के लिये धरती माँ के लिये
शिव का वरदान हूँ मैं तुम्हारी तरह
जाने वालों ज़रा
मन के अंदर छिपाए मिलन की लगन
अपने सूरज से हूँ एक बिछड़ी किरन
एक बिछड़ी किरन
फिर रहा हूँ भटकता मैं यहाँ से वहाँ
और परेशान हूँ मैं तुम्हारी तरह
जाने वालों ज़रा
मेरे पास आओ छोड़ो ये सारा भरम
जो मेरा दुख वही है तुम्हारा भी ग़म
है तुम्हारा भी ग़म
देखता हूँ तुम्हें जानता हूँ तुम्हें
लाख अनजान हूँ मैं तुम्हारी तरह
जाने वालों ज़रा
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Jaane walon zara mud ke-Dosti 1964
Artists: Sudhir Kumar, Susheel Kumar

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