ये दिल तुम कभी लगता नहीं-इज्ज़त १९६८
कम गीत सुनवाए हैं अभी तक. ये किसी ब्लॉग पंडित ने तो
नहीं बोला कि आप ऐसे नाम वाली फिल्मों के गाने ज्यादा
शामिल करंगे तो पाठक ज्यादा आकर्षित होंगे. ये तो सूची
देखते समय देखा इस शब्द पर ज्यादा ध्यान गया नहीं.
पाठकों का क्या है वो आज कल व्हाट्सएप और फेसबुक पर
ज्यादा ठक ठक करते हैं.
आज सुनते हैं फिल्म इज्ज़त से एक मशहूर दोगाना जिसे लता
और रफ़ी ने गाया है. साहिर का लिखा गीत है और तर्ज़ है
लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की. तसव्वुर जैसे भारी शब्दों के बावजूद
इसे गुनगुनान आसान है जबकि इसकी धुन भी घुमावदार है.
कैसे भी इंग्रेडियेंट्स हों गीत के, है मगर सुनने में मधुर.
गीत के बोल:
ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं हम क्या करें
ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं हम क्या करें
तसव्वुर में कोई बसता नहीं हम क्या करें
तुम्ही कह दो अब ऐ जाने वफ़ा हम क्या करें
लुटे दिल में दिया जलता नहीं हम क्या करें
तुम्ही कह दो अब ऐ जाने अदा हम क्या करें
ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं हम क्या करें
किसी के दिल में बस के दिल को तड़पाना नहीं अच्छा
किसी के दिल में बस के दिल को तड़पाना नहीं अच्छा
निगाहों को छलकते देख के छुप जाना नहीं अच्छा
उम्मीदों के खिले गुलशन को झुलसाना नहीं अच्छा
हमें तुम बिन कोई जंचता नहीं हम क्या करें
तुम्ही कह दो अब ऐ जानेवफ़ा हम क्या करें
लुटे दिल में दिया जलता नहीं हम क्या करें
मुहब्बत कर तो लें लेकिन मुहब्बत रास आये भी
मुहब्बत कर तो लें लेकिन मुहब्बत रास आये भी
दिलों को बोझ लगते हैं कभी ज़ुल्फ़ों के साये भी
हज़ारों ग़म हैं इस दुनिया में अपने भी पराये भी
मुहब्बत ही का ग़म तन्हा नहीं हम क्या करें
तुम्ही कह दो अब ऐ जाने-अदा हम क्या करें
ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं हम क्या करें
बुझा दो आग दिल की या इसे खुल कर हवा दे दो
बुझा दो आग दिल की या इसे खुल कर हवा दे दो
जो इसका मोल दे पाये उसे अपनी वफ़ा दे दो
तुम्हारे दिल में क्या है बस हमें इतना पता दे दो
के अब तन्हा सफ़र कटता नहीं हम क्या करें
लुटे दिल में दिया जलता नहीं हम क्या करें
ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं हम क्या करें
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Ye dil tum bin kahin lagta nahin-Izzat 1968
Artists: Dharmendra, Tanuja

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