कितने अटल थे तेरे इरादे १-एक बार मुस्कुरा दो १९७२
ज़रूरी नहीं है. हम अक्सर ऐसे गाने गुनगुनाते हैं जिनका अर्थ
अगर हम ध्यान से समझें तो शायद उन्हें गुनगुनाने में झिझक
सी महसूस हो. हिंदी सिनेमा के गीतों में फ्यूज़न और कंफ्यूज़न
के बीच सैंकडों प्रयोग हो चुके हैं और तकरीबन अधिकांश को
जनता स्वीकार कर चुकी है. संगीतमय आम के अचार बनाने की
विधि हो तो जनता उसे भी स्वीकार कर लेगी.
संगीतकार ओ पी नैयर ने अपने कैरियर में सबसे ज्यादा सेवाएं लीं
इन गीतकारों से – एस एच बिहारी और कमर जलालाबादी.. इनके
अलावा कभी कभार ही दूसरे गीतकारों का नाम नैयर के साथ जुड़ा.
शुरूआती दौर में साहिर और मजरूह ने भी उनके साथ काफी काम
किया.
एक गाना सुनवाते हैं आपको जो शत प्रतिशत फिल्म की सिचुएशन
के हिसाब से ही बनाया गया था मगर इसकी धुन आकर्षक है
इसलिए ये अपने ज़माने में खूब सुना गया और गुनगुनाया गया. आज
भी इसे हम कभी कभार सुन पाते हैं रेडियो पर.
कुक्कू, हेलन की परंपरा में आगे की पीढ़ी में एक नाम है फरयाल.
इस गीत में आप फरयाल को नाचते हुए देख सकते हैं अभिनेता
देव मुखर्जी के साथ. गीत में एक बात बड़ी अच्छी है-साधन यानि
कि फर्नीचर, सामान इत्यादि से सुख नहीं मिलता ये तो मन का एक
ऐसा पड़ाव है जिस पर पहुँच पाना और टिक पाना हर एक के लिए
संभव नहीं. पालतू कुत्ता साधनों में नहीं आता. वो एक जीव है और
मनुष्य से ज्यादा प्रिडिक्टेबल जीव. जब दो टांग वाला कुत्ता चार टांग
वाले को सहलाता है तो उसे शांति और सुख अवश्य ही प्राप्त होता है.
गीत के बोल:
कितने अटल थे तेरे इरादे याद तो कर तू वफ़ा के वादे
तूने कहा था खा कर कसमें सदा निभाएंगे प्यार की रस्में
तू औरों की क्यूँ हो गई तू हमारी थी जान से प्यारी थी
तेरे लिए मैंने दुनिया संवारी थी
तू औरों की क्यूँ हो गई
क्या ये तेरे सुख के साधन मेरी याद को भुला सकेंगे
मेरी याद जब नींद उड़ा देगी क्या ये तुझको सुला सकेंगे
हो क्या ये तुझको सुला सकेंगे
साधन में सुख होता नहीं है सुख जीवन की एक कला है
मुझसे ही छल किया ना तूने अपने को तूने आप छला है
तू औरों की क्यूँ हो गई तू हमारी थी जान से प्यारी थी
तेरे लिए मैंने दुनिया संवारी थी
तू औरों की क्यूँ हो गई
तेरे लिए मैं लाया बहारें तेरे लिए मैं जान पे खेला
तो दिल तूने राह न देखी छोड़ के चल दी मुझे अकेला
हो छोड़ के चल दी मुझे अकेला
तेरी जुदाई मेरी चिता है गम की चिता में मैं जल रहा हूँ
मन मेरा दहके मरघट जैसा अंगारों पे मैं चल रहा हूँ
तू औरों की क्यूँ हो गई
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Kitne atal the tere iraade-Ek baar muskura do 1972
Artists: Dev Mukherji, Faryal, Tanuja
1 comments:
किसी ने कुत्ते को कुकुरदेव कहा. वो वाकई में इंसान से ज्यादा तारीफ
के काबिल है. ईमानदारी से एक्सप्रेस तो करता है अपने आप को.
समय के साथ साथ इंसानी बनावटीपन उसमें भी आता जा रहा है
मगर कुत्तेपन के मामले में इंसान ही हमेशा स्वर्ण पदक का हकदार
रहेगा.
हाँ, अंडे के ठेले और नॉनवेज की दुकानों के इर्द गिर्द घूमने वाले कुत्ते
अपवाद हैं.
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