अजी आवो मोहब्बत की खा लें-शहनाई १९४७
खाई और खिलाती जाएँगी. कुदरती व्यवस्था है बस भावनाओं
का इज़हार कैसे करें उसका ट्यूटोरियल समय समय पर कवि
और गीतकार अपने अपने अंदाज़ में बतलाया करते हैं.
सुनते हैं शहनाई से अगला गीत जिसे अमीरबाई कर्नाटकी और
स्वयं संगीतकार ने गाया है. गीतकार एक बार फिर से वही हैं
प्यारेलाल संतोषी.
गीत के बोल:
अजी आवो
आजी आवो मोहब्बत की खा लें कसम
हमारे रहो तुम तुम्हारे रहें हम
अजी आवो
अजी आवो जवानी की खा लें कसम
हमारे रहो तुम तुम्हारे रहें हम
अजी आवो
जिस धारा में नैया हमारी बहे रे
हमारी बहे रे
जिस धारा में दुनिया ये सारी बहे रे
ये सारी बहे रे
उस धारा में उस धारा में
घुलमिल के संग बहें हम
हमारे रहो तुम तुम्हारे रहें हम
अजी आवो
अजी आवो जवानी की खा लें कसम
हमारे रहो तुम तुम्हारे रहें हम
अजी आवो
जिस बोली में बोले पपीहा पिया हो
पपीता पिया हो
जिस बोली में धडके हमारा जिया हो
हमारा जिया हो
उस बोली में उस बोली में
कानों में तुमसे कहें हम
हमारे रहो तुम तुम्हारे रहें हम
अजी आवो
अजी आवो जवानी की खा लें कसम
हमारे रहो तुम तुम्हारे रहें हम
अजी आवो
चाहे पश्चिम से सूरज निकानले लगे
चाहे चन्दा भी आग उगलने ले
चाहे पश्चिम से सूरज निकानले लगे
चाहे चन्दा भी आग उगलने ले
ये उल्फत हमारी कभी हो ना पाए कम
हमारे रहो तुम तुम्हारे रहें हम
अजी आवो
अजी आवो जवानी की खा लें कसम
हमारे रहो तुम तुम्हारे रहें हम
अजी आवो
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Aji aavo moabbat ki kha len kasam-Shehnai 1947
Artists: Nasir Khan, Rehana
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