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Sep 5, 2019

ए मोहब्बत तेरे अन्जाम पे-बेगम अख्तर

गैर फ़िल्मी गीतों की दुनिया में एक बार फिर से
चलते हैं. आज सुनेंगे बेगम अख्तर की गई ग़ज़ल
जिसके रचयिता हैं शकील बदायूनीं.

ये काफी लोकप्रिय ग़ज़ल है जिसे संगीत रसिकों ने
एक न एक बार अवश्य सुना होगा.




गीत के बोल:

ए मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
ए मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
ए मोहब्बत तेरे
जाने क्यूँ आज तेरे नाम पे रोना आया
जाने क्यूँ आज तेरे नाम

यूँ तो हर
यूँ तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती थी
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
आज कुछ बात है जो शाम पे

कभी
कभी तकदीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मन्ज़िल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया
मन्ज़िल-ए-इश्क़ में

जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का 'शकील'
मुझको अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया

ए मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
ए मोहब्बत
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Ae mohabbat tere anjaam pe-Begum Akhtar non film song

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Jan 2, 2018

दायम पड़ा हुआ-बेगम अख्तर गज़ल

बेगम अख्तर के स्वर में सुनते हैं मिर्ज़ा ग़ालिब की एक रचना.
मिर्ज़ा ग़ालिब की रचनाओं को गाने वालों मे बेगम अख्तर का
नाम काफी आदर से लिया जाता है. गज़ल गायकी में जो स्थान
उनका है वहाँ तक पहुँच तो गए कुछ लोग मगर उस स्थान पर
काबिज ना हो पाए.





गीत के बोल:

दायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मैं
दायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मैं
ख़ाक़ ऐसी ज़िंदगी पे के पत्थर नहीं हूँ मैं
ख़ाक़ ऐसी ज़िंदगी पे

क्यों गर्दिश-ए-मुदाम से
क्यों गर्दिश-ए-मुदाम से घबरा न जाये दिल
इन्सान हूँ प्याला-ओ-साग़र नहीं हूँ मैं
इन्सान हूँ प्याला-ओ

या रब
या रब ज़माना मुझको मिटाता है किस लिये
या रब ज़माना मुझको मिटाता है किस लिये
लौह-ए-जहाँ पे हर्फ़-ए-मुक़र्रर नहीं हूँ मैं
लौह-ए-जहाँ पे हर्फ़-ए-मुक़र्रर नहीं हूँ मैं

हद चाहिये सज़ा में अक़ूबत के वास्ते
आखिर गुनाह्ग़ार हूँ क़ाफ़िर नहीं हूँ मैं
आखिर गुनाह्ग़ार हूँ क़ाफ़िर नहीं हूँ मैं

दायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मैं
दायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मैं
ख़ाक़ ऐसी ज़िंदगी पे के पत्थर नहीं हूँ मैं
दायम पड़ा हुआ
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Dayam pada hua hai-Begum Akhtar Non film song

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May 24, 2017

दर्द मिन्नतकश-ए-दवा न हुआ-बेगम अख्तर

बेगम अख्तर की गोल्डन वोइस में एक ग़ज़ल सुनते हैं.
मिर्ज़ा ग़ालिब की लिखी ग़ज़लें बहुतों ने गई हैं मगर
कुछ एक की आवाजों में ही वो ज्यादा अच्छी सुनाई
देती हैं.




ग़ज़ल के बोल:

दर्द मिन्नतकश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

क्या वो नमरूद की ख़ुदाई थी
बंदगी में मेरा भला न हुआ

हम कहाँ क़िस्मत आज़माने जाएँ
जब तू ही ख़ंजर-आज़मा न हुआ

जमा करते हो क्यूँ रक़ीबों को
इक तमाशा हुआ गिला न हुआ

कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज 'ग़ालिब’ ग़ज़लसरा न हुआ
………………………………………………
Dard minnatkash-e-dawa-Begum Akhtar Ghazal

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Aug 22, 2016

चार दिनों की जवानी-रोटी १९४२

रेवोल्युशनरी गीत हर युग में बने हैं और बनते रहेंगे. कुछ कम
ज्यादा हो सकते हैं मगर बनते ज़रूर हैं. सन १९४२ की फिल्म
रोटी का संगीत कुछ अलग है. अनिल बिश्वास के टोटल आउटपुट
को खंगालें तो उत्तम कोटि के एल्बमों में से एक है.

सफ़दर आह सीतापुरी के सटीक तीर वाला एक गीत आपने सुना
है पहले इस फिल्म से. दूसरा गीत सुनते हैं जिसमें नसीहत दी
गयी है. चंद्रमोहन, शेइख मुख्तार, अख्तरी बाई, अशरफ खान
और सितारा से जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म का निर्माण
नेशनल स्टूडियोज बॉम्बे द्वारा किया गया. फिल्म का निर्देशन
महबूब ने किया था.प्रस्तुत गीत फिल्म में देखने के लिए मौजूद
नहीं है. ये केवल रिकोर्ड पर उपलब्ध है. बेगम अख्तर ने इसे
गाया है.



गीत के बोल:

चार दिनों की जवानी
मतवाले पी ले पी ले
चार दिनों की जवानी
मतवाले पी ले पी ले
चार दिनों की जवानी

छलके जाए दिल के प्याले रे प्याले
छलके जाए दिल के प्याले रे प्याले
मतवाले पी ले पी ले

चार दिनों की जवानी
मतवाले पी ले पी ले
चार दिनों की जवानी

ये दुनिया है एक मयखाना
ये दुनिया है एक मयखाना
खाली भर भर भर पैमाना
ये दुनिया है एक मयखाना
खाली भर भर भर पैमाना
दम भर मौज उड़ा ले उड़ा ले
हाँ हाँ दम भर मौज उड़ा ले उड़ा ले
मतवाले पी ले पी ले

चार दिनों की जवानी
मतवाले पी ले पी ले
चार दिनों की जवानी

छलके जाए दिल के प्याले रे प्याले
छलके जाए दिल के प्याले रे प्याले
मतवाले पी ले पी ले

चार दिनों की जवानी
मतवाले पी ले पी ले
चार दिनों की जवानी
……………………………………………….
Char dinon ki jawani-Roti 1942

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