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Jun 8, 2017

चंदा रे मेरे भैया से-चम्बल की कसम १९७९

इस ब्लॉग के चुस्त दुरुस्त, सुस्त एवं सुप्त-गुप्त सभी प्रकार के
पाठकों का एक बार फिर से अभिवादन. स्वच्छ भारत अभियान
का सम्मान करते हुए उन्होंने जो साफ़ सफाई इधर रखी है
उसके लिए विशेष धन्यवाद. साफ़ सफाई से तात्पर्य टिप्पणियों
वाला स्थान साफ़ रखने से है.


पिछले कुछ दिन से कोई महाशय खय्याम पर रिसर्च कर रहे
हैं. उन्होंने ब्लॉग के तकरीबन ३००-४०० पेज खंगाल लिए.
उनके इस विकट और अतिउत्साही प्रयास के लिए एक गीत
उनको समर्पित है आज. उम्मीद है जिस अंग्रेजी ब्लॉग के लिए
वे माल इकठ्ठा कर रहे हैं उसके लिए उन्हें काफी मसाला मिल
चुका होगा.

गीत सुनवा रहे हैं चम्बल की कसम से जिसे साहिर लुधियानवी
ने लिखा है और गाया हैं लता मंगेशकर ने.




गीत के बोल:

चंदा रे मेरे भैया से कहना
हो मेरे भैया से कहना
बहना याद करे हो
चंदा रे मेरे भैया से कहना
हो मेरे भैया से कहना
बहना याद करे हो
चंदा रे

क्या बतलाऊँ कैसा है वो
बिलकुल तेरे जैसा है वो
तू उसको पहचान ही लेगा
देखेगा तो जान ही लेगा
तू सारे सँसार में चमके
हर बस्ती हर गाँव में दमके
कहना अब घर वापस आ जा
कहना अब घर वापस आ जा
तू है घर का गहना
बहना याद करे हो
चंदा रे

राखी के धागे सुवलायें
कहना अब न राह दिखाए
माँ के नाम की कसमें देना
भेंट मेरी के रसमें देना
पूछना उस रूठे भाई से
भूल हुई क्या माँ जाई से
बहन पराया धन है कहना
बहन पराया धन है कहना
उसने सदा नहीं रहना
बहना याद करे हो

चंदा रे मेरे भैया से कहना
हो मेरे भैया से कहना
बहना याद करे हो
……………………………………………………………..
Chanda re-Chmbal ki kasam 1979

Artists: Raj Kumar, Fareeda Jalal

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Jan 26, 2010

सिमटी हुई ये घड़ियाँ-चम्बल की कसम १९७९

लता और रफ़ी का गाया हुआ एक समय के बंधन से मुक्त ,
मधुर युगल गीत।

फिल्म: चम्बल की कसम
वर्ष: १९७९
गीतकार: साहिर लुधियानवी
संगीतकार: खय्याम
कलाकार: राजकुमार, मौसमी चटर्जी



गीत के बोल:

सिमटी हुई यह घड़ियाँ, फिर से ना बिखर जाएँ
फिर से ना बिखर जाएँ

इस रात में जी ले हम, इस रात में मर जाएँ
इस रात में मर जाएँ

सिमटी हुई यह घड़ियाँ

अब सुबह ना आ पाए, आओ यह दुआ मांगें
अब सुबह ना आ पाए, आओ यह दुआ मांगें
इस रात के हर पल से,
रातें ही उभर जाएँ
रातें ही उभर जाएँ

सिमटी हुई यह घड़ियाँ

दुनिया की निगाहें अब हम तक ना पहुँच पायें
दुनिया की निगाहें अब हम तक ना पहुँच पायें
तारों में बसें चल कर,
धरती में उतार जाएँ
धरती में उतार जाएँ

सिमटी हुई यह घड़ियाँ

हालात के तीरों से, छलनी है बदन अपने
हालात के तीरों से, छलनी है बदन अपने
पास आओ के सीनों के
कु्छ ज़ख्म तो भर जाएँ
कु्छ ज़ख्म तो भर जाएँ

सिमटी हुई यह घड़ियाँ

आगे भी अँधेरा है, पीचे भी अँधेरा है
आगे भी अँधेरा है, पीचे भी अँधेरा है
अपनी हैं वो ही सांसें,
जो साथ गुज़र जाएँ
जो साथ गुज़र जाएँ

सिमटी हुई यह घड़ियाँ

…ये घड़ियाँ….फिर से….
सिमटी हुई…

बिछड़ी हुई रूहों का, ये मेल सुहाना है
बिछड़ी हुई रूहों का, ये मेल सुहाना है
इस मेल का कुच्छ एहसान, जिस्मों पे भी कर जाएँ
जिस्मों पे भी कर जाएँ

सिमटी हुई यह घड़ियाँ

तरसे हुए जज्बों को अब और ना तरसाओ
तरसे हुए जज्बों को अब और ना तरसाओ
तुम शाने पे सर रख दो,
हम बाँहों में भर जाएँ
हम बाँहों में भर जाएँ

सिमटी हुई यह घड़ियाँ

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