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Apr 16, 2020

दिल-ए-बेताब को सीने से-पालकी १९६७

इस ब्लॉग पर हमने आपको सुमन कल्याणपुर और रफ़ी
के गाये काफी युगल गीत सुनवाये हैं. फेमस और रेयर
दों टाइप के सुन चुके हैं आप लोग.

आज एक लोकप्रिय वाला सुन लेते हैं. फिल्म पालकी का
ये गीत अपने पहले अंतरे के अनूठेपन के लिए जाना जाता
है. हुस्न की फायर और इश्क की फायर ब्रिगेड.

बोल शकील बदायूनीं के हैं और संगीत नौशाद का.




गीत के बोल:

दिल-ए-बेताब को सीने से लगाना होगा
आज पर्दा है तो कल सामने आना होगा
आपको प्यार का दस्तूर निभाना होगा
दिल झुकाया है तो सर को भी झुकाना होगा
दिल-ए-बेताब को सीने से लगाना होगा

अपनी सूरत को तू ए जान-ए-वफ़ा यूँ न छुपा
गर्मी-ए-हुस्न से जल जाये न आँचल तेरा
लग गई आग तो मुझको ही बुझाना होगा
दिल झुकाया है तो सर को भी झुकाना होगा
दिल-ए-बेताब को सीने से लगाना होगा

आज आलम है जो दिल का वो बताये न बने
पास आये न बने दूर भी जाये न बने
मैँ हूँ मदहोश मुझे होश में लाना होगा
आज पर्दा है तो कल सामने आना होगा
आपको प्यार का दस्तूर निभाना होगा

आप तो इतने क़रीब आ गये अल्लाह तौबा
क्या करें आप से टकरा गये तौबा तौबा
इश्क़ इन बातों से रुसवा-ए-ज़माना होगा

दिल-ए-बेताब को सीने से लगाना होगा
…………………………………………………..
Dil-e-betaab ko seene se-Palki 1967

Artists: Waheeda Rehman, Rajendra Kumar

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Apr 10, 2020

ए शहर-ए-लखनऊ-पालकी १९६७

लखनऊ देश के पुराने शहरों में से एक है जिसने इतिहास के
कई बदलाव देखे. नवाबी दौर में इसे खूब लोकप्रियता मिली.
आज ये उत्तर प्रदेश राज्य की राजधानी है. रेल और सड़क
मार्ग से ये तकरीबन उत्तर प्रदेश के सभी प्रमुख नगरों से जुड़ा
हुआ है.

१९६७ की फिल्म पालकी की कहानी इसी शहर को समर्पित है
शायद. फिल्म के टाइटल्स में लखनऊ को याद करता हुआ ये
गीत है जिसे शकील बदायूनीं ने लिखा है और जिसका संगीत
नौशाद ने तैयार किया है. इसे रफ़ी ने गाया है और परदे पर
इस पर राजेंद्र कुमार ने होंठ हिलाये हैं.

गीतकार शकील बदायूनीं के नाम में जिस बदायूं का जिक्र है
वो लखनऊ के पास ही का एक क़स्बा है. गीतकार इसमें शहर
के कुछ मोन्युमेंट्स के नाम और जोड़ देते तो ये टूरिज़्म वालों
का सिग्नेचर गाना बन जाता.



गीत के बोल:

ए शहर-ए-लखनऊ तुझे मेरा सलाम है
ए शहर-ए-लखनऊ तुझे मेरा सलाम है
तेरा ही नाम दूसरा जन्नत का नाम है
ए शहर-ए-लखनऊ

मेंरे लिए बहार भी तू गुलबदन भी तू
परवाना और शमा भी तू अंजुमन भी तू
जुल्फों की तरह महकी हुई तेरी शाम है
ए शहर-ए-लखनऊ

कैसा निखार तुझमे है क्या क्या है बांकपन
ग़ज़लें गली गली हैं तो नगमे चमन चमन
शायर के दिल से पूछ तेरा क्या मक़ाम है

ए शहर-ए-लखनऊ तुझे मेरा सलाम है
तेरा ही नाम दूसरा जन्नत का नाम है
ए शहर-ए-लखनऊ

तू वो है लोग शहरे निगारा कहें जिसे
फ़िरदौस-ए-हुस्न-ए-रश्क-ए-बहारा कहें जिसे
तेरे हर एक अदा में वफ़ा का पयाम है

ए शहर-ए-लखनऊ तुझे मेरा सलाम है
तेरा ही नाम दूसरा जन्नत का नाम है
ए शहर-ए-लखनऊ
……………………………………………………..
Ae shahar-e-lakhnau-Palki 1967

Artists: Rajendra Kumar

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Sep 10, 2019

कल रात ज़िन्दगी से-पालकी १९६७

सुनते हैं रफ़ी का गाया एक पॉपुलर गीत फिल्म पालकी
से. शकील बदायूनीं की रचना है और नौशाद का संगीत.

कठिन शब्दों वाला ये गीत समझने और इसका आनंद
लेने के लिए आपको भाषा की अच्छी जानकारी होना
ज़रूरी है अन्यथा इसकी धुन सुन सुन के ही आनंद लेते
रहें.

इस गीत की पहली पंक्ति कुछ ऐसी है जिसे सुन कर
जिंदगी से विपरीत की चीज़ों की याद हो आती है.
अक्सर ऐसे शब्द अकस्मात वाली घटना से जोड़ के
प्रयोग किये जाते हैं.




गीत के बोल:

कल रात ज़िन्दगी से मुलाक़ात हो गई
कल रात ज़िन्दगी से मुलाक़ात हो गई
लब थरथरा रहे थे मगर बात हो गई
कल रात ज़िन्दगी से मुलाक़ात हो गई

एक हुस्न सामने था क़यामत के रूप में
एक ख़्वाब जलवागर था हक़ीक़त के रूप में
चेहरा वही गुलाब की रंगत लिए हुए
नज़रें वही पयाम-ए-मुहब्बत लिए हुए
ज़ुल्फ़ें वो ही के जैसे धुँधलका हो शाम का
आँखें वो ही जिन आँखों पे धोखा हो जाम का
कुछ देर को तसल्ली-ए-जज़्बात हो गई
लब थरथरा रहे थे मगर बात हो गई

कल रात ज़िन्दगी से मुलाक़ात हो गई

देखा उसे तो दामन-ए-रुख़्सार नम भी था
वल्लाह उसके दिल को कुछ एहसास-ए-ग़म भी था
थे उसकी हसरतों के ख़ज़ाने लुटे हुए
लब पर तड़प रहे थे फ़साने घुटे हुए
काँटे चुभे हुए थे सिसकती उमंग में
डूबी हुई थी फिर भी वफ़ाओ के रंग में
दम भर को ख़त्म गर्दिश-ए-हालात हो गई
लब थरथरा रहे थे मगर बात हो गई

कल रात ज़िन्दगी से मुलाक़ात हो गई

ए मेरी रूहे इश्क़ मेरी जाने शायरी
दिल मानता नहीं के तू मुझसे बिछड़ गई
मायूसियाँ हैं फिर भी मेरे दिल को आस है
महसूस हो रहा है के तू मेरे पास है
समझाऊँ किस तरह से दिले बेक़रार को
वापस कहां से लाऊँ मैं गुज़री बहार को
मजबूर दिल के साथ बड़ी घात हो गई
लब थरथरा रहे थे मगर बात हो गई

कल रात ज़िन्दगी से मुलाक़ात हो गई
…………………………………………………
Kal raat zindagi se mulaqat ho gayi-Palki 1967

Artist: Rajendra Kumar

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Nov 15, 2018

चेहरे से अपने आज तो-पालकी १९६७

सुनते हैं हाई-फ्रीक्वेंसी गीत फिल्म पालकी से जिसे लिखा
है शकील बदायूनीं ने और गाया है रफ़ी ने. नौशाद ने
इसकी धुन तैयार की है.

लिखने वाले लिख जाते हैं, गाने वाले गा जाते हैं और
सरदर्द हो जाता है सुनने वालों का. अब ऐसे गानों का
एप्लीकेशन कहाँ किया जाये. हर व्यक्ति तो कोमल ह्रदय
कवि होता नहीं जो इस तरीके से अपनी भावनाओं का
इज़हार करे.

लड़के लड़कियों की बात करें तो गर्ल फ्रेंड की वोकेबुलरी
भी तो इतनी फरटाईल हो के उसे ये सब समझ आये.
किसी कम पढ़ी लिखी को ये सब सुना दिया तो वो तो
बेहोश हो कर धड़ाम से गिरेगी ज़मीन पर.




गीत के बोल:

सदका उतारिये के ना लागे कहीं नज़र
सेहरे में आज फूल सा मुखड़ा है जलवागर

चेहरे से अपने आज तो परदा उठाईये
चेहरे से अपने आज तो परदा उठाईये
लिल्लाह मुझको चाँद सी सूरत दिखाईये
जन्नत है ये मकाम दर-ए-यार है ये घर
जन्नत है ये मकाम दर-ए-यार है ये घर
दिल कह रहा है आज यहीं सर झुकाईये
चेहरे से अपने आज तो परदा उठाईये

उठिए खुदा के वास्ते
उठिए खुदा के वास्ते लग जाइए गले
रस्मो रिवाज़ शर्मो हाय सब हटाईये
चेहरे से अपने आज तो परदा उठाईये
लिल्लाह मुझको चाँद सी सूरत दिखाईये

ये क्या के हम ही बढ़ते रहें आपकी तरफ़
थोड़ी सी दूर आप भी तशरीफ़ लाइए
थोड़ी सी दूर आप भी तशरीफ़ लाइए
चेहरे से अपने आज तो परदा उठाईये
…………………………………………………..
Chehre se apne aaj to-Palki 1967

Artists: Rajendra Kumar, Waheeda Rehman

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