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Sep 13, 2016

वो परी कहाँ से लाऊँ-पहचान १९६९

७० के दशक में शंकर जयकिशन के साथ वर्मा मलिक भी जुड गए.
कई गीतकार उनके साथ जुड़े क्यूंकि उस समय तक शैलेन्द्र हसरत
की जोड़ी शैलेन्द्र के जाने के बाद अधूरी रह गयी उसके अलावा एक
और वजह रही-शंकर जयकिशन की जोड़ी के बीच अलगाव. दोनों ने
अलग-अलग काम करना शुरू कर दिया था. काम अलग भले ही
करते रहे हों दोनों मगर जोड़ी का नाम बरकरार रहा.

सुनते हैं सन १९६९ की फिल्म पहचान से एक और गीत जो कि तीन
गायकों ने गाया है-मुकेश, सुमन और शारदा.

गीत हास्य पुट लिए है और इसमें लड़कियों के फैशन पर कटाक्ष है.
मनोज कुमार ने ग्रामीण युवक की भूमिका निभाई है फिल्म में. इस
गीत में बबीता और मनोज कुमार प्रमुख कलाकार हैं.




गीत के बोल:

वो परी कहाँ से लाऊँ तेरी दुल्हन जिसे बनाऊँ
कि गोरी कोई पसन्द न आये तुझको
कि छोरी कोई पसन्द न आये तुझको
वो परी कहाँ से लाऊँ तेरी दुल्हन जिसे बनाऊँ
कि गोरी कोई पसन्द न आये तुझको
कि छोरी कोई पसन्द न आये तुझको
वो परी कहाँ से लाऊँ तेरी दुल्हन जिसे बनाऊँ
कि गोरी कोई पसन्द न आये तुझको
कि छोरी कोई पसन्द न आये तुझको


ये तो मेरी है सहेली दिलवाली अलबेली
जैसे मोतिया चमेली जैसे प्यार की हवेली
सोलह साल की उमर कोका-कोला सी कमर
रत्ती भर भी क़सर कहीं आये न नज़र
कुछ हुआ है असर?
गोल जूड़े में ये वेणी और वेणी में ये टहनी
कैसे जूड़ियों से पेड़ उगाये
ये गंगाराम के समझ में न आये

वो परी कहाँ से लाऊँ तेरी दुल्हन जिसे बनाऊँ
कि गोरी कोई पसन्द न आये तुझको
कि छोरी कोई पसन्द न आये तुझको

आँख जिसकी है बिल्ली नाम उसका है लिल्ली
ऐसे कजरे की धार जैसे तीखी तलवार
ओ ओ ओ देख होंठों का ये रंग चलने का ढंग
कटे अंग्रेज़ी बाल बाँधा रेशमी रुमाल
बोलो क्या है खयाल?
इसे जब लिया तक़ मेरा दिल हुआ फ़क़
छोरी हो के हजामत कराये
ये गंगाराम के समझ में न आये

वो परी कहाँ से लाऊँ तेरी दुल्हन जिसे बनाऊँ
कि गोरी कोई पसन्द न आये तुझको
कि छोरी कोई पसन्द न आये तुझको

नाम इसका कमाल जैसे गन्ने की फसल
जैसे खिला है गुलाब देख पूरा है शबाब
देख रूप की उमंग जैसे हिरनी के अंग
जैसे मीठी हो खजूर ऐसा मुखड़े पे नूर
बोल है मंज़ूर
ये तो नाचे छम छम मेरा निकले है दम
इसे भांगडा कौन नचाये
ये गंगाराम की समझ में ना आये

वो परी कहाँ से लाऊँ तेरी दुल्हन जिसे बनाऊँ
कि गोरी कोई पसन्द न आये तुझको
कि छोरी कोई पसन्द न आये तुझको
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Wo pari kahan se laaoon-Pehchan 1969

Artists: Manoj Kumar, Babita

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Sep 1, 2016

आया न हमको प्यार जताना-पहचान १९७०

दशक की समाप्ति होती है तब वर्ष के अंत में शून्य आ जाता है.
६० के दशक की समाप्ति का वर्ष है सन ७० और ७० के दशक
का आगाज़. दशक के अंत तक कई चीज़ें शून्य में समा चुकी
होती है तो दशक की शुरुआत में कई बातें शून्य से प्रकट होना
शुरू हो जाती हैं. इन बातों में उलट पुलट भी हो जाती है.

आइये सुनें पहचान फिल्म से एक गीत जिसे जनता अच्छे से
पहचानती है. गीत मुकेश का गाया हुआ है और साथ में उनके
सुमन कल्याणपुर की आवाज़ है. इन्दीवर ने गीत लिखा है और
ये शंकर जयकिशन के लिए उनके चुनिन्दा गीतों में एक है.



गीत के बोल:

आया न हमको प्यार जताना
प्यार कभी से तुझे करते हैं
आया न हमको प्यार जताना
प्यार कभी से तुझे करते हैं
भोलापन तेरा भा गया हमको
सादगी पर तेरी मरते हैं

आया न हमको प्यार जताना
प्यार कभी से तुझे करते हैं
भोलापन तेरा भा गया हमको
सादगी पर तेरी मरते हैं

जिसने हमारे दिल को समझा
वो एक तेरा ही दिल है
जिसने हमारे दिल को समझा
वो एक तेरा ही दिल है
तेरा आँचल तेरी बाहें
अपनी यही तो मंज़िल है
अपनी यही तो मंज़िल है
हम तो तेरे हो ही चुके हैं
अपना कहते डरते हैं
भोलापन तेरा भा गया हमको
सादगी पर तेरी मरते हैं

सूरत अच्छी सीरत अच्छी
तू तो एक है लाखों में
हो ओ ओ सूरत अच्छी सीरत अच्छी
तू तो एक है लाखों में
दिल करता है दिल को लगा लूं
रख लूं छुपा कर आँखों में
ख़ुद पे भरोसा बढ़ जाता है
जब तेरे साथ गुज़रते हैं
भोलापन तेरा भा गया हमको
सादगी पर तेरी मरते हैं

एक ही जीवन में तो दिल की
प्यास बुझा नहीं पायेंगे
एक ही जीवन में तो दिल की
प्यास बुझा नहीं पायेंगे
तुझको फिर पाने के लिये हम
फिर दुनिया में आयेंगे
प्यार अमर है अमर ही रहेगा
मरने को इनसान मरते हैं
भोलापन तेरा भा गया हमको
सादगी पर तेरी मरते हैं

आया न हमको प्यार जताना
प्यार कभी से तुझे करते हैं
पोलापन तेरा भा गया हमको
सादगी पर तेरी मरते हैं
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Aaya na hamko pyar jatana-Pehchan 1970

Artists: Manoj Kumar, Babita

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May 15, 2016

बस यही अपराध मैं हर बार-पहचान १९७०

कविवर नीरज का लिखा एक गीत और सुनते हैं फिल्म
पहचान से. इस गीत का संगीत शंकर जयकिशन ने तैयार
किया है. मनोज कुमार फिल्म के प्रमुख कलाकार हैं.

एक सन्देश देता हुआ ये गीत काफी लोकप्रिय है और इसके
संगीत में आपको थोड़ी फंकी आवाजें सुनाई देंगी. इस तरह
के प्रयोग आजकल के भजन वगैरह में भी होते हैं कुछ अलग
तरह की ध्वनियाँ संगीत में डाली जाती हैं आम जनता को
आकर्षित करने के लिए. इस गीत को भी मुकेश ने गाया है.




गीत के बोल:

बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ
बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ
बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ
बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ

एक खिलौना बन गया दुनिया के मेले में
कोई खेले भीड में कोई अकेले में
एक खिलौना बन गया दुनिया के मेले में
कोई खेले भीड में कोई अकेले में
मस्कुराकर भेंट हर स्वीकार करता हूँ
मस्कुराकर भेंट हर स्वीकार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ

हूँ बहुत नादान करता हूँ ये नादानी
बेचकर खुशियाँ खरीदूँ आँख का पानी
हूँ बहुत नादान करता हूँ ये नादानी
बेचकर खुशियाँ खरीदूँ आँख का पानी
हाथ खाली हैं मगर व्यापार करता हूँ
हाथ खाली हैं मगर व्यापार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ

मैं बसाना चाहता हूँ स्वर्ग धरती पर
आदमी जिसमें रहे बस आदमी बन कर
मैं बसाना चाहता हूँ स्वर्ग धरती पर
आदमी जिसमें रहे बस आदमी बन कर
उस नगर की हर गली तैयार करता हूँ
उस नगर की हर गली तैयार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ

बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ
बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ
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Bas yahi apradh main har baar-Pehchan 1970

Artist-Manoj Kumar

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