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Jul 9, 2017

धीरे-धीरे शाम आ रही है-जुम्बिश १९८६

संगीतकार जयदेव उन बिरले संगीतकारों में से एक हैं जिन्होंने
कई ऑफ बीट और कुछ कमर्शियल फिल्मों में संगीत दिया. वे
एक और बात के लिए जाने जाते हैं-नयी प्रतिभाओं को मौका
देने के लिए.

सन १९८६ की फिल्म जुम्बिश का एक गीत है जो उस समय की
उदयीमान गायिका पीनाज़ मसानी और एक अनजान गायिका
शैला गुलवाडी ने गाया है. फिल्म में गीत सलाउद्दीन परवेज़ ने
लिखे हैं जिहोने नर्गिस फिल्म के गीत भी लिखे जिसका संगीत
बासु मनोहारी ने तैयार किया था.




गीत के बोल:

धीरे-धीरे धीरे-धीरे
शाम आ रही है
धीरे-धीरे धीरे-धीरे
शाम आ रही है
धीरे-धीरे धीरे-धीरे धीरे-धीरे

शाम की किताबों में
पतझड़ों की साँसों में
धुँधली धुँधली आँखों में
शाम बढती आ रही है

धीरे-धीरे धीरे-धीरे धीरे-धीरे
शाम आ रही है
धीरे-धीरे धीरे-धीरे धीरे-धीरे
शाम आ रही है
धीरे-धीरे धीरे-धीरे धीरे-धीरे

नींद एक गाँव है नींद की तलाश में
आवाज़ें आ रही है
नींद एक गाँव है नींद की तलाश में
आवाज़ें आ रही है
पाँवों खड़ा बहने
सत सत गा रहे है
शख वाले रंग लिये मोरों के पंखों से
सभ्यता को लिख रहे है
पीपल के पात हरे
धीरे-धीरे गिर रहे हैं 
मिट्टी के ढिबले में
खोये खोये जल रहे हैं
पीपल के पात हरे
धीरे-धीरे गिर रहे हैं 
धीरे-धीरे गिर रहे हैं 
धीरे-धीरे शाम आ रही हैं 

मिट्टी बरस ले के शंख चीखने लगे हैं
मिट्टी बरस ले के शंख चीखने लगे हैं
मर्द सब रिवाज़ से बँधे हुए   
सरल सपाट उँगलियों से
अपने अपने घर की साहिबान में
अपने अपने घर की साहिबान में
अपने अपने देवताओं के शबीहे लिख रहे हैं
औरतें हथेलियों से चाँद बुन रही हैं
औरतें हथेलियों से चाँद बुन रही हैं
दूध की कटोरियों से सूरजों की आत्मायें
मथ रही हैं
धीरे-धीरे जल रही हैं
धीरे-धीरे बुझ रही हैं
धीरे-धीरे रात आ गयी है
धीरे-धीरे धीरे-धीरे रात आ गयी है
धीरे-धीरे धीरे-धीरे धीरे-धीरे
..............................................................
Dheere dheere shaam aa rahi hai-Jumbish 1986

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Nov 25, 2016

तुझसे बिछड कर जिन्दा हैं-यादों के मौसम १९९०

कुछ फिल्मों के नाम सुनने में बड़े लुभावने से होते हैं जैसे कोई
रूमानी उपन्यास का शीर्षक हो. ऐसे नाम अब दुर्लभ हो चले हैं.
आपको आज एक गीत सुनवाते हैं जो सार्वजनिक स्थलों और
चलायमान चीज़ों पर आपने काफी सुना होगा. ये चलायमान चीज़ें
होती हैं-ऑटो रिक्शा, मिनीबस, बड़ी बस, ए सी बस, वैसी बस,
जीप, यू वी इत्यादि. लॉन्ग ड्राइव पर जा के गीत सुनना अब
रईसों का शगल नहीं बचा. लोडिंग ट्रक और टेम्पो के ड्राइवर कुछ
ज़रूरत से ज्यादा लॉन्ग ड्राइव पर जाते हैं और जी भर के गीत
सुनते हैं.

अब ड्राइव तो ड्राइव है चाहे बैलगाडी की हो या फिर किसी बस की.
सार्वजनिक आवागमन के साधनों की एक विशेषता होती है उन पर
अक्सर वे गीत बजते मिलेंगे जो आपको पसंद नहीं होते. मुझे
लगता है मर्फी के ज़माने में टेम्पो ऑटो वगैरह नहीं थे अन्यथा
वो इस पर भी ज़रूर कोई नियम बना देता. चलो इसे ही एक नियम
समझ लो और बर्फी लॉ कह लो.

प्रस्तुत गीत अनुराधा पौडवाल का गाया हुआ बेहद लोकप्रिय गीत है.
फिल्म यादो के मौसम से. फिल्म के गीत काफी लोकप्रिय रहे हैं.
गीत लिखा है सलाउद्दीन परवेज़ ने और धुन बनाई आनंद मिलिंद ने.




गीत के बोल:

तुझसे बिछड के जिन्दा हैं
तुझसे बिछड के जिन्दा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं
तुझसे बिछड के जिन्दा हैं
तुझसे बिछड के जिन्दा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं

तपती दोपहरी में तेरी आहट दिल में आती थी
तपती दोपहरी में तेरी आहट दिल में आती थी
बारिश के एक दिल के अंदर रिमझिम राग सुनाती थी
अब हम और तपती दोपहरी बीच में यादें जिन्दा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं

शाम को अक्सर छत पे आ कर डूबता सूरज तकती थी
शाम को अक्सर छत पे आ कर डूबता सूरज तकती थी
तो उसकी तब लाली जानम हाथ की मेहँदी लगती थी
मेहँदी तू नाराज़ ना होना हम तुझसे शर्मिंदा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं

हम रहते थे तुझसे लिपट कर तो कितना सच लगता था
हम रहते थे तुझसे लिपट कर तो कितना सच लगता था
सर्द अँधेरी रात में जानम एक दिया सा जलता था
अब तेरी विरह की रातें निसले तेरे ताबिन्दा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं
तुझसे बिछड के जिन्दा हैं
तुझसे बिछड के जिन्दा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं
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Tujhse bichhad kar jinda hain-Yaadon ke mausam 1990

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