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Dec 7, 2009

तेरे दर पे आया हूँ-चोर बाज़ार १९५४

तलत महमूद ने भी उपकृत किया गुमनाम से संगीतकारों
को इनमे से एक नाम है सरदार मालिक का । ये गीत उनकी
आवाज़ के हिसाब से ही तैयार किया गया है। पुराने संगीतकार
गायकों की रेंज का इस्तेमाल बखूबी जानते थे । आपको
मूंछों वाले शम्मी कपूर को बिना कमर हिलाए ऐसा धीमा
गीत गाते देख के आश्चर्य ज़रूर होगा। इस गीत में उनके
हाथ और हिलती गर्दन देख कर १९५४ में दर्शकों को उनके
आने वाले सुनहरे भविष्य पे ज़रा भी संदेह नहीं बचा होगा।
इस गीत में वे राज कपूर के थोड़े सकपकाने वाले खिसियानेपन
(जिससे राज कपूर स्वयं बहुत बाद में मुक्त हुए) की कॉपी करते
नज़र आ रहे हैं ।



गीत के बोल:

तेरे दर पे आया हूँ फ़रियाद ले कर
तेरे दर पे आया हूँ फ़रियाद ले कर
जुबां पर गम-ऐ-दिल की रूदाद ले कर

तेरे दर पे आया

परेशान है दिल घड़ी भर को आ जा
ज़रा मेरी सुन जा और अपनी सुना जा
कहाँ जाऊं मैं हाल-ऐ-बरबाद ले कर

तेरे दर पे आया हूँ फ़रियाद ले कर
जुबां पर गम-ऐ-दिल की रूदाद ले कर
तेरे दर पे आया

मेरे दर्द-ऐ-दिल से नहीं बेखबर तू
मेरे दर्द-ऐ-दिल से नहीं बेखबर तू
बने मेरी किस्मत जो कर दे नज़र तू
मुहब्बत की नाकामियाँ छा गयीं हैं
उम्मीदों की कलियाँ मुरझा गयीं हैं
कहीं मर न जाऊं तेरी याद ले कर

तेरे दर पे आया हूँ फ़रियाद ले कर
जुबां पर गम-ऐ-दिल की रूदाद ले कर
तेरे दर पे आया

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Nov 17, 2009

चलता रहे ये कारवां-चोर बाज़ार १९५४

सरदार मालिक एक पुराने ज़माने के संगीतकार थे।
काफ़ी सुरीली धुनों को बनने के बावजूद उनको वो प्रसिद्धि
नहीं मिल पाई जिसके वो हक़दार थे। ये उनकी धुन है फ़िल्म
चोर बाज़ार से। गायिका हैं लता मंगेशकर। इस गीत के बोल
लिखे हैं शकील बदायूनी ने। फ़िल्म देखने का सौभाग्य मुझे अभी तक
नहीं मिला है इसलिए कोई टिप्पणी करने में असमर्थ हूँ। इस गीत को
कई बार रेडियो पर सुना है और ये एक प्रेरणा देता सा प्रतीत होता है।
लोरी के रूप में इसका प्रयोग थोड़ा नयापन लिए हुए है यही इस गीत
की खूबी है।


गाने के बोल:

चलता रहे ये कारवां
उम्र-ए-रवां का कारवां
चलता रहे ये कारवां
उम्र-ए-रवां का कारवां
शाम चले, सहर चले
मंज़िल से बेखबर चले
बस यूँ ही उम्र भर चले
रुक ना सके यहाँ वहाँ

चलता रहे ये कारवां
उम्र-ए-रवां का कारवां

फूले फले मेरी कली
ग़म ना मिले तुझे कभी
गुज़रे खुशी में ज़िन्दगी
आए ना मौसम-ए-खिज़ां

चलता रहे ये कारवां
उम्र-ए-रवां का कारवां

दुनिया का तू हबीब हो
मंज़िल तेरी क़रीब हो
इन्सां तेरा नसीब हो
तुझ पे ख़ुदा की हो अमां
चलता रहे ये कारवां
उम्र-ए-रवां का कारवां

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Aug 11, 2009

हुई हमसे ये नादानी -चोर बाज़ार १९५४

जैसा कि लता-भक्त जानते हैं कि सरदार मालिक ने
भी अपनी बढ़िया धुनें लता को गाने को दीं। फ़िल्म चोर
बाज़ार में कुछ बढ़िया नगमे हैं। पी एन मालिक निर्देशित इस
फ़िल्म में शम्मी कपूर हीरो थे।

इस गीत को लिखा है शकील बदायूनी ने। छाया गीत छाप
ये गीत रात्रि में सुनने में बहुत आनंद देता है। ये फ़िल्म सन
१९५४ में आई थी । नायिका का नाम चित्रा है। ये मत पूछियेगा
कि उनकी और कौन सी हिन्दी फ़िल्में आयीं।



गीत के बोल:

हुई ये हमसे नादानी तेरी महफ़िल में आ बैठे
हुई ये हमसे नादानी तेरी महफ़िल में आ बैठे
ज़मीन की खाक़ होकर आसमान से दिल लगा बैठे
तेरी महफ़िल में आ बैठे

हुआ खून-ए-तमन्ना इसका शिक़वा क्य करें तुमसे
हुआ खून-ए-तमन्ना इसका शिक़वा क्य करें तुमसे
o शिक़वा क्य करें तुमसे
न कुछ सोचा न कुछ समझा जिगर पर तीर खा बैठे
तेरी महफ़िल में आ बैठे

ख़बर क्या थी गुलिस्तान-ए-मुहब्बत में भी खतरें हैं
ख़बर क्या थी गुलिस्तान-ए-मुहब्बत में भी खतरें हैं
मुहब्बत में भी खतरें हैं
जहाँ गिरती है बिजली हम उसी डाली पे जा बैठे
तेरी महफ़िल में आ बैठे

न क्यों अंजाम-ए-उल्फ़त देख कर आंसू निकल आये
हाय आंसू निकल आये
जहाँ को लूटने वाले खुद अपना घर लुटा बैठे
तेरी महफ़िल में आ बैठे

हुई ये हमसे नादानी तेरी महफ़िल में आ बैठे
ज़मीन की खाक़ होकर आसमान से दिल लगा बैठे
तेरी महफ़िल में आ बैठे

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