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Apr 18, 2020

गये दिनों का सुराग़ लेकर-मीराज-ए-गज़ल १९८३

आशा भोंसले और गुलाम अली के गज़लों के एल्बम से अगली
रचना सुनते हैं जिसे नासिर काज़मी ने लिखा और गुलाम अली
ने संगीतबद्ध किया. ८० के दशक में ये एल्बम रिलीज़ हुआ था
और रिलीज़ के बाद काफी लोकप्रिय भी.

रचना काफी बड़ी है और उसमें से चंद शेर ही इसमें गाने के लिए
लिए गए हैं. ऐसी कुछ ग़ज़लें हम आपको सुनवा चुके हैं जो मूल
रूप से बड़ी हैं मगर गाने के लिए पूरे शेर प्रयोग में नहीं लाये गये.

इसे आप हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में अगर सुनने का शौक
फ़रमाते हैं तो इधर है-हबीब वली वर्ज़न



   


गज़ल के बोल:

गये दिनों का सुराग़ लेकर किधर से आया किधर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर किधर से आया किधर गया वो
अजीब मानुस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर

बस एक मोती सी छब दिखा कर
बस एक मोती सी छब दिखा कर बस एक मीठी सी धुन सुना कर
सितारा-ए-शाम बन के आया ब-रंग-ए-ख़्वाब-ए-सहर गया वो
अजीब मानुस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर

न अब वो यादों का चढ़ता दरिया
न अब वो यादों का चढ़ता दरिया न फ़ुर्सतों की है उदास बरखा
यूँ ही ज़रा सी कसक है दिल में
यूँ ही ज़रा सी कसक है दिल में जो ज़ख़्म गहरा था भर गया वो
अजीब मानुस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर

वो हिज्र की रात का सितारा
वो हिज्र की रात का सितारा वो हम-नफ़स हम-सुख़न हमारा
सदा रहे उसका नाम प्यारा
सदा रहे उसका नाम प्यारा सुना है कल रात मर गया वो
अजीब मानुस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर

वो रात का बेनवा मुसाफ़िर
वो रात का बेनवा मुसाफ़िर वो तेरा शाइर वो तेरा 'नासिर'
तेरी गली तक तो हमने देखा था फिर न जाने किधर गया वो
अजीब मानुस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर

गये दिनों का सुराग़ लेकर किधर से आया किधर गया वो
गये दिनों का सुराग़ लेकर
……………………………………………………………………..
Gaye dinon ka surag le kar-Meeraj-e-ghazal 1983

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Jun 22, 2017

अपनी धुन में रहता हूँ-गुलाम अली गज़ल

गुलाम अली की एक गीतनुमा गज़ल सुनते हैं.
नसीर काज़मी के बोल हैं और धुन स्वयं गायक
ने तैयार की है.





गज़ल के बोल:

अपनी धुन में रहता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ

ओ पिछली रुत के साथी
अब के बरस मैं तन्हा हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ

तेरी गली में सारा दिन
दुख के कंकर चुनता हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ

मेरा दिया जलाये कौन
मैं तेरा खाली कमरा हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ

अपनी लहर है अपना रोग
दरिया हूँ और प्यासा हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ

आती रुत मुझे रोयेगी
जाती रुत का झोँका हूँ
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ
…………………………………………..
Apni dhun mein rehta hoon-Ghulam Ali Ghazal

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Apr 22, 2017

गम है या खुशी है तू-गुलाम अली गज़ल

गुलाम अली ने छोटी पंक्तियों वाली ग़ज़लें काफी गाई
हैं. एक आपने ज़रूर सुनी होगी-अपनी धुन में रहता हूँ.
एक और सुन लेते हैं नासिर काज़मी की लिखी हुई.




गीत के बोल:

ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

आफतों के दौर में
चैन की घड़ी है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

मेरी रात का चिराग
मेरी नींद भी है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

मैं खिज़ां की शाम हूँ
रूत बहार की है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

दोस्तों के दरमियाँ
वजह दोस्ती है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

मेरी सारी उम्र में
एक ही कमी है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

मैं तो वो नहीं रहा
हाँ मगर वो ही है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

'नासिर' इस दयार में
कितना अजनबी है तू
ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू
……………………………………………………..
Gam hai ya khushi-Ghulam Ali Ghazal

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May 17, 2015

दयार-ए-दिल की रात में-गुलाम अली गज़ल

८० के दशक में एक फिल्म आई थी-माटी मांगे खून जिसमें
गुलाम अली की गाई हुई एक गज़ल है-ये दिल ये पागल
दिल मेरा. इस फिल्म के थोड़े पहले एक एल्बम निकला
मीराज-ए-गज़ल जिसमें गुलाम अली और आशा भोंसले के
स्वर हैं. फिल्म बनने में समय लगता है, गाना पहले रिकोर्ड
हो गया था उसके बाद इस एल्बम पर काम हुआ.

गज़ल प्रेमियों को ये सौगात पसंद आई और उन्होंने इसे
सहेज के रख लिया गाहे-बगाहे सुनने के लिए. इसमें एक
से बढ़ कर एक ग़ज़लें हैं. आज आपको सुनवाते हैं नासिर
काज़मी की लिखी गज़ल जिसे गुलाम अली और आशा भोंसले
ने गाया है. फिल्म सन १९८४ में रिलीज़ हुई थी और अल्बम
निकला था १९८३ में.





गज़ल के बोल:

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ, वो शक़्ल तो दिखा गया

वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ हुई
वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

जुदाइयों के ज़ख़्म, दर्द-ए-ज़िन्दगी ने भर दिये
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

ये सुबहो की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
अब आईने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ़ गई ये मैं कहाँ चला गया

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गईं वो सोहबतें
ज़मीं निगल गई उन्हें या आसमान खा गया

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

गए दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक
अलम्कशो उठो कि आफ़ताब सर पे आ गया

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
..................................................................
Dayare-dil ki raat mein-Meeraz-e-ghazal 1983

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May 5, 2015

दिल में इक लहर सी-गुलाम अली

बहुत दिन हो गए गुलाम अली की गज़ल सुने हुए. आज
सुन लेते हैं. ये एक लोकप्रिय गज़ल है. कुछ संगीतप्रेमियों
का मानना है गुलाम अली बहुत इठला के, इतरा के गज़ल
गाया करते हैं.

हर गायक का अपना अंदाज़ होता है गाने का. अब वे कहीं
कहीं गज़ल को कठिन बना देते हैं तो ये उनकी मर्ज़ी. उनके
मुरीद उसमें भी खुश हैं. उनकी कई गज़लें आप आसानी से
गुनगुना नहीं सकते जब तक आप क्लासिकल गायकी में
निपुण न हों. प्रस्तुत गज़ल भी उन्होंने अलग अलग अंदाज़
में गाई है.





गज़ल के बोल:

दिल में इक लहर सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी

शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में
कोई दीवार सी गिरी है अभी

दिल में इक लहर सी उठी है अभी

कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी
और ये चोट भी नयी है अभी

दिल में इक लहर सी उठी है अभी

याद के बे-निशाँ जज़ीरों से
तेरी आवाज़ आ रही है अभी

दिल में इक लहर सी उठी है अभी

शहर की बेचिराग़ गलियों में
ज़िन्दगी तुझको ढूँढती है अभी

दिल में इक लहर सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी
दिल में इक लहर सी उठी है अभी
……………………………………………….
Dil mein ek lehar si uthi hai-Ghulam Ali Ghazal

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