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Sep 24, 2016

फैली है खबर-मान १९५४

बड़े दिन हो गए ‘फ’ शब्द से कोई गीत सुने हुए. फैली शब्द
से लाता का एक गीत काफी प्रसिद्ध है फिल्म घर नंबर ४४ का.
एक और गीत है लता का गाया हुआ जिसके मुखड़े में फैली
शब्द आता है. ये है सन १९५४ की फिल्म मान का. एक शायद
७० के दशक में भी कोई गीत है, कुछ यूँ है-फ़ैल जा, फ़ैल गई,
सिकुड जा, सिकुड गई.

इस गीत की रचना कैफ भोपाली ने की है और संगीत तैयार किया
अनिल बिश्वास ने. काले पीले युग के संगीत प्रेमियों का भी ध्यान
रखना होता है हमें और इस चक्कर में युवा पीढ़ी का धूमचक संगीत
नहीं सुनवा पा रहे हैं हम काफी दिन से. कोई बात नहीं फिर सुन
लेंगे उसे वो तो आजकल बज ही रहा है हेल्थ क्लब से लगा कर
भैंसों के तबेलों में सभी जगह पर.





गीत के बोल:

ओ ओ ओ ओ ओ ओ
फैली है खबर
फैली है खबर  आज ये फूलों की जुबानी
आई है जवानी सखी आई है जवानी
ओ ओ ओ ओ ओ ओ
फैली है खबर
फैली है खबर  आज ये फूलों की जुबानी
आई है जवानी सखी आई है जवानी
ओ ओ ओ ओ ओ ओ
फैली है खबर

मालूम नहीं किसकी ये धुन आठ पहर है
मालूम नहीं
मालूम नहीं किसकी ये धुन आठ पहर है
आहट पे नज़र है
आहट पे नज़र है हरे कागज़ पे नज़र है
आहट पे नज़र है हरे कागज़ पे नज़र है
दिल भी है दीवाना मेरी आँखें भी दीवानी
दिल भी है दीवाना मेरी आँखें भी दीवानी
मेरी आँखें भी दीवानी
ओ ओ ओ ओ ओ ओ
फैली है खबर
फैली है खबर  आज ये फूलों की जुबानी
आई है जवानी सखी आई है जवानी
ओ ओ ओ ओ ओ ओ
फैली है खबर

मिलते ही नज़र उनसे मेरे
मेरे दिल का धडकना
ओ मेरे दिल का धडकना
आँखों का झपकना
मेरी आँखों का झपकना
मालूम ना हो जाए किसी को ये कहानी
किसी को ये कहानी  ओ किसी को ये कहानी

ओ ओ ओ ओ ओ ओ
फैली है खबर
फैली है खबर  आज ये फूलों की जुबानी
आई है जवानी सखी आई है जवानी
ओ ओ ओ ओ ओ ओ
फैली है खबर
.....................................................................................
Phaili hai khabar-Maan 1954

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Aug 27, 2016

आज हम अपनी दुआओं का-पाकीज़ा १९७१

कमाल अमरोही सिर्फ नाम के कमाल नहीं बल्कि कमाल के
फिल्मकार थे. भव्य और बड़ी फ़िल्में बनाने का उन्हें भी शौक
हुआ करता था. उनकी फिल्मों के दृश्य कुछ अलग से और
लुभावने भी हुआ करते थे. ऊपरवाला सबको अलग अलग सोच
देता है तो कुछ सोच समझ कर. आर्टिस्टिक माइंड भी तरह
तरह के मिलेंगे आपको. एक कैनवास सभी को पकड़ा दो, एक
थीम दे दो मगर परिणाम जुदा होंगे सभी के.

ये अलग हट के कुछ करने वालों की बदौलत हमें कलाकृतियों
जैसी चीज़ें मिल जाया करती हैं सभी जगह चाहे वो फिल्म उद्योग
ही क्यूँ ना हो. भवितव्यता और अलौकिकता के बीच झूलते उनकी
फिल्मों के कुछ दृश्य आश्चर्यचकित करते हैं और कल्पनाशीलता
की दाद देने को मन करता है.

आइये सन १९७१ की चर्चित फिल्म पाकीज़ा से एक लोकप्रिय गीत
सुनते हैं. इसे कैफ भोपाली ने लिखा और गुलाम मोहम्मद ने
संगीत से सजाया. लता मंगेशकर की सुरीली आवाज़ इस गीत
में चार चाँद लगा रही है. बाकी की कसार कैफ भोपाली ने ‘आज की
रात बचेंगे तो सहर देखेंगे’ लिख कर पूरी कर दी है इस गीत में.
कैफ भोपाली भी अलग-हट-के लिखने के लिए पहचाने जाते हैं.

फिल्म मीना कुमारी की लार्जेर देन लाइफ परफोर्मेंस के लिए जानी
जाती है.



गीत के बोल:

आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे
आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे

ओ ओ ओ
आप तो आँख मिलाते हुए शरमाते हैं
आप तो आँख मिलाते हुए शरमाते हैं
आप तो दिल के धड़कने से भी डर जाते हैं
फिर भी ये जिद है के हम ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

ओ ओ ओ
प्यार करना दिल-ए-बेताब बुरा होता है
प्यार करना दिल-ए-बेताब बुरा होता है
सुनते आये हैं के ये ख्वाब बुरा होता है
आज इस ख़्वाब की ताबीर मगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

जानलेवा है मुहब्बत का समा आज की रात
शमा हो जायेगी जल जल के धुंआ आज की रात
आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे
आज की रात
आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे
तीर-ए-नज़र
.....................................................................
Aaj ham apni wafaon ka asar-Pakeezah 1971

Artist: Meena Kumari, Raj Kumar

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Jan 6, 2012

चलो दिलदार चलो(एकल गीत)-पाकीज़ा १९७१

सन १९७१ में रिलीज़ हुई पाकीज़ा एक भव्य कैनवास पर बनी फिल्म
है. इसको बनने में १६ साल का वक्त लगा और पैसे कितने लगे होंगे
इसका हम केवल अनुमान लगा सकते हैं. मीना कुमारी इस फिल्म
की रिलीज़ के कुछ समय बाद ही इस संसार से कूच कर गयीं थीं.

आज इस फिल्म को कल्ट क्लासिक का दर्ज़ा प्राप्त है. फिल्म अपने
उम्दा संगीत के लिए भी याद की जाती है. गुलाम मोहम्मद जैसे
प्रतिभावान संगीतकार को जीवन में वो शोहरत नसीब नहीं हुई जिसके
वे हकदार थे. इस फिल्म के पदार्पण के पूर्व ही वे संसार को अलविदा
कह गए. फिल्म का पार्श्व संगीत नौशाद ने तैयार किया. नियति को
क्या मंज़ूर होता है किसे मालूम. वो इंसान को ९९ सीढियां चढवा के
लुढ़का देती है तो किसी को १० वी सीढ़ी से सीधे १०० वी पर पहुंचा
देती है. सांप सीढ़ी का खेल किसी किस्मत के मारे ने ही बनाया होगा
ऐसा मेरा अनुमान है.

फिल्म से लता का गया हुआ एक गीत सुनते हैं. इस गीत का युगल
तर्जुमा ज्यादा पॉपुलर है. गीत कैफ भोपाली का लिखा हुआ है.



गीत के बोल:

चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो
हम हैं तैयार चलो
चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो
हम हैं तैयार चलो
……………………………………………………..
Chalo dildar chalo-Pakeezah 1971

Artist:

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