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Aug 27, 2016

आज हम अपनी दुआओं का-पाकीज़ा १९७१

कमाल अमरोही सिर्फ नाम के कमाल नहीं बल्कि कमाल के
फिल्मकार थे. भव्य और बड़ी फ़िल्में बनाने का उन्हें भी शौक
हुआ करता था. उनकी फिल्मों के दृश्य कुछ अलग से और
लुभावने भी हुआ करते थे. ऊपरवाला सबको अलग अलग सोच
देता है तो कुछ सोच समझ कर. आर्टिस्टिक माइंड भी तरह
तरह के मिलेंगे आपको. एक कैनवास सभी को पकड़ा दो, एक
थीम दे दो मगर परिणाम जुदा होंगे सभी के.

ये अलग हट के कुछ करने वालों की बदौलत हमें कलाकृतियों
जैसी चीज़ें मिल जाया करती हैं सभी जगह चाहे वो फिल्म उद्योग
ही क्यूँ ना हो. भवितव्यता और अलौकिकता के बीच झूलते उनकी
फिल्मों के कुछ दृश्य आश्चर्यचकित करते हैं और कल्पनाशीलता
की दाद देने को मन करता है.

आइये सन १९७१ की चर्चित फिल्म पाकीज़ा से एक लोकप्रिय गीत
सुनते हैं. इसे कैफ भोपाली ने लिखा और गुलाम मोहम्मद ने
संगीत से सजाया. लता मंगेशकर की सुरीली आवाज़ इस गीत
में चार चाँद लगा रही है. बाकी की कसार कैफ भोपाली ने ‘आज की
रात बचेंगे तो सहर देखेंगे’ लिख कर पूरी कर दी है इस गीत में.
कैफ भोपाली भी अलग-हट-के लिखने के लिए पहचाने जाते हैं.

फिल्म मीना कुमारी की लार्जेर देन लाइफ परफोर्मेंस के लिए जानी
जाती है.



गीत के बोल:

आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे
आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे

ओ ओ ओ
आप तो आँख मिलाते हुए शरमाते हैं
आप तो आँख मिलाते हुए शरमाते हैं
आप तो दिल के धड़कने से भी डर जाते हैं
फिर भी ये जिद है के हम ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

ओ ओ ओ
प्यार करना दिल-ए-बेताब बुरा होता है
प्यार करना दिल-ए-बेताब बुरा होता है
सुनते आये हैं के ये ख्वाब बुरा होता है
आज इस ख़्वाब की ताबीर मगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

जानलेवा है मुहब्बत का समा आज की रात
शमा हो जायेगी जल जल के धुंआ आज की रात
आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे
आज की रात
आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे
तीर-ए-नज़र
.....................................................................
Aaj ham apni wafaon ka asar-Pakeezah 1971

Artist: Meena Kumari, Raj Kumar

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Dec 16, 2013

सूनी रे सजरिया-नमक हराम १९७३

दो वक्त की रोटी का चक्कर बड़ा बुरा. किया क्या जाए इसके बिना
काम नहीं चलता है. बोलने की बक बक इतनी हो गयी पिछले दिनों
कि इधर से ध्यान न चाहते हुए भी हट गया. हिन्दुस्तान की सरज़मीं
पर मौजूद कई इन्टरनेट कनेक्शन इतने तेज चला करते हैं कि आज
एड्रेस टाइप करो, साईट कल खुलने की फुल गारंटी.

पाठकों से क्षमा याचना सहित अगली प्रस्तुति हाज़िर है. सन १९७३
की फिल्म नमक हराम से. हृषिकेश  मुखर्जी निर्देशित इस फिल्म में
दो सुपर स्टार मौजूद हैं। हृषिकेश मुखर्जी क हिसाब से इसे अलग हट
के बनी फिल्म कहा जा सकता है.
हृषिकेश  मुखर्जी  हलकी फुलकी फिल्मों के लिए ज्यादा पहचाने गए हैं.
ये थोड़ी गंभीर किस्म की फिल्म है . फिल्म के बाकी गेटों के लिहाज़ से
प्रस्तुत गीत भी थोडा अलग है. पुरानी अनेक फिल्मों में आपको मुजरा
ज़रूर मिलेगा मानो बिना उसके फिल्म बनाना असंभव हो. ऐसा ही कुछ
मुझे इस फिल्म को देख के महसूस हुआ.

बहरहाल जो भी हो गीत सुनिए जो एक महिला युगल गीत है आशा भोंसले
और उषा मंगेशकर का गाया हुआ. आशा क आवाज़ पर जयश्री टी होंठ हिला
रही हैं दूसरी अभिनेत्री को मैं पहचान नहीं पा रहा हूँ.






गीत के बोल:

सूनी, सूनी रे सजरिया साजन बिन तेरे
सूनी रे सजरिया साजन बिन तेरे
सूनी रे सजरिया साजन बिन तेरे

हो भई मैं बाँवरिया हाय राम
भई मैं बाँवरिया साजन बिन तेरे

सूनी रे सजरिया साजन बिन तेरे
सूनी रे सजरिया साजन बिन तेरे


रिमझिम काहे को बरसे रे बदरा
बह गया धुल के नैनों से कजरा

रिमझिम काहे को
रिमझिम हाँ
रिमझिम काहे को बरसे रे बदरा
बह गया धुल के नैनों से कजरा

अबके बरस सावन से पूछो
छाई क्यूँ बदरिया हाय राम

छाई क्यूँ बदरिया साजन बिन तेरे

सूनी रे सजरिया साजन बिन तेरे
सूनी रे सजरिया साजन बिन ते

लोग न जाने ऐसे जीते हैं कैसे
लोग न जाने ऐसे जीते हैं कैसे
तुमसे बिछड के हम तो मर गए जैसे
लोग न जाने ऐसे
लोग न हाँ हाँ हाँ
लोग न हाँ हाँ हाँ
लोग न जाने ऐसे जीते हैं कैसे
तुमसे बिछड के हम तो मर गए जैसे
ऐसे निगोडी बिरहा की रैना 
बीते न सांवरिया हाय राम
बीते न सांवरिया साजन बिन तेरे

सूनी रे सजरिया साजन बिन तेरे
सूनी रे सजरिया साजन बिन तेरे
सूनी रे सजरिया साजन बिन तेरे

_____________________________
Sooni re sajariya-Namak Haram 1973

Artists-Amitabh Bachchan, Rajesh Khanna, Jayshri T, 

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Jul 25, 2011

आज तो मेरी हँसी उडाई-गोमती के किनारे १९७२

मजरूह के लिखे संवेदना को झंझोड़ने वाले गीतों में से एक है फ़िल्म
गोमती के किनारे से लता मंगेशकर का गाया हुआ ये गीत। मीना कुमारी
की इस अन्तिम फ़िल्म का निर्देशन सावन कुमार टाक ने किया था, जनता
को देखने को नहीं मिली। अब ज़रूर इस फिल्म की सी डी, डी वी डी मिलने
लगी है। मौका मिले तो एक बार अवश्य देखिएगा इसे।

लखनऊ शहर गोमती नदी के किनारे बसा हुआ है. इस फिल्म की कथा
कुछ कुछ यही इंगित करती है कि इस शहर की ही एक कहानी है ये.
लखनऊ की संस्कृति से मुजरा शब्द अछूता नहीं रहा कभी। तवायफ़ और
उनके नृत्य संगीत इत्यादि पर प्रकाश डालता जनादेश का एक लेख ज़रूर
पढ़ें- पहले बदनाम, फिर गुमनाम

गीत आदम जात के दोमुंहेपन पर करारा तमाचा सा है। आदमी के नंगेपन
की इन्तेहा ये है कि वो जिस जगह से इस नश्वर संसार में प्रकट होता है,
सयाना होने पर बार बार वहीँ जाना चाहता है। प्रकट होने के वक्त के कष्ट
को वो भूल कर उन गलियारों में वो आनंद ढूँढने लगता है। हवस के अन्धों
को रिश्ते, समाज रीति-रिवाज सब दिखलाई देने बंद हो जाते हैं। अपना
खुद का घर तो ऐसे लोगों का अपवाद होता है और वे पैसे के बल पर घर
से बाहर कोई भी बदतमीजी करने के लिए स्वतन्त्र होते हैं। मर्यादा और
परंपरा की दुहाई देने वाले बाहर निकल कर खुद अनियंत्रित और अमर्यादित
हो जाते हैं । सामाजिक ढांचे को सबसे ज्यादा क्षति साधन समर्थ और संकीर्ण
मानसिकता वाले लोग पहुंचाते हैं। गीत के अंतिम अंतरे में इसी बात पर
गौर किया गया है।

कोठे पर बैठे कलाकारों में आप आई. एस. जौहर को आसानी से पहचान
पाएंगे।




गाने के बोल:

आज तो मेरी हंसी उडाई
जैसे भी चाह पुकारा
आज तो मेरी हंसी उडाई
जैसे भी चाह पुकारा
कल जो मुझे इन गलियों में लाया
वो भी था हाथ तुम्हारा

आज तो मेरी हंसी उडाई
जैसे भी चाह पुकारा

लुटे यहाँ चमन अंधेरों ने
बिके यहाँ बदन अंधेरों में
लुटे यहाँ चमन अंधेरों ने
बिके यहाँ बदन अंधेरों में
भूली भटकी इस बस्ती में, हो ओ ओ
रूप की चांदी रात के सोने का व्यापार है सारा
कल जो मुझे इन गलियों में लाया
वो भी था हाथ तुम्हारा

आज तो मेरी हंसी उडाई
जैसे भी चाह पुकारा

सोचा कभी मैं भी हूँ एक इंसान भी
मैं भी कभी बहन भी हूँ कभी माँ भी
सोचा कभी मैं भी हूँ एक इंसान भी
मैं भी कभी बहन भी हूँ कभी माँ भी
तुम तो प्यासी प्यासी ऑंखें ले के, हो ओ ओ
करने को आये मेरे लबों पर मेरे लहू का नज़ारा
कल जो मुझे इन गलियों में लाया
वो भी था हाथ तुम्हारा

आज तो मेरी हंसी उडाई
जैसे भी चाह पुकारा

सबको गुनाहों में मगन देखा
देखा शरीफों का चलन देखा
सबको गुनाहों में मगन देखा
देखा शरीफों का चलन देखा
सबकी इनायत हाय देखी मैंने, हो ओ ओ
मेरे ही दिल के टुकड़े को मेरा आशिक कह कर पुकारा
कल जो मुझे इन गलियों में लाया
वो भी था हाथ तुम्हारा
..................................
Aaj to meri hansi udaai-Gomti ke kinare 1972

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