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Oct 10, 2017

और नहीं बस और नहीं-रोटी कपड़ा और मकान १९७४

गायक महेंद्र कपूर को पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मिला
था फिल्म गुमराह के गीत ‘चलो एक बार फिर से अजनबी’
के लिए. उन्हें दूसरा पुरस्कार मिला फिल्म हमराज़ के
गीत ‘नीले गगन के तले’ के लिए. दोनों ही गीत रवि के
संगीत निर्देशन वाले हैं और दोनों के गीतकार साहिर हैं.
संयोग है कि ये दोनों गीत परदे पर सुनील दत्त ने गाये
हैं.

१९६८ के पुरस्कारों के लिए फिल्म उपकार का गीत ‘मेरे
देश की धरती’ नामांकित तो हुआ मगर उसे फिल्मफेयर
पुरस्कार नहीं मिला बल्कि राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया. ये
कल्याणजी आनंदजी के संगीत निर्देशन वाला गीत है जिसे
इन्दीवर ने लिखा है.  इसे मनोज कुमार पर फिल्माया गया
था.

१९७४ की फिल्म रोटी कपडा और मकान के प्रस्तुत गीत
के लिए भी उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ. फिल्म में
ये गीत मनोज कुमार पर फिल्माया गया है. संतोष आनंद
की रचना है और लक्ष्मी प्यारे का संगीत.



गीत के बोल:

और नहीं बस और नहीं ग़म के प्याले और नहीं
और नहीं बस और नहीं ग़म के प्याले और नहीं
दिल में जगह नहीं बाकी रोक नजर अपनी साकी
और नहीं बस और नहीं ग़म के प्याले और नहीं
और नहीं बस और नहीं

सपने नहीं यहाँ तेरे अपने नहीं यहाँ तेरे
सपने नहीं यहाँ तेरे अपने नहीं यहाँ तेरे
सच्चाई का मोल नहीं चुप हो जा कुछ बोल नहीं
प्यार प्रीत चिल्लायेगा तो अपना गला गँवाएगा
पत्थर रख ले सीने पर क़समें खा ले जीने पर
क़समें खा ले जीने पर
गौर नहीं है गौर नहीं परवानों पर गौर नहीं
आँसू आँसू ढलते हैं अंगारों पर चलते हैं
तो और नहीं बस और नहीं

कितना पढ़ूँ ज़माने को कितना गढ़ूँ ज़माने को
कौन गुणों को गिनता है कौन दुखों को चुनता है
हमदर्दी काफ़ूर हुई नेकी चकनाचूर हुई
जी करता बस खो जाऊँ कफ़न ओढ़कर सो जाऊँ
कफ़न ओढ़कर सो जाऊँ
दौर नहीं ये दौर नहीं इन्सानों का दौर नहीं
फ़र्ज़ यहाँ पर फ़र्ज़ी है असली तो खुदगर्ज़ी है
तो और नहीं बस और नहीं ग़म के प्याले और नहीं
और नहीं बस और नहीं

बीमार हो गई दुनिया बेकार हो गई दुनिया
मरने लगी शरम अब तो बिकने लगे सनम अब तो
ये रात है नज़ारों की गैरों के साथ यारों की
तो जी है बिगाड़ दूँ सारी दुनिया उजाड़ दूँ सारी
दुनिया उजाड़ दूँ सारी
ज़ोर नहीं है ज़ोर नहीं दिल पे किसी का ज़ोर नहीं
कोई याद मचल जाए सारा आलम जल जाए
तो और नहीं बस और नहीं ग़म के प्याले और नहीं
और नहीं बस और नहीं
.................................................................
Aur nahin bas aur nahin-Roti kapda aur makan 1974

Artist: Manoj Kumar

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Sep 13, 2017

हाय हाय ये मजबूरी-रोटी कपड़ा और मकान १९७४

दो टके की नौकरी-ये शब्द इस गीत की पञ्च लाइन है.
सावन तो अनमोल है ये इस गीत के माध्यम से समझें.
फ़िल्मी नायक को नौकरी नहीं मिली तो क्या छोकरी
तो मिल गई. ऐसे लुभावने दृश्य फिल्मों में ही ज्यादा
दिखलाई देते हैं.

गीत अपने समय का चर्चित गीत है और इसमें बरसात
भी हो रही है. हिंदी फ़िल्मी बरसात और नायिकाओं पर
एक मोटी सी किताब लिखी जा सकती है. हो सकता है
किसी किताब लिखने वाले ने इस पर कार्य भी शुरू कर
दिया हो.

गीत वर्मा मालिक का है और इसे लता मंगेशकर ने गाया
है लक्ष्मी प्यारे के संगीत निर्देशन में.




गीत के बोल:

अरे हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
अरे हाय हाय हाय मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी

कितने सावन बीत गये
कितने सावन बीत गये बैठी हूँ आस लगाये
जिस सावन में मिले सजनवा वो सावन कब आये
कब आये
मधुर मिलन का ये सावन हाथों से निकला जाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी

प्रेम का ऐसा बंधन है
प्रेम का ऐसा बंधन है जो बंध के फिर ना टूटे
अरे नौकरी का है क्या भरोसा आज मिले कल छूटे
कल छूटे
अम्बर पे है रचा स्वयंवर फिर भी तू घबराये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये
रंग डिंग डांग डिंग डांग डांग डांग डांग
रंग डिंग डांग डिंग डांग डांग डांग डांग
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
..................................................................
Haye haye ye majboori-Roti kapda aur makan 1974

Artists: Zeenat Aman, Manoj Kumar

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Dec 21, 2010

बाकी कुछ बचा तो मंहगाई मार गयी - रोटी कपड़ा और मकान १९७४

घाटे की अर्थव्यवस्था, घाटा, घाटा और घाटा। कंगाली कायम है।
अर्थ तो है नहीं फिर कैसी व्यवस्था। भुखमरी के अर्थशात्र पर महंगे
शोध होते हैं मगर भुखमरी की मार झेल रहे आम जन तक रोटी
पहुँच पाती है या नहीं अर्थशास्त्र विषय के सिलेबस में नहीं है।
पिछले तीन साल में महंगाई जिस गति से ऊँचाई पर पहुंची है उस
पर शोध की नहीं गहन चिंतन और सुधार के लिए कुछ ठोस कदम
उठाये जाने की आवश्यकता है। जिसको देखो वो यही कहता मिलेगा
बजट बिगड़ गया है। पांच रूपये में पांच घूँट चाय मिलती है अब। खाद्य
पदार्थों के दाम सन २००५ की तुलना में लगभग दुगने हो चुके हैं। दालों
के दाम में तो ऐसा लगता है व्यापारी प्रतिस्पर्धा कर रहे हों-कौन ऊंची
बोली बोलेगा।

इसका दूसरा पहलू और भी है जो इधर आपको दिखेगा
सुरेश के ब्लॉग पर एक कार्टून में - kahan है महंगाई ? और इस विषय
पर अगर आप वाकई कुछ सटीक कारण जानना चाहें कि क्या वजह है
अनाप शनाप दामों में बढ़ोत्तरी की तो रविवार का ये मुद्दा वाला परिशिष्ट
अवश्य देखें- jaanlewa महंगाई।

अब गीत की बात करते हैं ये गीत वर्मा मालिक का लिखा और लक्ष्मी प्यारे
का संगीतबद्ध किया हुआ है। इसमें आपको चार गायकों की आवाजें सुनाई
देंगी-लता मंगेशकर, महेंद्र कपूर, नरेन्द्र चंचल और जानी बाबू कव्वाल।

फिल्म रोटी कपडा और मकान का गीत आज भी प्रासंगिक है। तकरीबन
३५ से ज्यादा साल हो गए हैं इस गीत को बने मगर ये हर युग में अपनी याद
ताज़ा करवाता रहेगा।



गीत के बोल:

उसने कहा तू कौन है, मैंने कहा उल्फ़त तेरी
उसने कहा तकता है क्या, मैंने कहा सूरत तेरी
उसने कहा चाहता है क्या, मैंने कहा चाहत तेरी
मैंने कहा समझा नहीं, उसने कहा क़िस्मत तेरी

एक हमें आँख की लड़ाई मार गई
दूसरी तो यार की जुदाई मार गई
तीसरी हमेशा की तन्हाई मार गई
चौथी ये खुदा की खुदाई मार गई
बाकी कुछ बचा तो मंहगाई मार गई

तबीयत ठीक थी और दिल भी बेक़रार ना था
ये तब की बात है जब किसी से प्यार ना था
जब से प्रीत सपनों में समाई मार गई
मन के मीठे दर्द की गहराई मार गई
नैनों से नैनों की सगाई मार गई
सोच सोच में जो सोच आई मार गई,

बाकी कुछ बचा तो मंहगाई मार गई

कैसे वक़्त में आ के दिल को दिल की लगी बीमारी
मंहगाई की दौर में हो गई मंहगी यार की यारी
दिल की लगी दिल को जब लगाई मार गई
दिल ने की जो प्यार तो दुहाई मार गई
दिल की बात दुनिया को बताई मार गई
दिल की बात दिल में जो छुपाई मार गई,

बाकी कुछ बचा तो मंहगाई मार गई

पहले मुट्ठी विच पैसे लेकर
पहले मुट्ठी में पैसे लेकर थैला भर शक्कर लाते थे
अब थैले में पैसे जाते हैं मुट्ठी में शक्कर आती है
हाय मंहगाई मंहगाई ...
दुहाई है दुहाई मंहगाई मंहगाई ...
तू कहाँ से आई, तुझे क्यों मौत ना आई, हाय मंहगाई ...
शक्कर में ये आटे की मिलाई मार गई
पौडर वाले दुद्ध दी मलाई मार गई
राशन वाली लैन दी लम्बाई मार गई
जनता जो चीखी चिल्लाई मार गई,

बाकी कुछ बचा तो मंहगाई मार गई

गरीब को तो बच्चों की पढ़ाई मार गई
बेटी की शादी और सगाई मार गई
किसी को तो रोटी की कमाई मार गई
कपड़े की किसी को सिलाई मार गई
किसी को मकान की बनवाई मार गई
जीवन दे बस तीन निसान - रोटी कपड़ा और मकान
??? ??? के हर इन्सान
खो बैठा है अपनी जान
जो सच सच बोला तो सच्चाई मार गई
और बाकी कुछ बचा तो मंहगाई मार गई
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Baaki kuchh bacha to-Roti kapda aur makaan 1974

Artists:  Manoj Kumar, Mausami Chatterji

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Apr 19, 2009

मैं न भूलूंगा-रोटी कपड़ा और मकान १९७४

फूल और कांटे की बारिश से जिस गाने की हमें याद आई थी वो
प्रस्तुत है। एक गाने से दूसरा गाना याद आ जाता है और ये कड़ी
से कड़ी और दाल से दाल जुडती चली जाती है.

रस्मों और कसमों पर बहुत से गीत बने हैं हिन्दी फिल्मों के लिए।
कुछ को ज्यादा प्रसिद्धि मिली, उसमे से एक है १९७४ की फ़िल्म
रोटी कपड़ा और मकान का मुकेश और लता का गाया हुआ
ये गीत। फ़िल्म में ये गीत दो बार आता है। ये पहला संस्करण है ।

गीत में इतनी बार भूलूंगा, भूलूंगी दोहराया गया है की इसको
भूलने का सवाल ही नहीं उठता. ;) गाना थोड़ा अलग हट के है
और इसको देखने में भी आनंद आता है। इस गीत को लिखा है
संतोष आनंद ने और धुन बनाई है लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने।



गाने के बोल:

मैं न भूलूंगा
मैं न भूलूंगी

मैं न भूलूंगा
मैं न भूलूंगी

मैं न भूलूंगा
मैं न भूलूंगी

इन रस्मों को, इन कसमों को
इन रिश्ते नातों को

मैं न भूलूंगा
मैं न भूलूंगी
मैं न भूलूंगी
मैं न भूलूंगा

इन रस्मों को, इन कसमों को
इन रिश्ते नातों को

मैं न भूलूंगा
मैं न भूलूंगी

मैं न भूलूंगा
मैं न भूलूंगी

चलो जग को भूलें
ओ, चलो जग को भूलें
ख्यालों में झूलें
बहारों में डोलें
बहारों में डोलें
सितारों को छू लें
बहारों में डोलें
सितारों को छू लें

आ तेरी मैं मांग सवारूँ
तू दुल्हन बन जा

मांग से जो दुल्हन का रिश्ता
मैं न भूलूंगी

मैं न भूलूंगा
मैं न भूलूंगी

मैं न भूलूंगा
मैं न भूलूंगी

समय की धारा में
ओ, समय की धारा में
उमर बह जानी है
जो घड़ी जी लेंगे
जो घड़ी जी लेंगे
वोही रह जानी है

मैं बन जाऊं साँस आखरी तू जीवन बन जा
जीवन से साँसों का रिश्ता

मैं न भूलूंगी

मैं न भूलूंगा
मैं न भूलूंगी

मैं न भूलूंगा
मैं न भूलूंगी

बरसता सावन हो
महकता आँगन हो
कभी दिल दूल्हा हो
कभी दिल दुल्हन हो
गगन बनकर झूमे
पवन बनकर घूमें
चलो राहें मोडें
कभी न संग छोडें

कहीं पे छुप जाना है
नज़र नहीं आना है
कहीं पे बस जायेंगे
ये दिन कट जायेंगे
अरे क्या बात चली
वो देखो रात ढली
ये बातें चलती रहें
ये रातें ढलती रहें

मैं मन को मन्दिर कर डालूँ
तू पूजन बन जा
मन्दिर से पूजा का रिश्ता

मैं न भूलूंगी

मैं न फूलूंगा
मैं न फूलूंगी

इन रस्मों को, इन कसमों को
इन रिश्ते नातों को

मैं न भूलूंगा
मैं न भूलूंगी

मैं न भूलूंगा
मैं न भूलूंगी
............................................................................
Main na bhoolunga-Roti kapda aur makaan 1974

Artists: Manoj Kumar, Zeenat Aman

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