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Jun 17, 2011

ये साये हैं ये दुनिया है-सितारा १९८०

फिल्म सितारा के किरदार के बारे में आपको बताया था पहले।
कैसे एक गाँव की लड़की फिल्म दुनिया के शिखर पर पहुँच
जाती है। शिखर पर पहुँचते ही उसे तमाम कडवे अनुभव होना
शुरू होते हैं। प्रेमी से बिछुड़ने का दर्द, अपनों द्वारा दोहे जाने
की कचोट, मतलबपरस्त हंसी वाले लोग इर्द गिर्द में। इन सभी
तत्वों के बीच नायिका अकेलापन महसूस करती है। उस दर्द
को बोलों के जरिया गुलज़ार ने,संगीत के ज़रिये राहुल देव बर्मन
ने और आवाज़ के ज़रिये आशा भोंसले ने बखूबी उभरा है।
अच्छे गीत कैसे बनते हैं, उसका एक नमूना। फिल्म नहीं
चली मगर ये गीत बजता रहेगा । एक पंक्ति में चकाचौंध
वाली दुनिया की हकीकत और औकात उधेड़ के रख दी गई है-
"यहाँ सारी रौनक है रुसवाइयों की" । गुलज़ार स्वयं बॉलीवुड
की हर नब्ज़ से वाकिफ हैं, उनसे बेहतर और कम शब्दों में
फिल्म जगत का असली चेहरा दिखलाने का तरीका शायद ही
किसी के पास हो।




गीत के बोल:

ये साये हैं
ये दुनिया है परछाइयों की
ये साये हैं ये दुनिया है

भरी भीड़ में खाली
भरी भीड़ में खाली तन्हाइयों की

ये साये हैं ये दुनिया है

यहाँ कोई साहिल सहारा नहीं है
कहीं डूबने को किनारा नहीं है
यहाँ कोई साहिल सहारा नहीं है
कहीं डूबने को किनारा नहीं है
यहाँ सारी रौनक है रुसवाइयों की


ये साये हैं
ये दुनिया है परछाइयों की
ये साये हैं ये दुनिया है

यहाँ सारे चेहरे हैं मांगे हुए से
निगाहों में आंसू भी टाँगे हुए से
यहाँ सारे चेहरे हैं मांगे हुए से
निगाहों में आंसू भी टाँगे हुए से
बड़ी नीची राहें हैं ऊंचाइयों की

ये साये हैं
ये दुनिया है परछाइयों की
ये साये हैं ये दुनिया है

भरी भीड़ में खाली
भरी भीड़ में खाली तन्हाइयों की

ये साये हैं ये दुनिया है

जो अंतरा विडियो से गायब है वो इस प्रकार से है:


कई चाँद उठ कर जलाए बुझाये
बहुत हमने चाहा ज़रा नींद आये
कई चाँद उठ कर जलाए बुझाये
बहुत हमने चाहा ज़रा नींद आये
यहाँ रात होती है बेदारियों की
...............................
Ye saaye hain ye duniya hai-Sitara 1980

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Jun 15, 2011

साथ साथ तुम चलो-सितारा १९८०

फिल्म अभिमान में नारी के सितारा बनने का जिक्र है तो एक
और ऐसी फिल्म है जिसमें ग्रामीण परिवेश में पली बड़ी नायिका
फिल्म जगत की एक हस्ती बन जाती है। इस थीम पर पहले एक
फिल्म हम देख चुके हैं-मेरे हमसफ़र। फिल्म सितारा बॉक्स ऑफिस
पर कोई कमाल नहीं दिखा पाई ना ही इसके संगीत ने कोई अलख
जगाया । फिर भी, इस फिल्म में कुछ यादगार गीत हैं। फिल्म का
सबसे अलोकप्रिय गीत आपको सुनवाते हैं जो भूपेंद्र और आशा भोंसले
की आवाज़ में है। संगीत राहुल देव बर्मन का है। गीत फिल्माया गया
है ज़रीना वहाब और मिथुन पर। फिल्म एक आध बार आपको टी वी के
चैनल पर दिखाई दी होगी। मिथुन के चरित्र का नाम कुंदन और ज़रीना
के चरित्र का नाम धनिया है। वो धनिया से सरिता बन जाती है फिल्म
जगत में। गुल्ज़ाराना गीत बहुत दिनों के बाद प्रस्तुत कर रहा हूँ
ब्लॉग पर।




गीत के बोल:

साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें
हो, साथ साथ तुम चलो तो रात रात चलें
रात साथ कल सुबह एक सुबह के घर चलें


साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें
हो, साथ साथ तुम चलो तो रात रात चलें
रात साथ कल सुबह एक सुबह के घर चलें

साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें

सुबह से कह्नेगे जा के
अपना घर संभालिये
रात को जो सपने
दे गये थे वो निकालिए
हो, आपको खबर ना हो
सपने बेखबर चले

साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें
ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला

रोज़ चढ़ के आस्मां पे
आ हा हा
चाँद जब लगायेंगे
लौ बुझाने का भी समय
ओ हो
हम उसे बताएँगे
फूँक से बुझा के चाँद
चाँद के उधर चलें
उधर चलें, उधर चलें

साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें
ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला

हो हो, हो हो
तेज़ है हवा कहीं
वक़्त ना उड़े आज का, हो
हो, चाँद से पकड़ के रखना
आ हा हा
हो ना वो एक रात का
रात ओढ़ के चलो,
रात के उधर चलें
उधर चलें, उधर चलें
उधर चलें, उधर चलें

साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें
साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें
रात साथ कल सुबह एक सुबह के घर चलें
रात साथ कल सुबह एक सुबह के घर चलें
हो, रात साथ कल सुबह एक सुबह के घर चलें
..................................
Saath saath tum chalo-Sitara 1980

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Feb 1, 2011

सजना का कंगना-सितारा १९८०

हम में से कई एक ने पुराने ज़माने का चाबी वाला भोंपू या
ग्रामोफोन नहीं देखा होगा। नई पीढ़ी तो लगभग इसके स्वाद
से अछूती है। गाँव में एक फिल्म आई है उसका प्रचार हो रहा
है। पहले के समय में फिल्म का प्रचार तांगे, रिक्शे या बैलगाड़ी
के ज़रिये भी होता था। उसमे एक माइक होता जिसे लगभग
मुंह में डाल के उदघोषक कुछ अस्पष्ट से तो कुछ अति-अस्पष्ट से
शब्दों का उच्चारण करता हुआ अपना गला साफ़ करता। जो
चीज़ साफ़ सुनाई देती वो थी ग्रामोफोन से निकलने वाली ध्वनि।
कुछ लग चुकी फिल्मों के एल पी या ई पी रिकॉर्ड बजाये जाते।
गीत मनोरंजक है, इसमें महिला और पुरुष उदघोषक फुर्सत के
क्षणों में रिकॉर्ड बजा कर उसपर नृत्य और अभिनय कर रहे हैं।
जैसे ही ग्रामोफोन कि चाबी ख़त्म होने लगती है वो टें बोल जाता
है, उस प्रभाव को बड़े प्रभावी ढंग से बतलाया गया है। सिनेमा के
उन कुछ क्षणों में से एक जो वास्तविकता के सबसे करीब हैं। इसके
अलावा एक और पहलू से आप वाकिफ होंगे रिकॉर्ड के घिस जाने पर
सुई अटकना भी शुरू हो जाती है और एक ही शब्द को आपको रटने
की कोशिश करने लगती है तब उसे हलके से धक्के से आगे बढ़ाना
पढता था। ऐसी ऐसी विकट स्तिथियों में मैंने ग्रामोफोन बजते
सुने हैं कि आप सुन कर चकित रह जायेंगे वे किस्से। एक बार तो
रेगिस्तानी मेले में ऊँट की पीठ पर रख कर बजाया जा रहा था
ग्रामोफोने। ऊँट को २-४ गाने के बाद जाने क्या सूझी उसने एक
ज़ोरदार अंगडाई ली और ग्रामोफोन चारों खाने चित हो कर गिरा
मरा फ़ोन में तब्दील हो गया । वो बैटरी की सहायता से बजाया जाने
वाला रिकॉर्ड प्लयेर था ।

गौरतलब है कि इसमें नायक और नायिका हेमा मालिनी और राजेश
खान्नाका नाम लेते हैं। फिल्म सिनेमा के इतिहास में फ़िल्मी गीतों
की जीवन्तता के बारे में बात की जाये तो ये दोनों कलाकार दूसरों
पर भरी पढ़ते हैं। ज़रूरी नहीं की हिट गीत रोचक हो या रोचक गीत
बड़ा हिट हो जाये। इस गीत के मामले में भी कुछ ऐसा ही है।
लेखनी एक बार फिर गुलज़ार की है और संगीतमय प्रयोगधर्मिता
राहुल देव बर्मन की। पिछले गीत में भूपेंद्र के साथ लता गा रहीं थीं
तो इस गीत में उनका साथ दिया है आशा भोंसले ने।

गीत में हास्य का पुट भी है। नायिका अति उत्साह में उछलती कूदती
गोबर के ढेर में पांव डाल कर फिसल पढ़ती है। नायक ने धोती यूँ बांध
रखी है मानो धोती के कपडे का कोई पतलून सिलवा के पहना हो।

म्यूजिकल मिस्फॉयरिंग भी है इस गीत में। कल्पना करें कि पुरुष आवाज़
नायिका के लिए और महिला आवाज़ नायक के लिए। गीत को आप
सिनेमा इतिहास के सबसे मनोरंजक गीतों में शामिल कर लीजिये।



गीत के बोल:

सजना का कंगना
हो कंगना में हीरा
हो सजना का कंगना
कंगना में हीरा
हीरा मैं खाई के मरूं एक बार,
के दुई बार, के तीन बार, के कै बार मरूं

अरे सजनी का कंगना
कंगना में हीरा
हीरा मैं खाई के मरूं एक बार,
के दुई बार, के तीन बार, के कै बार मरूं

एक तो तेरी ऑंखें बिल्लौरी
ऑंखें जैसे दो हीरों की चोरी
एक तो तेरी ऑंखें बिल्लौरी
ऑंखें जैसे दो हीरों की चोरी
हो हीरे पे, हीरे पे, हीरे पे......

सजना का कंगना
कंगना में हीरा

हो हीरे पे हीरा मैं खाई के मरूं
एक बार, के दुई बार, के तीन बार,
के कै बार मरूं

सजना का कंगना
कंगना में हीरा
हीरा मैं खाई के मरूं एक बार,
के दुई बार, के तीन बार, के कै बार मरूं

एक तो पड़े लोगों की नज़र ना
दूजे तेरी गली से गुज़ारना
हो ओ ओ ओ, एक तो पड़े लोगों की नज़र ना
दूजे तेरी गली से गुज़ारना
बच बच के रुकना कभी चलना
एक बार, के दुई बार, के तीन बार,
के कै बार बचूं

हे सजनी का कंगना
कंगना में हीरा
हीरा मैं खाई के मरूं एक बार,
के दुई बार, के तीन बार, के कै बार मरूं


एक तो तेरी पायल ऊंची बोले
दूजे गोरी घूंघट में ना बोले
एक तो तेरी पायल ऊंची बोले
दूजे गोरी घूंघट में ना बोले

मलमल के घूंघट में गोरी जले
एक बार के दुई बार के तीन बार
के कै बार जले

सजना का कंगना
कंगना में हीरा
हीरा मैं खाई के मरूं एक बार,
के दुई बार, के तीन बार, के कै बार मरूं
...................................
Sajna ka kangna-Sitara 1980

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थोड़ी सी ज़मीन थोडा आसमान-सितारा

तुमसे थोड़ी सी ज़मीन ही तो मांगी थी तुम तो हलकट प्रोपर्टी
ब्रोकर की तरह थोड़ी सी धूल थमा के चलते बने। थोडा आसमान
क्या मांग लिया तुमने तो हमें भैंस की तरह पोखर में डुबो दिया।
अब भाई दारू पी के बढ़िया बढ़िया शेर निकलते होंगे दिल से, हम
तो चाय और भजिये पर जिंदा रहने वाले प्राणी हैं अतः बासी
भजिये खाने के बाद आने वाली डकार के अंदाज़ में ऐसे ही उदगार
प्रकट हो पा रहे हैं, बतलाइए क्या किया जाए।

आइये सुनें एक आशावादी गीत जो देखने और सुनने दोनों में आनंद
देता है। गुलज़ार का लिखा और संगीतकार पंचम उर्फ़ आर डी बर्मन
का संगीतबद्ध किया ये गीत गा रहे हैं लता और भूपेंद्र। सौंधी मिटटी
और लेपे हुए चूल्हे को सुनें ध्यान लगा कर और बाजरे के या चने के
जिस खेत में आपका जी चाहे कौवे उड़ायें।

सपने ज़रूर देखने चाहिए मगर उनको अमल में लाने का पुख्ता
प्रोग्राम होना ज़रूरी है।



गीत के बोल:

ला ला ला ला ला ला, ला ला ला ला ला ला

थोड़ी सी ज़मीन थोड़ा आसमान
तिनकों का बस एक आशियाँ

थोड़ी सी ज़मीन थोड़ा आसमान
तिनकों का बस एक आशियाँ

मांगा है जो तुमसे वो ज्यादा तो नहीं है
देने को तो जान दें दें, वादा तो नहीं है
कोई तेरे वादों पे जीता हैं कहाँ

मेरे घर के आँगन में, छोटा सा झूला हो
सौंधी सौंधी मिटटी होगी, लेप हुआ चूल्हा हो
थोड़ी थोड़ी आग होगी, थोड़ा सा धुंआ

रात कट जायेगी तो कैसे दिन बिताएंगे
बाजरे के खेतों में कौवे उड़ायेंगे
बाजरे के टिक्कों जैसे, बेटे हो जवान

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